Tuesday, October 18, 2016

कार्तिक मास आज से, 16 दिन रहेगी व्रत-उत्सवों की धूम

पर्वों और दान-पुण्य का सबसे बड़ा महीना कार्तिक मास 17 अक्टूबर, सोमवार से शुरू हो चुका है, जो 14 नवंबर, सोमवार को समाप्त होगा। हिंदू धर्म के इस पवित्र महीने में मंदिरों में धार्मिक अनुष्ठान चलेंगे। श्रद्धालु तुलसी-शालिगराम पूजन करेंगे और देव आराधना के साथ धन-संपत्ति, व्यापार-कारोबार में वृद्धि के लिए पूजा-अर्चना कर कामना करेंगे। इस महीने में 16 दिन पर्व रहेंगे।

कार्तिक में महिलाओं के पर्व ज्यादा

19 अक्टूबर, बुधवार से प्रमुख पर्वों की शुरुआत करवा चौथ से हो रही है। सुहागिन महिलाओं के लिए यह सबसे बढ़ा पर्व है। इसके बाद स्कंद षष्ठी, रमा एकादशी, गोवत्स द्वादशी व्रत के साथ सौंदर्य का पर्व रूप चौदस, सुहाग पड़वा, आंवला नवमी जैसे पर्व भी महिलाओं से जुड़े हैं।

जानिए क्यों खास है कार्तिक महीना

1.हिंदू पंचांग के 12 मास में कार्तिक भगवान विष्णु का मास है। इसमें नक्षत्र-ग्रह योग, तिथि पर्व का क्रम धन, यश-ऐश्वर्य, लाभ, उत्तम स्वास्थ्य देता है।

2. कार्तिक मास हिंदू शास्त्र गणना के आधार पर वर्ष आरंभ का समय माना जाता है।
3. 
इसी मास में शिव पुत्र ने तारकासुर राक्षस का वध किया था, इसलिए इसका नाम कार्तिक पड़ा, जो विजय देने वाला है।

जानिए किस दिन कौन सा पर्व

19 अक्टूबर- करवा चौथ
22
अक्टूबर- अहोई अष्टमी
26
अक्टूबर- रमा एकादशी व्रत, गोवत्स द्वादशी
28
अक्टूबर- धनतेरस
29
अक्टूबर- रूप चौदस
30
अक्टूबर- दीपावली
31
अक्टूबर- गोवर्धन पूजा, अन्नकूट
1
नवंबर- भाई दूज
3
नवंबर- विनायक चतुर्थी व्रत
4
नवंबर- पांडव पंचमी
6
नवंबर- सूर्य षष्ठी
8
नवंबर- गोपाष्टमी
9
नवंबर- आंवला नवमी
10
नवंबर- देवउठनी ग्यारस
13
नवंबर- वैकुंठ चतुर्दशी
14
नवंबर- कार्तिक पूर्णिमा

Monday, October 17, 2016

महर्षि वाल्मीकि ने लिखी रामायण

पुराणों के अनुसार, इन्होंने कठोर तपस्या कर महर्षि का पद प्राप्त किया था। परमपिता ब्रह्मा के कहने पर इन्होंने भगवान श्रीराम के जीवन पर आधारित रामायण नामक महाकाव्य लिखा। ग्रंथों में इन्हें आदिकवि कहा गया है। इनके द्वारा रचित आदिकाव्य श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण संसार का सर्वप्रथम काव्य माना गया है।

इस प्रकार लिखी महर्षि वाल्मीकि ने रामायण
रामायण के अनुसार, एक बार महर्षि वाल्मीकि तमसा नदी के तट पर गए। वहां उन्होंने प्रेम करते क्रौंच (सारस) पक्षी के जोड़े को देखा। वे दोनों पक्षी मधुर बोली बोलते थे। तभी उन्होंने देखा कि एक निषाद (शिकारी) ने क्रौंच पक्षी के जोड़े में से नर पक्षी का वध कर दिया और मादा पक्षी विलाप करने लगी। उसके इस विलाप को सुन कर महर्षि की करुणा जाग उठी और अनायास ही उनके मुख से ये शब्द निकले-

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगम: शाश्वती: समा:।
यत् क्रौंचमिथुनादेकमवधी: काममोहितम्॥

