Thursday, June 15, 2017

रोज महामृत्युंजय का पाठ करने पर होता है दोषों का नाश

महामृत्युंजय मंत्र भगवान शिव का प्रभावशाली मंत्र है। इसके प्रभाव और शक्तियों का वर्णन कई पुराणों में मिलता है। शिवपुराण के अनुसार, इस मंत्र के पाठ से मनुष्य की सभी बाधाएं और परेशानियां खत्म हो जाती हैं। रोज रुद्राक्ष की माला से इस मंत्र का पाठ करने से अकाल मृत्यु (असमय मौत) का डर दूर होता है।
महामृत्युंजय से होता है इन दोषों का नाश
महामृत्युंजय मंत्र का पाठ करने से मांगलिक दोष, नाड़ी दोष, कालसर्प दोष, भूत-प्रेत दोष, रोग, दुःस्वप्न, गर्भनाश, संतानबाधा कई दोषों का नाश होता है।
महामृत्युजंय मंत्र का पाठ करने से होती है शुभ फल की प्राप्ति
1. दीर्घायु (लम्बी आयु) -
जिस भी मनुष्य को लंबी उम्र पाने की इच्छा हो, उसे नियमित रूप से महामृत्युजंय मंत्र का जप करना चाहिए। इस मंत्र के प्रभाव से मनुष्य का अकाल मृत्यु का भय खत्म हो जाता है। यह मंत्र भगवान शिव को बहुत प्रिय है, इसका का जप करने वाले को लंबी उम्र मिलती है।
2. सम्पत्ति की प्राप्ति -
जिस भी व्यक्ति को धन-सम्पत्ति पाने की इच्छा हो, उसे महामृत्युंजय मंत्र का पाठ करना चाहिए। इस मंत्र के पाठ से भगवान शिव हमेशा प्रसन्न रहते हैं और मनुष्य को कभी धन-धान्य की कमी नहीं होती है।
3. आरोग्य प्राप्ति -
यह मंत्र मनुष्य न सिर्फ निर्भय बनता है बल्कि उसकी बीमारियों का भी नाश करता है। भगवान शिव को मृत्यु का देवता भी कहा जाता है। इस मंत्र के जप से रोगों का नाश होता है और मनुष्य निरोगी बनता है।
4. यश (सम्मान) की प्राप्ति -
इस मंत्र का जप करने से मनुष्य को समाज में उच्च स्थान प्राप्त होता है। सम्मान की चाह रखने वाले मनुष्य को प्रतिदिन महामृत्युजंय मंत्र का जप करना चाहिए।
5. संतान की प्राप्ति -
महामृत्युजंय मंत्र का जप करने से भगवान शिव की कृपा हमेशा बनी रहती है और हर मनोकामना पूरी होती है। इस मंत्र का रोज जाप करने पर संतान की प्राप्ति होती है।

Wednesday, June 14, 2017

देवताओं को घर में रोज़ चढ़ाना चाहिए फूल, इससे होते हैं ये बड़े लाभ

सनातन धर्म में भगवान को पुष्प या फूल चढ़ाने को विशेष महत्व दिया गया है। देवी-देवताओं और भगवान को आरती, व्रत, उपवास या त्योहारों पर फूल चढाएं जाते हैं। धार्मिक, अनुष्ठान, संस्कार व सामाजिक कार्यों को बिना फूलों के अधूरा समझा जाता है, लेकिन फिर भी कम ही लोग ये जानते हैं कि भगवान को फूल क्यों चढाएं जाते है। यदि आप भी इसका कारण नहीं जानते हैं तो आइए हम आपको बताते हैं क्या कहते हैं धर्मग्रंथ….

हमारे धर्मग्रंथों मे पुष्प के बारे में कहा गया है

पुण्य संवर्धनाच्चापि पापौघपरिहारत। पुष्कलार्थप्रदानार्थ पुष्पमित्यभिधीयते।।

अर्थ- इसका मतलब है पुण्य को बढ़ाने, पापों को घटाने और फल को देने के कारण ही इसे पुष्प या फूल कहा जाता है।

दैवस्य मस्तकं कुर्यात्कुसुमोपहितं सदा।
अर्थ- देवता का मस्तक या सिर हमेशा फूलों से सुशोभित रहना चाहिए।

पुष्पैर्देवां प्रसीदन्ति पुष्पै देवाश्च संस्थिता
न रत्नैर्न सुवर्णेन न वित्तेन च भूरिणा
तथा प्रसादमायाति यथा पुष्पैर्जनार्दन।

अर्थ- देवता लोग रत्न, सुवर्ण, भूरि, द्रव्य, व्रत, तपस्या या और किसी चीज से उतने प्रसन्न नहीं होते, जितना फूल या पुष्प चढ़ाने से होते हैं।
फूल चढ़ाने का ये है बड़ा कारण

