Thursday, December 21, 2017

खाना खाते समय न करें ये गलती, नहीं तो हो सकते हैं गरीब

हमारे धर्म ग्रंथों में दैनिक जीवन से जुड़े हर काम के लिए कुछ नियम बताए गए हैं। ऐसे ही कुछ नियम भविष्य पुराण में भी मिलते हैं, जो भोजन से संबंधित हैं। आज हम आपको भोजन से जुड़े उन्हीं नियमों के बारे में बता रहे हैं।


1. पूर्व की ओर मुख करके भोजन करने से आयु व पश्चिमी की ओर मुख करके भोजन करने से धन लाभ होता है।

2. उत्तर की ओर मुख करके भोजन करने से सम्मान व दक्षिण की ओर मुख करके भोजन करने से प्रसिद्धि मिलती है।

3. एक बार बैठकर पेट भर भोजन करना चाहिए। भोजन के बीच-बीच में उठकर जाने से धन का नाश हो जाता है।

4. छोड़े हुए भोजन को दोबारा नहीं खाना चाहिए, इससे उम्र कम होती है। अधिक भोजन भी नहीं करना चाहिए।

5. कभी किसी को झूठा भोजन खाने के लिए नहीं देना चाहिए और न ही किसी का झूठा भोजन खाना चाहिए।

6. झूठे मुंह कहीं जाना नहीं चाहिए। यानी जब भी कुछ खाएं तो उसके बाद थोड़ा पानी जरूर पीना चाहिए।

7. भोजन आनन्द पूर्वक करना चाहिए। भोजन में कुछ कमी रह गई हो तो भी उसकी बुराई नहीं करनी चाहिए।

Wednesday, December 20, 2017

पुराणों में 5 ऐसे कामों के बारे में बताया गया जो जप करते समय भूलकर भी नहीं करना चाहिए।

जप करना देवी-देवताओं को प्रसन्न करने का और उनकी कृपा पाने का एक आसान तरीका होता है। जप करते समय पूरे विधि-विधान का ध्यान रखना जरूरी होता है। पूरी क्रिया और श्रद्धा के साथ किया गया जप शुभ फल देना वाला होता है। पुराणों में जप से संबंधित कई बातें बताई गई हैं, जिनका ध्यान हर किसी को रखना ही चाहिए। पुराणों में 6 ऐसे कामों के बारे में बताया गया जो जप करते समय भूलकर भी नहीं करना चाहिए।
1. छींकना मना है
देवी-देवताओं का जप करते समय मनुष्य को अपनी छींक या खांसी पर नियंत्रण रखना चाहिए। भगवान का ध्यान करते समय छींकने से मुंह अपवित्र हो जाता है और अपवित्र मुंह से भगवान का नाम लेना वर्जित माना जाता है। अगर भगवान का जप करते समय छींक या खांसी आ जाए तो तुरंत हाथ-मुंह थो कर, पवित्र हो जाना चाहिए और उसके बाद ही जप दोबारा शुरू करना चाहिए।

2. खांसी आना

इसमें कोई संदेह नहीं है कि छींक आना या खांसी आना एक प्राकृतिक क्रिया है। इसे रोक सकना कई बार नामुमकिन हो जाता है। यदि जप करने के दौरान ऐसा हो तो छींकने या खांसने के तुरंत बाद हाथ-मुंह धो कर, पवित्र हो जाना चाहिए और उसके बाद ही जप दोबारा शुरू करना चाहिए।

3. थूकना मना है

जब कभी आप देवी-देवताओं का ध्यान करते हुए जप कर रहे हैं, तो थूकने जैसे बुरे काम नहीं करने चाहिए। क्योंकि थूकते समय हम अपने शरीर की गंदगी को बाहर निकालते हैं। और ऐसा यदि जप के दौरान किया जाए, तो अपवित्र माना जाता है।

4. उबासी मना है

यह बहुत लोगों की आदत होती है, अकसर वे जप करते समय उबासी जरूर लेते हैं। लेकिन अगर आप सच में देवी-देवताओं को प्रसन्न करना चाहते हैं तो ऐसा करने से बचें। क्योंकि यह आलस्य की निशानी होती है और जप के दौरान आलस्य कैसा?