अर्थात- निषाद। तुझे कभी भी शांति न मिले, क्योंकि तूने इस क्रौंच के जोड़े में से एक की, जो काम से मोहित हो रहा था, बिना किसी अपराध के ही हत्या कर डाली।

तब महर्षि वाल्मीकि ने सोचा कि अचानक ही उनके मुख से श्लोक की रचना हो गई। जब महर्षि वाल्मीकि अपने आश्रम पहुंचे तब भी उनका ध्यान उस श्लोक की ओर ही था। तभी महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में भगवान ब्रह्मा आए और उनसे कहा कि- आपके मुख से निकला यह छंदोबद्ध वाक्य (गाया जाने वाला) श्लोक रूप ही होगा। मेरी प्रेरणा से ही आपके मुख से ऐसी वाणी निकली है। अत: आप श्लोक रूप में ही श्रीराम के संपूर्ण चरित्र का वर्णन करें। इस प्रकार ब्रह्माजी के कहने पर महर्षि वाल्मीकि ने रामायण महाकाव्य की रचना की।

रत्नाकर से बने महर्षि वाल्मीकि
धर्म ग्रंथों के अनुसार, महर्षि वाल्मीकि का पूर्व नाम रत्नाकर था। ये अपने परिवार के पालन-पोषण के लिए लूट-पाट करते थे। एक बार उन्हें निर्जन वन में नारद मुनि मिले। जब रत्नाकर ने उन्हें लूटना चाहा, तो उन्होंने रत्नाकर से पूछा कि- यह काम तुम किसलिए करते हो? तब रत्नाकर ने जवाब दिया कि- अपने परिवार
के भरण-पोषण के लिए। नारद ने प्रश्न किया कि- इस काम के फलस्वरूप जो पाप तुम्हें होगा, क्या उसका दंड भुगतने में तुम्हारे परिवार वाले तुम्हारा साथ देंगे?
नारद मुनि के प्रश्न का जवाब जानने के लिए रत्नाकर अपने घर गए। परिवार वालों से पूछा कि- मेरे द्वारा किए गए काम के फलस्वरूप मिलने वाले पाप के दंड में क्या तुम मेरा साथ दोगे? रत्नाकर की बात सुनकर सभी ने मना कर दिया। रत्नाकर ने वापस आकर यह बात नारद मुनि को बताई। तब नारद मुनि ने कहा कि- जिन लोगों के लिए तुम बुरे काम करते हो यदि वे ही तुम्हारे पाप में भागीदार नहीं बनना चाहते तो फिर क्यों तुम यह पापकर्म करते हो?
नारद मुनि की बात सुनकर इनके मन में वैराग्य का भाव आ गया। अपने उद्धार के उपाय पूछने पर नारद मुनि ने इन्हें राम नाम का जाप करने के लिए कहा। रत्नाकर वन में एकांत स्थान पर बैठकर राम-राम जपने लगे। कई सालों तक कठोर तप के बाद उनके पूरे शरीर पर चींटियों ने बाँबी बना ली, इसी वजह से इनका वाल्मीकि पड़ा। कालांतर में महर्षि वाल्मीकि ने रामायण महाकाव्य की रचना की।

प्रचेता के पुत्र थे महर्षि वाल्मीकि
महर्षि वाल्मीकि को कुछ लोग निम्न वर्ग का मानते हैं, जबकि वाल्मीकि रामायण में स्वयं वाल्मीकि ने श्लोक संख्या 7/93/17, 7/93/19 और आध्यात्म रामायण 7/7/31 में इन्होंने स्वयं को प्रचेता का पुत्र कहा है।

प्रचेतसोअहं दशम: पुत्रो राघवनन्दन
मनुस्मृति 1/35 में प्रचेता को वशिष्ठ, नारद, पुलस्त्य, कवि आदि का भाई बताया गया है। स्कंदपुराण के वैशाख माहात्म्य में इन्हें जन्मांतर (पूर्व जन्म) का व्याध (शिकारी) बतलाया है। व्याध जन्म के पहले ये स्तंभ नाम के श्रीवस्तगोत्रीय ब्राह्मण थे। व्याध जन्म में शंख ऋषि के सत्संग से, राम नाम के जाप से ये दूसरे जन्म में अग्निशर्मा (मतांतर से रत्नाकर) हुए। वहां भी व्याधों के संग के कुछ दिन संस्कारवश व्याध कर्म करने लगे। फिर सप्तर्षियों के सत्संग से मरा-मरा जपकर बांबी पड़ने से वाल्मीकि नाम से प्रसिद्ध हुए और वाल्मीकि रामायण की रचना की।