मान्यता है कि पुष्प अर्पित करने से भगवान तुरंत ही प्रसन्न हो जाते हैं। फूलों की सुगंध से हमारे घर का वातावरण महकता रहता है, जिससे मन को शांति मिलती है। दिमाग में हमेशा सकारात्मक विचार आते हैं। नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव घर से नष्ट हो जाता है।

ये हमें अच्छा जीवन जीने की भी प्रेरणा देते हैं। फूलों का जीवन कम अवधि का होता है, लेकिन फिर भी वे जब तक मुरझा नहीं जाते तब तक वातावरण में सुगंध फैलाते रहते हैं। इसी प्रकार हमें भी समाज में ऐसा ही स्वभाव रखना चाहिए जिससे हमारे आस-पास लोगों को सुख की प्राप्ति हो सके।

फूलों से दूर होता है वास्तुदोष
वास्तु शास्त्र के अनुसार भी घर में बगीचा होना अनिवार्य बताया गया है। घर के बाहर की वाटिका घर के कई वास्तु दोषों को समाप्त कर देती है। फूल सुगंध और सौंदर्य के प्रतीक हैं। घर के आगे ब्रह्म कमल, गुड़हल, चांदनी, मीठा नीम आदि के पौधे लगाने से हर तरह के वास्तुदोष का नाश होता है।

इसके अलावा पारिजाद, मोगरा, गेंदा व सेवंती के फूलों को भी घर के आंगन में लगाना अच्छा माना गया है। इन सभी फूलों के पौधों को घर की सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाने वाला व जीवन में खुशहाली लाने वाला माना गया है।

Monday, June 12, 2017

सनातन धर्म ग्रंथों में लिखी कुछ ऐसी ही रोचक बातें

सनातन धर्म साहित्य बहुत ही विस्तृत है। इसके अंतर्गत अनेक पुराण, वेद, धर्म ग्रंथ व उपनिषद आदि आते हैं। इन सभी ग्रंथों में ऐसी अनेक रोचक बातें बताई गई हैं, जिसे आमजन नहीं जानते। कुछ ने इनके बारे में सुना भी होगा, लेकिन विस्तृत रूप से इनके बारे में जानने वाले बहुत ही कम लोग हैं। आज हम आपको सनातन धर्म ग्रंथों में लिखी कुछ ऐसी ही रोचक बातें बता रहे हैं-

प्रश्न 1. सोने की लंका नगरी में रावण से पहले किसका अधिकार था?

उत्तर- रामायण के अनुसार रावण जिस सोने की लंका में रहता था, वह लंका पहले रावण के भाई कुबेर की थी। जब रावण विश्व विजय पर निकला तो उसने अपने भाई कुबेर को हराकर सोने की लंका पर अपना कब्जा कर लिया।

प्रश्न 2. वाल्मीकि रामायण के अनुसार समुद्र पर रामसेतु बनाने में वानरों को कितना समय लगा?

उत्तर- रामायण के अनुसार, समुद्र पर पुल बनाने में वानरों को पांच दिन का समय लगा। पहले दिन वानरों ने 14 योजन, दूसरे दिन 20 योजन, तीसरे दिन 21 योजन, चौथे दिन 22 योजन और पांचवे दिन 23 योजन पुल बनाया था। इस प्रकार कुल 100 योजन लंबाई का पुल समुद्र पर बनाया गया। यह पुल 10 योजन चौड़ा था।

प्रश्न 3. पुराणों में वर्णित अश्वमेध यज्ञ क्या है?

उत्तर-धर्म ग्रंथों में अनेक स्थान पर अश्वमेध यज्ञ का वर्णन आता है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्रीराम व महाभारत के अनुसार युधिष्ठिर ने भी ये यज्ञ करवाया था। इस यज्ञ के अंतर्गत एक घोड़ा छोड़ा जाता था। ये घोड़ा जहां तक जाता था, वहां तक की भूमि यज्ञ करने वाले की मानी जाती थी। यदि कोई इसका विरोध करता था, तो उसे यज्ञ करने वाले के साथ युद्ध करना पड़ता था। ये यज्ञ वसंत या ग्रीष्म ऋतु में किया जाता था और करीब एक वर्ष इसके प्रारंभिक अनुष्ठानों की पूर्णता में लग जाता था।

प्रश्न 4. पुष्पक विमान क्या है?

