Thursday, February 9, 2017

यमराज मौत से पहले हर किसी को देते हैं ये 4 संकेत,


संसार के कुछ नियम होते हैं, जिन्हें हर किसी को मानना पड़ता है, मृत्यु भी उन्हीं में से एक है। जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु होना भी निश्चित ही है। इस सच को कोई नहीं बदल सकता, लेकिन कब हमारी मृत्यु हो सकती है, इसका पता पहले ही लग जाता है। माना जाता है कि यमलोक के दूत हर इंसान को उसकी मौत से पहले यमराज के 4 संदेश भेजते हैं, जिनसे यह समझा जा सकता है कि अब उसका अंतिम समय आने में है।


एक प्रचलित कथा के अनुसार यमराज ने अपने एक भक्त अमृत को वचन दिया था कि वे हर किसी के मौत से पहले ही 4 संकेतों से जरिए इसकी सूचना भेजेंगे, ताकि लोगों को पता हो जाए कि उसकी मृत्यु कब होने वाली है और उस बीच में वह अपने सारे अधूरे काम कर सके।


यमराज और भक्त अमृत की कहानी है-


एक समय की बात है, यमुना के किनारे अमृत नाम का व्यक्ति रहा करता था. वह यम देवता की दिन-रात पूजा किया करता क्योंकि उसे अकसर अपनी मौत का भय सताता रहता था। यमराज, अमृत की तपस्या से प्रभावित हुए और उसके सामने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा।

यमराज की यह बात सुनकर अमृत ने उनसे अमरता का वरदान मांगा। जिसे सुनकर यमराज ने उसे समझाया कि जिसने जन्म लिया है, उसे मरना ही है। कोई भी मनुष्य मृत्यु से बच नहीं सकता। यमराज की यह बात सुनकर अमृत ने उनसे कहा कि अगर मौत को टाला नहीं जा सकता, तो कम से कम जब मौत मेरे बिल्कुल करीब हो, तो मुझे पता चल जाए ताकि मैं अपने परिवार के लिए कुछ प्रबंध कर सकूं।

इसके बाद यम ने अमृत को मौत की पूर्व सूचना देने का वादा कर दिया। यम ने इसके बदले में अमृत से कहा कि वह भी वादा करे कि जैसे ही उसे मृत्यु का संकेत मिलेगा, वह संसार से विदा लेने की तैयारी करना शुरू कर देगा। यह कहने के बाद यमराज अदृश्य हो गए। ऐसे ही साल बीतते गए और अमृत ने यम के वादे से आश्वस्त होकर सारी साधना छोड़कर विलासितापूर्ण जीवन जीना शुरू कर दिया। मौत की अब उसे ज़रा भी चिंता नहीं होती थी. धीरे-धीरे उसके बाल सफेद होने लगे।

कुछ साल बाद उसके सारे दांत टूट गए, फिर उसकी आंखों की रोशनी भी कमजोर हो गई। फिर भी अभी तक उसे कोई यमराज का कोई संदेश नहीं मिला था। इसी तरह, कुछ साल और बीते और अब वह बिस्तर से उठने में भी असमर्थ हो गया, उसका शरीर बिल्कुल लकवाग्रस्त जैसी स्थिति में पहुंच गया। लेकिन उसने मन ही मन यम को मौत का कोई संदेश न भेजने के लिए धन्यवाद दिया।

एक दिन वह हैरान रह गया, जब उसने अपने पास यमदूतों को देखा. उसने परेशान होकर घर में यमराज का पत्र ढूंढना शुरू कर दिया पर उसे ऐसा कोई पत्र नहीं मिला और उसने यमराज पर धोखा देने का आरोप लगाया।