ये भी जानिए

1.महर्षि वाल्मीकि ने रामायण महाकाव्य में अनेक स्थानों पर सूर्य, चंद्र, व अन्य नक्षत्रों की स्थितियों का वर्णन किया है। साथ ही उन्होंने रावण की मृत्यु के पूर्व राक्षसी त्रिजटा के स्वप्न, श्रीराम के यात्राकालिक मुहूर्त विचार, विभीषण द्वारा लंका के अपशकुनों आदि के बारे में विस्तार पूर्वक बताया है। इससे पता चलता होता है कि महर्षि वाल्मीकि ज्योतिष विद्या एवं खगोल विद्या के भी प्रकांड पंडित थे।
2. अपने वनवास काल के दौरान भगवान श्रीराम लक्ष्मण व सीता सहित महर्षि वाल्मीकि के आश्रम गए थे।
श्रीरामचरितमानस के अनुसार-
देखत बन सर सैल सुहाए। बालमीक आश्रम प्रभु आए॥
 
तथा जब श्रीराम ने सीता का परित्याग कर दिया, तब महर्षि वाल्मीकि ने ही सीता को आश्रय दिया था। इससे सिद्ध होता है कि महर्षि वाल्मीकि श्रीराम के समकालीन थे तथा उनके जीवन में घटित प्रत्येक घटनाओं की जानकारी महर्षि वाल्मीकि को थी।

3. रामायण महाकाव्य में 24 हजार श्लोक, पांच सौ उपखंड तथा उत्तर सहित सात कांड हैं।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-JKR-DHAJ-valmiki-jayanti-today-16-october-sunday-news-hindi-5438348-PHO.html

Saturday, October 15, 2016

क्या आप जानते हैं क्यों खास है ये शरद पूर्णिमा की रात ?

आश्विन मास की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं। यूं तो हर माह में पूर्णिमा आती है, लेकिन शरद पूर्णिमा का महत्व उन सभी से कहीं अधिक है। हिंदू धर्म ग्रंथों में भी इस पूर्णिमा को विशेष बताया गया है। जानिए शरद पूर्णिमा की रात इतनी खास क्यों है, इससे जुड़े विभिन्न पहलू व मनोवैज्ञानिक पक्ष-

चंद्रमा से बरसता है अमृत
शरद पूर्णिमा से जुड़ी कई मान्यताएं हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन चंद्रमा की किरणें विशेष अमृतमयी गुणों से युक्त रहती हैं, जो कई बीमारियों का नाश कर देती हैं। यही कारण है कि शरद पूर्णिमा की रात को लोग अपने घरों की छतों पर खीर रखते हैं, जिससे चंद्रमा की किरणें उस खीर के संपर्क में आती है, इसके बाद उसे खाया जाता है। कुछ स्थानों पर सार्वजनिक रूप से खीर का प्रसाद भी वितरण किया जाता है।

श्रीकृष्ण ने रचाया था रास
शरद पूर्णिमा से जुड़ी एक मान्यता यह भी है कि इस दिन माता लक्ष्मी रात्रि में यह देखने के लिए घूमती हैं कि कौन जाग रहा है और जो जाग रहा है महालक्ष्मी उसका कल्याण करती हैं तथा जो सो रहा होता है वहां महालक्ष्मी नहीं ठहरतीं। शरद पूर्णिमा को रासलीला की रात भी कहते हैं। धर्म शास्त्रों के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात को ही भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ रास रचाया था।

खीर खाने का है महत्व
शरद पूर्णिमा की रात का अगर मनोवैज्ञानिक पक्ष देखा जाए तो यही वह समय होता है जब मौसम में परिवर्तन की शुरूआत होती है और शीत ऋतु का आगमन होता है। शरद पूर्णिमा की रात में खीर का सेवन करना इस बात का प्रतीक है कि शीत ऋतु में हमें गर्म पदार्थों का सेवन करना चाहिए क्योंकि इसी से हमें जीवनदायिनी ऊर्जा प्राप्त होगी।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-JKR-DHAJ-shrad-purnima-on-15-october-saturday-news-hindi-5436918-PHO.html