5. क्रोध मना है

जाप मन को शांत करने के लिए भी किया जाता है। जाप करते समय पूर्ण निष्ठा एवं भक्ति की जरूरत पढ़ती है, इस बीच क्रोध करने से जाप में मन लगाना संभव नहीं है। इसलिए क्रोध करने से बचें

6. नशा मना है


हिन्दू धर्म हो या कोई भी अन्य धर्म, भगवान का नाम लेने के लिए तन एवं मन दोनों की शुद्धि होना जरूरी है। जो मनुष्य शराब पीता या नशा करता है, उसके सभी पुण्य कर्म नष्ट हो जाते हैं और उसे नर्क की प्राप्ति होती है। भगवान का ध्यान या जप करते समय नशे के बारे में सोचना भी महापाप माना गया है।

Tuesday, December 19, 2017

इस मंदिर में प्रार्थना कर युद्ध जीते थे अर्जुन, यहीं हुआ था श्रीकृष्ण का मुंडन

भारत में ऐसी कई जगहें हैं, जो कि ऐतिहासिक और धार्मिक नजरिए से बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसी ही एक जगह है हरियाणा के प्रसिद्ध स्थल कुरुक्षेत्र में। कुरुक्षेत्र में हरियाणा का एकमात्र शक्तिपीठ देवीकूप भद्रकाली शक्तिपीठ स्थापित है। इतना ही नहीं इस जगह का खास संबंध भगवान श्रीकृष्ण और महाभारत के युद्ध से भी माना जाता है।

यहां गिरा था देवी सती है दायां पैर
देवी सती के आत्मदाह के बाद जब भगवान शिव देवी सती का देह लेकर ब्रह्मांड में घूमने लगे तो भगवान विष्णु ने देवी सती के प्रति भगवान शिव का मोह तोड़ने के लिए अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को 52 हिस्सों में बांट दिया था। जहां-जहां देवी सती के शरीर के भाग गिरे थे, वहां-वहां शक्तिपीठ स्थापित हुए। यहां पर देवी सती का दायां पैर (घुटने के नीचे का भाग) गिरा था।

यहीं हुआ था श्रीकृष्ण का मुंडन
इस जगह का संबंध सिर्फ देवी सती से ही नहीं भगवान कृष्ण से भी माना जाता है। मान्यताओं के अनुसार, इसी जगह पर भगवान श्रीकृष्ण का मुंडन किया गया था। जिसके कारण इस जगह का महत्व और अधिक बढ़ जाता है।

यहीं अर्जुन ने मां भद्रकाली से की थी जीत की प्रार्थना
मान्यताओं के अनुसार, महाभारत के युद्ध से पहले जीत के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यहीं पर मां भद्रकाली की पूजा करने को कहा था। श्रीकृष्ण के कहने पर अर्जुन ने देवी की पूजा-अर्चना की थी और युद्ध में जीतने के बाद घोड़ा चढ़ाने का प्रण लिया था। तभी से यहां पर अपनी मन्नत पूरी होने पर सोने, चांदी व मिट्टी के घोड़े चढ़ाने की परंपरा प्रचलित है।
https://religion.bhaskar.com/news/JM-TID-story-of-devikup-bhadrakali-shaktipeeth-in-haryana-5739770-PHO.html?seq=1

Monday, December 18, 2017

5 अनजाने रहस्य: परशुराम का एक श्राप बना था कर्ण की मृत्यु का कारण

महाभारत को पांचवा वेद कहा जाता है। महाभारत के कई ऐसे किस्से हो, जिनसे आज भी लोग आनजान है। इस स्टोरी में हम आपको महाभारत के 5 ऐसी ही अनजानी बातों के बारे में बताएंगे।

परशुराम का श्राप बना था, कर्ण की मृत्यु का कारण
कुंती पुत्र कर्ण पराक्रमी योद्धा था, लेकिन उसने युद्ध कला झूठ बोल कर प्राप्त की थी। जिसका परिणाम उसे युद्ध में अपनी मौत के रुप में भोगना पड़ा। जन्म के समय ही अपनी माता कुंती ने कर्ण को त्याग दिया था, जिसे एक सूत ने अपने पुत्र के रूप में अपनाया। इसी वजह से कर्ण सूतपुत्र के रूप में जाना जाता था। कर्ण परशुराम से शिक्षा लेना चाहता था, लेकिन परशुराम केवल ब्राह्मणों को ही शिक्षा देते थे। यह बात जानकर कर्ण ने परशुराम से अपने ब्राह्मण होने का झूठ बोला और उनसे कई दिव्य अस्त्रों-शस्त्रों का ज्ञान लिया। साथ ही ब्रह्मास्त्र की भी शिक्षा प्रप्त की। जब परशुराम को कर्ण के सूतपुत्र होने का सच पता चला तो वह बहुत क्रोधित हुए। परशुराम ने कर्ण को श्राप दिया कि जब युद्ध में सबसे महत्वपूर्ण समय आएगा तब वह अपना सारा ज्ञान भूल जाएगा और कोई भी अस्त्र या शस्त्र नहीं चला पाएगा। कुरुक्षेत्र के युद्ध में यही श्राप कर्ण की मृत्यु का भी कारण बना।