तब यमराज ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया कि मैंने तो तुम्हें 4 संदेश भेजे थे लेकिन तुम्हारी लिप्सा और विलासितापूर्ण जीवन शैली ने तुम्हें अंधा बना दिया था। जब तुम्हारे बाल सफेद हो गए थे वह पहला संकेत था। जब तुम्हारे सारे दांत टूट गए, वह मेरा दूसरा संकेत था। तीसरा संकेत जब तुमने अपनी दृष्टि खो दी और चौथा संदेश था जब तुम्हारे शरीर के सभी अंगों ने काम करना बंद कर दिया। लेकिन तुम इनमें से किसी संकेत को समझ न सके।

इसी प्रकार यमराज हर किसी को उसकी मृत्यु से पहले ये 4 संकेत जरूर भेजते हैं-


पहला संदेश- बालों का सफेद होना।

दूसरा संदेश-दांत गिरना।

तीसरा संदेश- आंखों की ज्योति का कमजोर पड़ना।

चौथा संदेश- कमर झुक जाना या शरीर ये अंगों का ठीक से काम न करना
http://religion.bhaskar.com/news/JM-JKR-DHAJ-signs-send-by-yamraj-before-death-in-hindi-news-hindi-5523822-PHO.html?ref=preco

Wednesday, February 8, 2017

बच्चों को बुरी नजर से बचाते हैं हनुमानजी

बच्चों पर नकारात्मक शक्तियों का असर सबसे पहले होता है क्योंकि उनका मन व मस्तिष्क बड़े लोगों की अपेक्षा बहुत कमजोर होता है। हम देखते हैं कि यदि कोई भी व्यक्ति एकटक बच्चे को देखता है तो बच्चा अनमना सा हो जाता है और रोने लगता है। ऐसे अनेक कारण हैं जो बच्चों को परेशान करते हैं। इस वजह से बच्चे अक्सर बीमार भी रहते हैं तथा उन्हें भय भी लगता है। कुछ साधारण उपाय कर बच्चों की इन समस्याओं को दूर किया जा सकता है। ये उपाय इस प्रकार हैं-

1. आपके बच्चे को बार-बार नजर लगती है तो मंगलवार को एक चांदी के ताबीज में हनुमानजी के चोले का सिंदूर भर लें और इसे काले धागे में डालकर अपने बच्चे के गले में पहना दें।

2. यदि आपका बच्चा अक्सर बीमार रहता है तो उपचार के साथ-साथ हनुमानजी का ये उपाय भी कर सकते हैं। शुक्ल पक्ष के पहले मंगलवार को एक अष्टधातु का कड़ा बनवाकर लाएं और इसे हनुमानजी की मूर्ति के सामने रख दें। फिर हनुमानजी के दाएं पैर का सिंदूर कड़े पर लगाकर पंचमुखी श्रीहनुमान कवच, बजरंग बाण, हनुमान बाहुक तथा 11 बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। फिर उस कड़े को अपने बच्चे के दाएं हाथ में पहना दें। साथ ही हनुमानजी से प्रार्थना करें कि बच्चा स्वस्थ रहे।

3.यदि बच्चे को अंधेरे से या कहीं अकेले जाने से डर लगता है तो शुक्ल पक्ष के किसी भी मंगलवार को श्रीहनुमान चालीसा की पुस्तक लेकर हनुमानजी के मंदिर में अर्पित करें। फिर हनुमानजी के दाएं कंधे के सिंदूर से बच्चे को तिलक लगाकर मूर्ति के सामने लाल आसन पर बैठा दें और हनुमान चालीसा का पाठ 11 बार करें। ऐसा करने से बच्चे का भय जाता रहेगा।

http://religion.bhaskar.com/news/JM-JYO-HAS-hanumanji-s-easy-measures-news-hindi-5522979-PHO.html

Tuesday, February 7, 2017

इन 2 हालातों में मन को न होने दे बेकाबू, वरना कर बैठेंगे खुद का नुकसान

श्रीमद्भागवत हिंदू धर्म के सबसे खास ग्रंथों में से एक माना जाता है। यह ग्रंथ सबसे खास इसलिए है क्योंकि इसमें दिए गए श्लोक और नीतियां स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने कही हैं। इस ग्रंथ में बताई गई नीतियां न सिर्फ उस समय उपयोगी थीं, बल्कि आज के समय में भी बहुत अधिक महत्व रखती हैं।