Friday, October 14, 2016

सोच इस तरह की हो तभी देश महान बनता है

यह उन दिनों की बात है, जब स्वामी रामतीर्थ जापान में थे। स्वामी जी रेल से एक शहर से दूसरे शहर घूम रहे थे। उन दिनों वह अन्न नहीं खाते थे, फलाहार ही करते थे। एक दिन ऐसा हुआ कि वह गाड़ी से यात्रा कर रहे थे और उन्हें खोजने पर भी कहीं फल नहीं मिल सके। स्वामी जी को तेज भूख लग गई थी। गाड़ी एक स्टेशन पर ठहरी।स्वामी जी ने इधर-उधर नजर दौड़ाई, मगर उन्हें फल न दिखाई दिए। सहसा उनके मुंह से निकल पड़ा, लगता है, जापान फलों के मामले में बड़ा गरीब है।

स्वामी जी के डिब्बे के सामने खड़े एक युवक ने उनकी यह बात सुन ली। वह अपनी पत्नी को गाड़ी में बिठाने आया था। यह सुनकर वह दौड़ा-दौड़ा स्टेशन से बाहर गया और एक टोकरी फल लेकर स्वामी जी के पास आया और बोला, ये लीजिए फल। आपको इनकी जरूरत है।

स्वामी जी ने समझा, शायद यह कोई फल बेचने वाला है। उन्होंने फल ले लिए और पूछा, मूल्य कितना है? युवक ने कहा, इनका कोई मूल्य नहीं है, ये आपके लिए हैं।

स्वामी जी ने फिर पैसे लेने का आग्रह किया तो युवक बोला, आप फलों की कीमत देना ही चाहते हैं तो आपसे प्रार्थना है कि अपने देश जाकर किसी से यह न कहें कि जापान फलों के मामले में गरीब देश है। बस यही इनका मूल्य है।रामतीर्थ उस जापानी युवक का उत्तर सुनकर बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने मन ही मन सोचा कि जिस देश का हर एक नागरिक अपने देश के सम्मान का इतना ध्यान रखता है, वह मुल्क सचमुच महान है।

अपने रास्ते से कभी नहीं भटकना चाहिए क्योंकि...

चीन में एक युवा भिक्षु था। वह बौद्ध धर्म के ग्रंथों को बहुत मन लगाकर पढ़ता था। भगवान बुद्ध की शिक्षाओं को सुनता और उन्हें अपने जीवन में उतारने की कोशिश करता। पढ़ने में उसकी गंभीरता देखकर हर कोई उसकी तारीफ करता था।
 
एक दिन उसने ऐसी कोई बात पढ़ ली जो उसे बिल्कुल भी समझ में नहीं आई। बार-बार पढ़ने पर भी जब समझ नहीं पाया तो वह उसे समझने के लिए अपने गुरु के पास गया। उसने अपने गुरु से कहा कि आज तक उसने अपनी प्रतिभा से सारा ज्ञान अर्जित कर लिया लेकिन आज सवाल का जवाब नहीं मिल रहा है, जब ये सुना तो वे जोर-जोर से हंसने लगे। वे उठे और वहां से उसी प्रकार हंसते हुए चले गए।

 गुरु की यह प्रतिक्रिया देखकर भिक्षु बुरी तरह विचलित हो गया। अगले तीन दिन तक न तो वह ठीक से सो पाया, न सोच पाया और न ही कुछ खा और पी सका। तीन दिन बाद वह गुरु के पास गया और उन्हें बताया कि वह कितना विचलित हो गया है। गुरु ने कहा भिक्षु तुम्हें मालूम है तुम्हारी समस्या क्या है। भिक्षु ने इंकार में सिर हिलाया। फिर उन्होंने कहा तुम सर्कस के जोकर से भी गए-गुजरे हो। यह सुनकर भिक्षु तो सन्न रह गया। उसने पूछा गुरुदेव आप ऐसे कैसे कह सकते हैं। मैं जोकर से कैसे गया-गुजरा हो सकता हूं।