कर्ण पहले ही जानता था, देवराज इन्द्र के कवच और कुण्डल दान मांगने की बात

महाभारत के वनपर्व के अनुसार, पांडवों के वनवास के बारह वर्ष पूरे हो गए थे और अज्ञातवास की शुरुआत हो गई थी। देवराज इन्द्र पांडवों का लाभ चाहते थे। इसलिए वे कर्ण से उसके कवच और कुण्डल दान में मांगने वाले थे। यह बात कर्ण के पिता भगवान सूर्य जान चुके थे। अपने पुत्र की भलाई के लिए वे कर्ण को इस बात से सावधान करना चाहते थे। कर्ण ब्राह्मणों की सेवा करके सो रहा था। तब भगवान सूर्य ब्राह्मण रूप धारण करके कर्ण के सपने में गए। उन्होंने सपने में इन्द्र द्वारा कवच और कुण्डल दान में मांगे जाने की बात उसे बता दी थी। वे जानते थे कर्ण दानवीर है। वह मांगा हुआ कोई भी दान जरूर देता है। इसलिए उन्होंने इन्द्र से कवच और कुण्डल के बदले एक अमोघ शक्ति मांगने को कहा था। अपने पिता के कहने पर कर्ण ने ऐसा ही किया। युद्ध में उसने इन्द्र से मांगी हुई शक्ति से घटोत्कछ का वध किया था।

भगवान राम के बाण से तेजहीन हो गए थे परशुराम

महाभारत के वनपर्व के अनुसार, रावण का वध करने के लिए स्वयं भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में जन्म लिया था। जब श्रीराम के प्रभाव और शक्तियों के बारे में भगवान परशुराम ने सुना, तो वह उनकी परीक्षा लेने के लिए अयोध्या गए। वहां उन्होंने श्रीराम को अपने दिव्य धनुष पर प्रत्यंचा चड़ाने को कहा। पल-भर में श्रीराम ने यह काम कर दिखाया। यह देख अहंकार से भरे परशुराम ने श्रीराम को उस धनुष से बाण चला कर दिखाने को कहा। परशुराम के अहंकार को तोड़ने के लिए श्रीराम ने उस धनुष से ऐसा बाण चलाया, जो परशुराम की शक्तियों को छीन कर पुनः उनके पास आ गया। यह देख कर परशुराम समझ गए कि ये भगवान विष्णु के ही अवतार हैं। एक वर्ष तक तेजहीन रहने पर भगवान परशुराम का सारा घमंड चूर-चूर हो गया। अपने पितरों के कहने पर वसुधरा नाम की नदी में स्नान करने पर उन्हें फिर से उनकी शक्तियां मिल गई।

श्रीकृष्ण ने दिए थे धृतराष्ट्र को दिव्य नेत्र

महाभारत के उघोगपर्व के अनुसार, एक बार धृतराष्ट्र अपने सभी पुत्रों और प्रजा के साथ महल में बैठे हुए थे। तभी वहां श्रीकृष्ण आ गए। श्रीकृष्ण पांडवों की ओर से युद्ध ना करने और संधि कर लेने का सुझाव लेकर आए थे। उन्होंने दुर्योधन को युद्ध रोक कर पांडवों से मित्रता करने को कहा। दुर्योधन ने इस बात को स्वीकार नहीं किया और श्रीकृष्ण को कैद करने का प्रयास करने लगा। दुर्योधन के इस अपमान से क्रोधित होकर श्रीकृष्ण ने सभा में अपना विश्वरूप दिखाया। उस रूप में पूरा विश्व समाया हुआ था। जिसके तेज से सभी ने अपनी आंखें बंद कर ली। तब धृतराष्ट्र ने श्रीकृष्ण से उसे दिव्य नेत्र देने की प्रार्थना की, ताकि वह उनके विश्वरूप के दर्शन कर सके। प्रार्थना के फलस्वरूप भगवान ने उसे कुछ पल के लिए दिव्य नेत्र दिए थे। जिससे धृतराष्ट्र ने श्रीकृष्ण के दर्शन किए।