 श्रीमद्भागवत में ऐसी दो परिस्थितियों के बारे में कहा गया है, जो हर किसी के जीवन में बार-बार आती हैं। इन परिस्थितियों में मनुष्य कई बार मन को काबू में नहीं रख पाता और खुद का ही नुकसान कर बैठता है। इसलिए, हर किसी को इन दो हालातों का सामना बड़ी ही सूझ-बूझ से और मन को वश में रखकर करना चाहिए।

जानें कौन सी हैं वे दो परिस्थितियां-

न प्रह्दष्येत प्रियं प्राप्त नोद्विजेत् प्राप्य चाप्रियम्।
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः।।

पहली स्थिति है खुशी या सुख की-
सामान्यतः जब भी कोई बहुत खुश होता है, तब वह अपने मन को वश में रखने की जगह खुद उसके वश में हो जाता है। खुशी में कई बार हम ऐसी कुछ बातें कह जाते हैं, जो भविष्य में हमारे लिए पूरा कर पाना संभव न हो या ऐसा कुछ कर जाते हैं, जिसके बुरे परिणाम हमें भविष्य में झेलना पड़ सकते हैं। इसलिए, हर किसी को यह बात हमेशा ध्यान रखनी चाहिए कि कोई भी खुशी हर समय हमारे साथ नहीं रहती, इसलिए खुशी या सुख के समय अपने मन को अपने वश में रखें। साथ ही अपने शब्दों और कार्यों का चुनाव सोच-समझ कर करें।

दूसरी स्थिति है दुःख या परेशानी की-

कई लोग अपने बुरे समय से अपना धैर्य खो देते हैं और अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए अपने मन के अधीन हो कर ऐसे काम करने लगते हैं, जो उन्हें कभी नहीं करना चाहिए। दुःख ही एक ऐसा समय होता है, जब भी मनुष्य आसानी से गलत रास्ते पर चलने या अनैतिक काम करने को मजबूर हो जाता है। इसलिए, हर किसी को यह बात समझनी चाहिए कि कैसा भी समय हो वह हमेशा नहीं टिकता। अगर अपने बुरे या परेशानी के समय में समझदारी से काम लें और किसी भी रूप में अधर्म न करें तो, जल्द ही उसका अच्छा समय भी आ ही जाता है। इसलिए, वर्तमान में दुःख और परेशानी क्यों न हो मनुष्य को अपना मन वश में रखकर सूझ-बूझ से हर काम करना चाहिए।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-JKR-DGRA-geeta-lesson-never-be-uncontrolled-in-these-2-situations-news-hindi-5522097-PHO.html?ref=preco

Monday, February 6, 2017

श्रीकृष्ण को भी इन 2 कारणों से छोड़ना पड़ा था शरीर, जानें क्या थे ये श्राप

महाभारत युद्ध खत्म होने के बाद जब युधिष्ठिर का राजतिलक हो रहा था। तब कौरवों की माता गांधारी ने कौरवों की मौत और महाभारत युद्ध के लिए श्रीकृष्ण को दोषी ठहराते हुए श्राप दिया। उन्होंने कहा जिस प्रकार कौरवों के वंश का नाश हुआ है, ठीक उसी तरह यदुवंश का भी नाश होगा और साथ ही 36 वर्ष बाद आपको भी ये देह छोड़नी होगी। इसी श्राप के चलते श्रीकृष्ण द्वारिका छोड़कर यदुवंशियों को लेकर प्रभास क्षेत्र में आ गए।

कई वर्ष बीत गए। एक बार श्रीकृष्ण के पुत्र सांब को शरारत सूझी। वो कुछ और यदुवंशियों के साथ ऋषि दुर्वासा, वशिष्ठ और नारद जो किसी काम से प्रभास आए थे। उनके पास गर्भवती स्त्री का रूप बनाकर पहुंचा। सांब ने ऋषियों से कहा कि वो गर्भवती है और उसके बच्चे का लिंग बताएं। ऋषियों ने उस पर क्रोधित होकर कहा कि उसके गर्भ से एक मूसल का जन्म होगा। जिससे पूरे यदुवंश का विनाश होगा। ऋषियों की इस श्राप से यदुवंशी घबरा गए और उन्होंने सारी बात उग्रसेन को बताई।