 गुरु ने स्पष्ट किया, जब लोग जोकर पर हंसते हैं तो वह उसका लुत्फ उठाता है और तुम। तुम इसलिए विचलित हो गए क्योंकि दूसरा व्यक्ति तुम पर हंसा। मुझे बताओं क्या तुम जोकर से भी खराब हालत में नहीं हो? जब भिक्षु ने यह सुना तो वह जोर-जोर से हंसने लगा और उसी समय उसे बुद्धत्व की प्राप्ति हो गई।

 दरअसल, गुरु ने भांप लिया था कि गंभीर अध्ययन से उसका अहंकार बढ़ गया है। इस घमंड से मुक्त हुए बिना इसकी मुक्ति संभव नहीं। गुरु की इस कोशिश से अहंकार दूर होते ही बरसों की साधना का फल साकार हो गया।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-JMJ-SAS-inspirational-stories-5328232-NOR.html

Thursday, October 13, 2016

भगवान को फूल चढ़ाने के क्या हैं फायदे?

सनातन धर्म में भगवान को पुष्प या फूल चढ़ाने को विशेष महत्व दिया गया है। देवी-देवताओं और भगवान को आरती, व्रत, उपवास या त्योहारों पर फूल चढाएं जाते हैं। धार्मिक, अनुष्ठान, संस्कार व सामाजिक कार्यों को बिना फूलों के अधूरा समझा जाता है, लेकिन फिर भी कम ही लोग ये जानते हैं कि भगवान को फूल क्यों चढाएं जाते है। यदि आप भी इसका कारण नहीं जानते हैं तो आइए हम आपको बताते हैं क्या कहते हैं धर्मग्रंथ….


हमारे धर्मग्रंथों मे पुष्प के बारे में कहा गया है

पुण्य संवर्धनाच्चापि पापौघपरिहारत। पुष्कलार्थप्रदानार्थ पुष्पमित्यभिधीयते।।

अर्थ- इसका मतलब है पुण्य को बढ़ाने, पापों को घटाने और फल को देने के कारण ही इसे पुष्प या फूल कहा जाता है।

दैवस्य मस्तकं कुर्यात्कुसुमोपहितं सदा।
अर्थ- देवता का मस्तक या सिर हमेशा फूलों से सुशोभित रहना चाहिए।


पुष्पैर्देवां प्रसीदन्ति पुष्पै देवाश्च संस्थिता
न रत्नैर्न सुवर्णेन न वित्तेन च भूरिणा
तथा प्रसादमायाति यथा पुष्पैर्जनार्दन।


अर्थ- देवता लोग रत्न, सुवर्ण, भूरि, द्रव्य, व्रत, तपस्या या और किसी चीज से उतने प्रसन्न नहीं होते, जितना फूल या पुष्प चढ़ाने से होते हैं।

फूल चढ़ाने का ये है बड़ा कारण

मान्यता है कि पुष्प अर्पित करने से भगवान तुरंत ही प्रसन्न हो जाते हैं। फूलों की सुगंध से हमारे घर का वातावरण महकता रहता है, जिससे मन को शांति मिलती है। दिमाग में हमेशा सकारात्मक विचार आते हैं। नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव घर से नष्ट हो जाता है।

ये हमें अच्छा जीवन जीने की भी प्रेरणा देते हैं। फूलों का जीवन कम अवधि का होता है, लेकिन फिर भी वे जब तक मुरझा नहीं जाते तब तक वातावरण में सुगंध फैलाते रहते हैं। इसी प्रकार हमें भी समाज में ऐसा ही स्वभाव रखना चाहिए जिससे हमारे आस-पास लोगों को सुख की प्राप्ति हो सके।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-JMJ-GYVG-what-are-the-advantages-of-a-wreath-to-god-5331960-NOR.html

Wednesday, October 12, 2016

अगर यहां देवता न करते छल तो फिर रावण को कोई नहीं हरा पाता

आज हिंदू धर्म की दृष्टि से बहुत ही खास दिन है, क्योंकि इसी दिन भगवान राम ने राक्षसराज रावण का वध करके लंका पर विजय पाई थी। रावण बहुत पराक्रमी और ताकतवर था, फिर भी उसे कई बार हार और निराशा का सामना करना पड़ा था। ऐसी ही रावण की हार का एक किस्सा भगवान शिव, विष्णु और भगवान वरुण से जुड़ा हुआ था। यहां पर अपनी पूरी ताकत लगाने पर भी रावण अपने काम में विजय प्राप्त नहीं कर पाया था और आखिरकार उसे हार मानना ही पड़ी थी।