देवी ने दिया था अर्जुन को युद्ध में जीतने का वरदान

महाभारत के भीष्मपर्व के अनुसार, कुरूक्षेत्र का युद्ध शुरू होने वाला था। कौरवों और पांडवों के योद्धाओं ने अपने-अपने चक्रव्यूह का निर्माण कर लिया था। श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथी बनकर, उसका मार्गदर्शन कर रहे थे। युद्ध आरंभ होने से पहले श्रीकृष्ण ने अर्जुन से शत्रुओं को पराजित करने के लिए पवित्र होकर देवी दुर्गा की स्तुति करने को कहा। श्रीकृष्ण के कहने पर अर्जुन ने अपने रथ से उतर कर देवी दुर्गा से युद्ध में सफल होने के लिए प्रार्थना की। अर्जुन की प्रार्थना से खुश होकर देवी ने उसे युद्ध भूमि में दर्शन दिए। देवी ने अर्जुन को नर और श्रीकृष्ण को नारायण का रूप बताया और युद्ध प्रारंभ होने पर कुछ दिनों में ही शत्रु सेना को हरा कर, युद्ध में जीतने का वरदान दिया था।

Saturday, December 16, 2017

खर (मल) मास

16 दिसंबर, शनिवार से मल मास शुरू हो रहा है, जो 14 जनवरी 2018, रविवार तक रहेगा। धर्म ग्रंथों के अनुसार, खर (मल) मास को भगवान पुरुषोत्तम ने अपना नाम दिया है। इसलिए इस मास को पुरुषोत्तम मास भी कहते हैं। इस मास में भगवान की आराधना करने का विशेष महत्व है। धर्मग्रंथों के अनुसार, इस मास में सुबह सूर्योदय के पहले उठकर शौच, स्नान,संध्या आदि अपने-अपने अधिकार के अनुसार नित्यकर्म करके भगवान का स्मरण करना चाहिए और पुरुषोत्तम मास के नियम ग्रहण करने चाहिए। पुरुषोत्तम मास में श्रीमद्भागवत का पाठ करना महान पुण्यदायक है।

इस मास में तीर्थों, घरों व मंदिरों में जगह-जगह भगवान की कथा होनी चाहिए। भगवान की विशेष पूजा होनी चाहिए और भगवान की कृपा से देश तथा विश्व का मंगल हो एवं गो-ब्राह्मण तथा धर्म की रक्षा हो, इसके लिए व्रत-नियम आदि का आचरण करते हुए दान, पुण्य और भगवान की पूजा करना चाहिए। पुरुषोत्तम मास के संबंध में धर्म ग्रंथों में वर्णित है-

येनाहमर्चितो भक्त्या मासेस्मिन् पुरुषोत्तमे।
धनपुत्रसुखं भुकत्वा पश्चाद् गोलोकवासभाक्।।
अर्थात- पुरुषोत्तम मास में नियम से रहकर भगवान की विधिपूर्वक पूजा करने से भगवान अत्यंत प्रसन्न होते हैं और भक्तिपूर्वक उन भगवान की पूजा करने वाला यहां सब प्रकार के सुख भोगकर मृत्यु के बाद भगवान के दिव्य गोलोक में निवास करता है।
करें इस मंत्र का जाप, प्रसन्न होंगे भगवान विष्णु
धर्म ग्रंथों में ऐसे कई श्लोक भी वर्णित है जिनका जप यदि खर मास में किया जाए तो अतुल्य पुण्य की प्राप्ति होती है। प्राचीन काल में श्रीकौण्डिन्य ऋषि ने यह मंत्र बताया था। मंत्र जाप किस प्रकार करें इसका वर्णन इस प्रकार है-

कौण्डिन्येन पुरा प्रोक्तमिमं मंत्र पुन: पुन:।
जपन्मासं नयेद् भक्त्या पुरुषोत्तममाप्नुयात्।।
ध्यायेन्नवघनश्यामं द्विभुजं मुरलीधरम्।
लसत्पीतपटं रम्यं सराधं पुरुषोत्तम्।।
अर्थात- मंत्र जपते समय नवीन मेघश्याम दोभुजधारी बांसुरी बजाते हुए पीले वस्त्र पहने हुए श्रीराधिकाजी के सहित श्रीपुरुषोत्तम भगवान का ध्यान करना चाहिए।