उग्रसेन ने श्राप को विफल करने के लिए मूसल का चूरा करवाकर उसे समुद्र में फिंकवा दिया। उस चूरे का एक टुकड़ा मछली निगल गई और बाकि मूसल समुद्र के किनारे घास के रूप में उग गई। श्राप से प्रभावित यदुवंशी मदिरा पीकर लड़ने लगे और नशे में एक दूसरे पर घास से प्रहार करने लगे। घास प्रहार करते समय मूसल का रूप ले लेती इसी कारण सारे यदुवंश का अंत हुआ। जो टुकड़ा मछली ने निगल लिया वो एक बहलिए को मिल गया और उसने उसका तीर बना लिया। प्रभास क्षेत्र में श्रीकृष्ण ध्यानस्थ थे तब वो तीर उनके पंजे पर जा लगा जिसे बहलिए ने चमकता देख हिरण की आंख समझ लिया था। इस तीर के लगने पर उन्होंने शरीर छोड़ दिया। उसके बाद श्रीकृष्ण की रानियां और यदुवंश के बचे लोग अर्जुन के साथ इंद्रप्रस्थ चले गए।

http://religion.bhaskar.com/news/JM-JMJ-KAK-gandhari-curse-to-shri-krishna-news-hindi-5519221-NOR.html

Saturday, February 4, 2017

क्या है महत्व:-महिलाएँ क्यों पहनती हैं बिछिया और पायल ?