इस तरह हुई थी रावण की हार

वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग के यहां पर स्थापित होने के पीछे रावण से जुड़ी एक रोचक कहानी है। इसके अनुसार, रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की। उसकी तपस्या से खुश होकर भगवान शिव ने उसे दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा। भगवान शिव के ऐसा कहने पर रावण ने भगवान से उसके साथ लंका चल वहीं पर निवास करने की प्रार्थना की। रावण की इच्छा पूरी करने के लिए भगवान शिव ने उसे लंका ले जाने के लिए अपना ही एक स्वरूप शिवलिंग दिया और एक शर्त रखी। शर्त यह थी कि रावण जिस भी स्थान पर भगवान का यह लिंग रख देता, वो हमेशा के लिए उसी जगह पर स्थापित हो जाएंगे। सभी देवता यह नहीं चाहते थे कि भगवान शिव लंका में निवास करें, अगर ऐसा होता तो श्रीराम कभी रावण का वध नहीं कर पाते। जब रावण शिवलिंग को लेकर लंका जाने लगा तभी जल के देवता वरुण ने छल से रावण को लघु शंका के वेश से परेशान कर दिया। उसी समय भगवान विष्णु ब्राह्मण का रूप धारण करके वहां आ गए। मजबूर होकर रावण को शिवलिंग कुछ समय के लिए उस ब्राह्मण को दे दिया। रावण के वहां से जाते ही ब्राह्मण रूपी विष्णु ने उसे उसी जगह पर स्थापित कर दिया। तब से भगवान शिव उसी स्थान पर वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थित हैं।


खास हैं यह ज्योतिर्लिंग

यह ज्योतिर्लिंग बहुत ही खास है क्योंकि भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से सबसे छोटा यही है। कहा जाता है जब ब्राह्मण रूपी भगवान विष्णु ने इसे धरती पर रखा तो यह नीचे धंस गया और भूमि के ऊपर केवल चार ऊंगल ही शेष रहा। इस प्रकार यहां का शिवर्लिंग बाकी ज्योतिर्लिंगों में से सबसे छोटा है।

एक भील ने की थी सबसे पहले वैद्यनाथ की पूजा

जब रावण ने शिवलिंग को धरती पर रखा देखा, तो उसने उसे वहां से उठाने की बहुत कोशिश की। भगवान शिव अपनी शर्त के अनुसार उसी स्थान पर रहे। बहुत कोशिश करने के बाद रावण वहां से अकेला ही लंका लौट आया। कहा जाता है कि रावण के वहां से चले जाने के बाद बैजू नाम के एक भील ने सबसे पहले उस लिंग को देखा था और उसकी पूजा की थी।

आज ऐसा है वैद्यनाथ मंदिर

वैद्यनाथ धाम में कई मंदिर है, जिनमें से मुख्य मंदिर वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का है। यहां के 24 शिव मंदिरों का घेरा प्रसिद्ध है। जिनमें सबसे मुख्य गौरी मंदिर है। यह मंदिर देवी सती के इक्यावन शक्तिपीठों में से एक है। इस मंदिर में एक ही सिंहासन पर मां दुर्गा और मां त्रिपुरसुंदरी की दो मूर्तियां विराजमान है।

वैद्यनाथ धाम में हैं और भी कई मंदिर

वैद्यनाथ धाम में भगवान शिव और मां दुर्गा के अलावा कार्तिकेय मंदिर, गणपति मंदिर, ब्रह्मा मंदिर, संध्या मंदिर, कालभैरव मंदिर, मनसा देवी मंदिर,सरस्वती मंदिर, सूर्य मंदिर, बगलामुखी देवी मंदिर, श्रीराम मंदिर, कालिका मंदिर, देवी अन्नपूर्णा मंदिर, लक्ष्मी-नारायण मंदिर जैसे कुल 24 मंदिरों का परिक्रमा मार्ग है।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-TID-baidyanath-temple-and-ravan-in-hindi-news-hindi-5434385-PHO.html