मंत्र
गोवर्धनधरं वन्दे गोपालं गोपरूपिणम्।
गोकुलोत्सवमीशानं गोविन्दं गोपिकाप्रियम्।।
इस मंत्र का एक महीने तक भक्तिपूर्वक बार-बार जाप करने से पुरुषोत्तम भगवान की प्राप्ति होती है, ऐसा धर्मग्रंथों में लिखा है।

Thursday, December 14, 2017

ग्रंथों सेः ये 5 सख्ती करने पर ही ठीक से काम करते हैं

हमें बचपन से ही सिखाया जाता है कि सभी से विनम्रतापूर्वक व्यवहार करना चाहिए। ये बात सही भी है, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनके साथ सदैव कठोर व्यवहार ही करना चाहिए अन्यथा वह ऐसा परिणाम नहीं देंगे जैसा हम चाहते हैं। यही बात गरुड़ पुराण भी लिखी है।
गरुड़ पुराण में ऐसे 5 लोग व चीजें बताई गई हैं, जिनके साथ कठोर अनुशासन जरूरी है अन्यथा वे हमारे मनमाफिक परिणाम नहीं देते। यदि इनके साथ नरमी से बात करेंगे तो ये आपकी बात कभी नहीं मानेंगे। लाइफ मैनेजमेंट की दृष्टि से भी ये तथ्य सही लगते हैं। ये 5 इस प्रकार हैं-

दुर्जन यानी बुरे स्वभाव वाला
दुर्जन यानी बुरे स्वभाव वाले व्यक्ति के साथ यदि आप नम्रता पूर्वक व्यवहार करेंगे तो इसके बदले में वह आपसे ऐसा व्यवहार नही करेगा। उल्टा वह आपके नम्र स्वभाव का फायदा उठाने की कोशिश ही करेगा। इसलिए यदि आपको किसी दुर्जन व्यक्ति से काम निकलवाना हो तो उसके साथ कठोरता से ही बात करनी चाहिए, तभी वह आपके साथ अनुकूल व्यवहार करेगा।

शिल्पकार यानी कारीगर या मजदूर
गरुड़ पुराण में शिल्पकार से भी कठोर व्यवहार करने के लिए कहा गया है, जिससे अभिप्राय उन लोगों से है जो अपना काम ठीक तरीके से नहीं करते और आलस्य करते हुए काम को टालते रहते हैं। ऐसे लोगों के साथ यदि नम्रता पूर्ण बात की जाए तो यह ठीक से अपना काम नहीं करेंगे इसलिए यदि इन लोगों से अपना काम निकलवाना है तो इनके साथ कठोर व्यवहार करना बहुत आवश्यक है।

दास यानी नौकर
यदि आप नौकर से नम्रता पूर्ण व्यवहार करेंगे तो वह आपको किसी आज्ञा का पालन नहीं करेगा और आपके साथ मित्र के समान आचरण करने लगेगा। ऐसी स्थिति में वह आपका अपमान भी कर सकता है। इस स्थिति से बचने के लिए आपको अपने नौकर को कठोर अनुशासन में रखना अनिवार्य है। इसलिए यदि आपको दास यानी नौकर से काम करवाना है तो उसके साथ कठोर अनुशासन रखना बहुत आवश्यक है।

ढोलक
ढोलक ऐसा वाद्य यंत्र है जिसे यदि आप धीरे-धीरे प्रेम पूर्वक बजाने का प्रयास करेंगे तो उसकी आवाज वैसी नहीं आएगी, जैसी आप चाहते हैं यानी वह ठीक से काम नहीं करेगा। यदि आप चाहते हैं कि ढोलक की आवाज जोर से आए तो आपको उसे अपने दोनों हाथों से जोर-जोर से पीटना होगा तभी ढोलक से वैसी आवाज आएगी, जैसी आप चाहते हैं। इसलिए कहा गया है कि ढोलक के साथ भी कठोर अनुशासन (जोर-जोर से पीटना) रखना चाहिए।