भारत एक ऐसा देश है जहां पर विभिन्न धर्म है। इन धर्मों में कई तरह के रीति-रिवाज और परंपराए है। खासतौर में हिंदू धर्म में। हिंदू धर्म एक ऐसा धर्म है जिसमें आज हर शुभ काम हो या फिर कोई खास मौका सभी में रिवाज होता है। लेकिन आप जानते है कि इन सभी कामों से हमारे शरीर को कितना फायदा मिलता है। साथ ही इससे हमारे दिमाग में भी अधिक प्रभाव पड़ता है।हिंदू धर्म में एक चीज सबसे अलग है वो है किसी महिला का सोलह श्रृंगार। जो पूरी दुनिया में भी फेमस है। इस सोलह श्रृंगार में माथे की बिंदी से लेकर पांव में पहनी जाने वाली बिछिया तक होता है। हर एक चीज का अपना एक महत्व है। परंपराओं की दृष्टि से तो इनके महत्व रोचक हैं। जानिए पांव में पहने जाने वाली बिछिया के पीछे क्या है कारण साथ ही वैज्ञानिक तर्क क्या है।
बिछिया जिसे हिंदू और मुस्लमान दोनों धर्म की महिलाएं पहनती है। कई लोग तो इसे सिर्फ शादी का प्रतीक चिंह ही मानते है, लेकिन क्या आप जानते है कि इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी है। शायद ही आपको यह बात पता हो कि इसे पहनने का सीधा संबंध उनके गर्भाशय से है। विज्ञान में माना जाता है कि पैरों के अंगूठे की तरफ से दूसरी अंगुली में एक विशेष नस होती है जो गर्भाशय से जुड़ी होती है। यह गर्भाशय को नियंत्रित करती है और रक्तचाप को संतुलित कर इसे स्वस्थ रखती है।
प्राचीनकाल में स्त्रियों व लड़कियों को पायल एक संकेत मात्र के लिए पहनाया जाता था| जब घर के सदस्य के साथ बैठे होते थे तब यदि पायल पहने स्त्री की आवाज आती थी तो वह पहले से सतर्क हो जाते थे ताकि वह व्यवस्थित रूप से आने वाली उस महिला का स्वागत कर सकें| पायल की वजह से ही सभी को यह एहसास हो जाता है कि कोई महिला उनके आसपास है अत: वे शालीन और सभ्य व्यवहार करें। ऐसी सारी बातों को ध्यान में रखते हुए लड़कियों के पायल पहनने की परंपरा लागू की गई।
वहीँ, वास्तु के अनुसार, पायल व बिछिया की आवाज से घर में नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव कम हो जाता है इसके अलावा दैवीय शक्तियां अधिक सक्रिय हो जाती है यह भी इसका एक कारण हो सकता है| इसके अलावा पायल की धातु हमेश पैरों से रगड़ाती रहती है जो स्त्रियों की हड्डियों के लिए काफी फायदेमंद है। इससे उनके पैरों की हड्डी को मजबूती मिलती है। बिछिया को कई लोग तो इसे सिर्फ शादी का प्रतीक चिंह ही मानते है, लेकिन इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी यही है कि इसे पहनने का सीधा संबंध उनके गर्भाशय से है। विज्ञान में माना जाता है कि पैरों के अंगूठे की तरफ से दूसरी अंगुली में एक विशेष नस होती है जो गर्भाशय से जुड़ी होती है। यह गर्भाशय को नियंत्रित करती है और रक्तचाप को संतुलित कर इसे स्वस्थ रखती है। बिछिया के दबाव से रक्तचाप नियमित और नियंत्रित रहती है और गर्भाशय तक सही मात्रा में पहुंचती रहती है। यह बिछिया अपने प्रभाव से धीरे-धीरे महिलाओं के तनाव को कम करती है, जिससे उनका मासिक-चक्र नियमित हो जाता है। साथ ही इसका एक और फायदा है। इसके अनुसार बिछिया महिलाओं के प्रजनन अंग को भी स्वस्थ रखने में भी मदद करती है। बिछिया महिलाओं के गर्भाधान में भी सहायक होती है।
शास्त्रों में कहा गया है कि दोनों पैरों में चांदी की बिछिया पहनने से महिलाओं को आने वाली मासिक चक्र नियमित हो जाती है। इससे महिलाओं को गर्भ धारण में आसानी होती है। चांदी विद्युत की अच्छी संवाहक मानी जाती है। धरती से प्राप्त होने वाली ध्रुवीय उर्जा को यह अपने अंदर खींच पूरे शरीर तक पहुंचाती है, जिससे महिलाएं तरोताज़ा महसूस करती हैं।
http://www.bharatvarta.com/women-news/%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%AA%E0%A4%B9%E0%A4%A8%E0%A4%A4%E0%A5%80-%E0%A4%B9%E0%A5%88%E0%A4%82-%E0%A4%AC/

Friday, February 3, 2017

श्रीराम और सीता से सीखें गृहस्थी में किन बातों का ध्यान रखें

भगवान विष्णु के अवतार श्रीराम के जीवन में बहुत परेशानियां थीं, लेकिन सीता के साथ उनका रिश्ता दूसरों के लिए एक प्रेरणा रहा है। श्रीराम और सीता ने 14 वर्ष का वनवास स्वीकार किया, इसके बाद सीता हरण और रावण से युद्ध जैसी बड़ी-बड़ी परेशानियां उनके जीवन में आईं, लेकिन दोनों ने एक-दूसरे के प्रति प्रेम और समर्पण बनाए रखा। रावण वध (विजयादशमी) के बाद अगले दिन यानी आज की तिथि एकादशी पर श्रीराम और सीता का मिलन हुआ था। इस अवसर पर यहां जानिए श्रीराम और सीता के वैवाहिक जीवन से कौन-कौन सी बातें सीख सकते हैं...