मनमानी करने वाली पत्नी
हिंदू धर्म में पत्नी को बहुत ही सम्माननीय माना गया है। पत्नी के साथ दुर्व्यवहार करने के बारे में सोचना भी गलत है। पत्नी को अर्धांगिनी भी कहा गया है जिसका अर्थ है शरीर का आधा भाग। लेकिन यदि पत्नी का स्वभाव मनमानी करने वाला है तो वह किसी के रूप में आपका नुकसान कर सकती है। मनमानी से अर्थ है ऐसी पत्नी को जो अपने पति की इच्छा के विरूद्ध कार्य करती है तथा अन्य पुरुषों में भी आसक्ति रखती है। ऐसी स्त्री के साथ कठोर व्यवहार ही करना चाहिए क्योंकि स्वच्छंद होने पर वह अपने निजी स्वार्थ के लिए किसी भी हद तक जा सकती है।

Wednesday, December 13, 2017

पूजा घर में हमेशा रखना चाहिए ये 1 सामान, इससे दूर होती हर तरह की नेगेटिव एनर्जी

किसी भी धार्मिक कार्य के दौरान शंख की ध्वनि पैदा करना हिंदू धर्म की एक बड़ी और महत्वपूर्ण विशेषता है। सदियों से प्रचलित इस धार्मिक विधि को पूजा-पाठ और रीति-रिवाजों के दौरान जरूर अपनाया जाता है। शंख रखने, बजाने व इसके पानी का उचित इस्तेमाल करने से कई तरह के लाभ होते हैं। कई फायदे तो सीधे तौर पर सेहत से जुड़े हैं। पूजा में शंख बजाने और इसके इस्तेमाल से क्या-क्या फायदे होते है आइए जानते हैं

1. ऐसी मान्यता है कि पूजा आरंभ करने के पहले 3 बार शंख बजाने से वातावरण से सभी तरह की अशुद्धियां दूर होती हैं और नकारात्मक ऊर्जा का क्षय हो जाता है।

2. कोई भी पूजा आरती के बिना पूर्ण नहीं मानी जाती और आरती के अंत में भी शंख ध्वनि आवश्यक है। पूजा स्थल पर विविध देवी-देवताओं या प्राकृतिक शक्तियों की ऊर्जा का प्रवाह र्निविघ्न रूप से हो सके तथा रज-तम का प्रभाव मंद होकर सत तत्व की प्रधानता स्थापित हो, इसलिए पूजा के अंत में भी आरती के दौरान शंख बजाने का प्रावधान है।

3. शंख बजाते समय व्यक्ति की ग्रीवा ऊपर की ओर (भगवान के सामने) होनी चाहिए। साथ ही, उसे बजाने वाले को पूर्ण रूप से ध्यान मग्न अवस्था में स्थिर हो जाना चाहिए।

4. घर की तिजोरी में शंख रखने पर भगवान विष्णु और लक्ष्मी की कृपा हमेशा बनी रहती है और घर में कभी आर्थिक तंगी नहीं होती है। विशेषकर दक्षिणावर्ती शंख।

5. शंख के जल से श‍िव, लक्ष्मी आदि का अभि‍षेक करने से ईश्वर प्रसन्न होते हैं और उनकी कृपा होती है।

6. ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है कि शंख में जल रखने और इसे छ‍िड़कने से वातावरण शुद्ध होता है।

7. शंख की आवाज लोगों को पूजा-अर्चना के लिए प्रेरित करती है। ऐसी मान्यता है कि शंख की पूजा से कामनाएं पूरी होती हैं। इससे दुष्ट आत्माएं पास नहीं फटकती हैं।

8. वैज्ञानिकों का मानना है कि शंख की आवाज से वातावरण में मौजूद कई तरह के जीवाणुओं-कीटाणुओं का नाश हो जाता है।

9. आयुर्वेद के मुताबिक, शंखोदक के भस्म के उपयोग से पेट की बीमारियां, पथरी, पीलिया आदि कई तरह की बीमारियां दूर होती हैं, हालांकि इसका उपयोग एक्सपर्ट वैद्य की सलाह से ही किया जाना चाहिए।

10. शंख बजाने से फेफड़े का व्यायाम होता है। पुराणों के जिक्र मिलता है कि अगर सांस का रोगी नियमि‍त तौर पर शंख बजाए, तो वह बीमारी से मुक्त हो सकता है।

11. शंख में रखे पानी का सेवन करने से हड्डियां मजबूत होती हैं।यह दांतों के लिए भी लाभदायक है। शंख में कैल्श‍ियम, फास्फोरस व गंधक के गुण होने की वजह से यह फायदेमंद है।