एक-दूसरे के प्रति होना चाहिए समर्पण
श्रीरामचरित मानस के एक प्रसंग में जब श्रीराम और सीता ने विवाह के बाद पहली बार बात की तो भगवान ने सीता को वचन दिया कि वे जीवनभर उसी के प्रति निष्ठावान रहेंगे। उनके जीवन में कभी कोई दूसरी स्त्री नहीं आएगी। सीता ने भी वचन दिया कि हर सुख और दुख में वे साथ रहेंगी।

श्रीराम और सीता ने पहली बातचीत में भरोसे और समर्पण का वादा किया। इस वचन के कारण दोनों ही एक-दूसरे के सुख के लिए सोचते थे और कभी भी इनके जीवन में अहंकार और व्यक्तिगत रुचियां नहीं आईं।

जबश्रीराम को जाना था वनवास

जब श्रीराम को वनवास जाना था तो उस समय वे चाहते थे सीता मां कौशल्या के पास ही रुक जाएं। जबकि सीता श्रीराम के साथ वनवास जाना चाहती थीं। कौशल्या भी चाहती थीं कि सीता वनवास न जाए। इस विषय पर सीता की इच्छा और श्रीराम, कौशल्या की इच्छा अलग-अलग थी। आज के समय में सास, बहू और बेटा, इन तीनों के बीच मतभेद होते हैं तो परिवार में तनाव बढ़ जाता है, लेकिन रामायण में श्रीराम के धैर्य, सीताजी और कौशल्याजी की समझ से सभी मतभेद दूर हो गए।

श्रीराम ने सीता को समझाया कि वन में कई प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ेगा। वहां भयंकर राक्षस होंगे, सैकड़ों सांप होंगे, वन की धूप, ठंड और बारिश भी भयानक होती है, समय-समय पर मनुष्यों को खाने वाले जानवरों का सामना करना पड़ेगा, तरह-तरह की विपत्तियां आएंगी। इन सभी परेशानियों का सामना करना बहुत ही मुश्किल होगा। इस प्रकार समझाने के बाद भी सीता नहीं मानीं और वनवास जाने के लिए श्रीराम को मना लिया।

सीता ने श्रीराम के प्रति समर्पण का भाव दर्शाया और अपने जीवन साथी के साथ वे भी वनवास गईं। समर्पण की इसी भावना की वजह से श्रीराम और सीता का वैवाहिक जीवन आदर्श माना गया है।

केवट के सामने सीता ने ऐसे समझी श्रीराम के मन की बात

केवट ने श्रीराम, लक्ष्मण, सीता और निषादराज को अपनी नाव में बैठाकर गंगा नदी पार करवा दिया। नदी के दूसरे किनारे पर पहुंचकर श्रीराम और सभी नाव से उतर गए, तब श्रीराम के मन में कुछ संकोच हुआ।

इस संबंध में श्रीरामचरित मानस में लिखा है कि-

पिय हिय की सिय जाननिहारी। मनि मुदरी मन मुदित उतारी।।

कहेउ कृपाल लेहि उतराई। केवट चरन गहे अकुलाई।।

इस दोहे का अर्थ यह है कि जब सीता ने श्रीराम के चेहरे पर संकोच के भाव देखे तो सीता ने तुरंत ही अपनी अंगूठी उतारकर उस केवट को भेंट में देनी चाही, लेकिन केवट ने अंगूठी नहीं ली। केवट ने कहा कि वनवास पूरा करने के बाद लौटते समय आप मुझे जो भी उपहार देंगे मैं उसे प्रसाद समझकर स्वीकार कर लूंगा।

सीता ने श्रीराम के चेहरे पर संकोच के भाव देखते ही समझ लिया कि वे केवट को कुछ भेंट देना चाहते हैं, लेकिन उनके पास देने के लिए कुछ नहीं था। यह बात समझते ही सीता ने अपनी अंगूठी उतारकर केवट को देने के लिए आगे कर दी। यह प्रसंग बताता है कि पति और पत्नी के बीच ठीक इसी प्रकार की समझ होनी चाहिए। वैवाहिक जीवन में दोनों की आपसी समझ जितनी मजबूत होगी, वैवाहिक जीवन उतना ही ताजगीभरा और आनंददायक बना रहेगा।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-FMT-family-management-tips-from-shri-ram-charit-manas-in-hindi-5149201-PHO.html

Thursday, February 2, 2017

नेपाल की नदी है तुलसी का अवतार, पूजे जाते हैं इसके पत्थर

भारत की सीमा से सटा नेपाल एक बहुत ही खूबसूरत देश है। यहां की धार्मिक व सांस्कृतिक परंपराएं भी भारत से काफी मिलती-जुलती हैं। इसका कारण यह है कि नेपाल मूलत: पुरातन भारत की ही एक हिस्सा है। समय के साथ में नेपाल एक अलग देश के रूप में स्थापित हो गया, लेकिन यहां आज भी कदम-कदम पर भारतीय संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। यहां कई ऐसे स्थान भी हैं, जिनका वर्णन हिंदू धर्म ग्रंथों में किया गया है। नेपाल की गंडकी नदी भी उन्हीं में से एक है।
तुलसी बनी गंडकी नदी

शिवपुराण के अनुसार, दैत्यों के राजा शंखचूड़ की पत्नी का नाम तुलसी था। तुलसी के पतिव्रत के कारण देवता भी उसे हराने में असमर्थ थे। तब भगवान विष्णु ने छल से तुलसी का पतिव्रत भंग कर दिया, जिसके कारण शंखचूड़ की मृत्यु हो गई। जब यह बात तुलसी को पता चली तो उसने भगवान विष्णु को पत्थर बन जाने का श्राप दिया। भगवान विष्णु ने तुलसी का श्राप स्वीकार कर लिया और कहा कि तुम धरती पर गंडकी नदी तथा तुलसी के पौधे के रूप में रहोगी।

इस नदी में मिलते हैं शालिग्राम


गंडकी नदी में एक विशेष प्रकार के काले पत्थर मिलते हैं, जिन पर चक्र, गदा आदि के निशान होते हैं। धर्म ग्रंथों के अनुसार, यही पत्थर भगवान विष्णु का स्वरूप हैं। इन्हें शालिग्राम शिला कहा जाता है। शिवपुराण के अनुसार, भगवान विष्णु ने खुद ही गंडकी नदी में अपना वास बताया था और कहा था कि गंडकी नदी के तट पर मेरा (भगवान विष्णु का) वास होगा। नदी में रहने वाले करोड़ों कीड़े अपने तीखे दांतों से काट-काटकर उस पाषाण में मेरे चक्र का चिह्न बनाएंगे और इसी कारण इस पत्थर को मेरा रूप मान कर उसकी पूजा की जाएगी।

शालिग्राम और तुलसी विवाह की हैं परंपरा


धर्म ग्रंथों के अनुसार, एक समय पर तुलसी ने भगवान विष्णों को अपने पति के रूप में पाने के लिए कई सालों तक तपस्या की थीं, जिसके फलस्वरूप भगवान ने उसे विवाह का वरदान दिया था। जिसे देवप्रबोधिनी एकादशी पर पूरा किया जाता है। देवप्रबोधिनी एकादशी के दिन शालिग्राम शिला तथा तुलसी के पौधा का विवाह करवाने की परंपरा है।
जानिए कहां है गंडकी नदी

गंडकी नदी को गंडक नदी और नारायणी भी कहा जाता है। यह मध्य नेपाल और उत्तरी भारत में प्रवाहित होने वाली नदी है। गंडकी नदी दक्षिण तिब्बत के पहाड़ों से निकलती है। यह सोनपुर और हाजीपुर के बीच में गंगा नदी में जाकर मिल जाती है। यह काली नदी और त्रिशूली नदियों के संगम से बनी है। इन नदियों के संगम स्थल से भारतीय सीमा तक नदी को नारायणी के नाम से जाना जाता है। यह नेपाल की सबसे बड़ी नदियों में से एक है। महाभारत के भी गंडकी नदी का उल्लेख मिलता है।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-TID-mythological-storie-related-to-gandhi-river-nepal-news-hindi-5518390-PHO.html