उत्तर- पुष्पक विमान का सर्वप्रथम वर्णन वाल्मीकि रामायण में मिलता है। वैदिक साहित्य में देवताओं के विमानों की चर्चा है, लेकिन दैत्यों और मनुष्यों द्वारा उपयोग किया गया पहला विमान पुष्पक ही माना जाता है। पौराणिक संदर्भों में विज्ञान की खोज करने वालों की मान्यता है कि प्राचीन भारतीय विज्ञान आधुनिक विज्ञान की तुलना में अधिक संपन्न था। इस लिहाज से इस विमान का अस्तित्व व प्रामाणिकता स्वीकारी जाती है। प्राचीन भारतीय की वैज्ञानिक क्षमता में विश्वास करने वाले मानते हैं कि यह विमान तत्कालीन विज्ञान का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण था।

प्रश्न 5. हिंदू नववर्ष का प्रारंभ किस दिन से और क्यों होता है ?

उत्तर-हिंदू नववर्ष का प्रारम्भ चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा यानी पहले दिन से माना जाता है। इस पर्व को गुड़ी पड़वा के नाम से मनाते हैं। ब्रह्मपुराण के अनुसार पितामह ब्रह्मा ने इसी दिन से सृष्टि निर्माण का कार्य प्रारम्भ किया था। इसीलिए इसे सृष्टि का प्रथम दिन माना जाता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार चारों युगों में सबसे प्रथम सत्ययुग का प्रारम्भ भी इसी तिथि से हुआ था।

प्रश्न 6- हिंदू धर्म में किस ग्रंथ को पांचवे वेद की संज्ञा दी गई है?

उत्तर-हिंदू धर्म में महाभारत को पांचवां वेद कहा गया है। इसके रचयिता महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास हैं। महर्षि वेदव्यास ने इस ग्रंथ के बारे में स्वयं कहा है- यन्नेहास्ति न कुत्रचित्। अर्थात जिस विषय की चर्चा इस ग्रंथ में नहीं की गई है, उसकी चर्चा अन्यत्र कहीं भी उपलब्ध नहीं है। श्रीमद्भागवत गीता जैसा अमूल्य रत्न भी इसी महासागर की देन है। इस ग्रंथ में कुल मिलाकर एक लाख श्लोक है, इसलिए इसे शतसाहस्त्री संहिता भी कहा जाता है।

प्रश्न 7- वाल्मीकि रामायण के अनुसार देवराज इंद्र के रथ के सारथी का नाम क्या है?

उत्तर- देवराज इंद्र के रथ के सारथि का नाम मातलि है। राम-रावण युद्ध के दौरान जब रावण अपने रथ में बैठकर और श्रीराम भूमि पर खड़े रहकर युद्ध कर रहे थे। उस समय इंद्र ने अपना रथ भगवान श्रीराम की सहायता के लिए भेजा था। उस समय भी मातलि ने ही रथ का संचालन बड़ी कुशलता के साथ किया था।

Saturday, June 10, 2017

भारत के 4 ऐसे ही अनोखे मंदिर

सनातन धर्म में ऐसे कई राक्षसों और असुरों का वर्णन मिलता है, जिन्होंने मनुष्यों, ऋषि-मुनियों यहां तक की देवताओं के लिए भी कई बार परेशानियों का कारण बने। ऐसे में देवी-देवताओं ने उन असुरों का वध करके सुख-शांति और धर्म की स्थापना की।
देवी-देवताओं के मंदिर तो पूरी दुनिया में पाए जाते हैं, लेकिन बहुत ही कम लोग जानते होंगे की भारत में कुछ जगहें ऐसी भी हैं, जहां देवताओं के नहीं बल्कि असुरों के मंदिर बने हुए हैं और उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। आज हम आपके ऐसे ही कुछ मंदिरों के बारे में बताने जा रहे हैं-
1. दुर्योधन मंदिर (नेटवार, उत्तराखंड)
उत्तराखंड की नेटवार नामक जगह से लगभग 12 किमी की दूरी पर महाभारत के दुर्योधन का एक मंदिर बना हुआ है। इस मंदिर में दुर्योधन को देवता की तरह पूजा जाता है और यहां दुर्योधन की पूजा करने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। इस मंदिर से कुछ दूरी पर एक और मंदिर बना हुआ है। वह मंदिर दुर्योधन के प्रिय मित्र कर्ण का है।
2. पुतना का मंदिर (गोकुल, उत्तरप्रदेश)
उत्तरप्रदेश के प्रसिद्ध नगर गोकुल में भगवान कृष्ण को दूध पिलाने के बहाने मारने का प्रयास करने वाली पूतना का भी मंदिर है। यहां पूतना की लेटी हुई मूर्ति है और उसकी छाती पर चढ़कर उसका दूध पीते भगवान कृष्ण भी हैं। यहां मान्यता है कि पूतना ने श्रीकृष्ण को मारने के उद्देश्य से ही सही लेकिन एक मां का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को अपना दूध पिलाया था, इसलिए यहां पूतना को एक मां के रूप में पूजा जाता है।
3. अहिरावण मंदिर (झांसी, उत्तरप्रदेश)
झांसी के पचकुइंया में भगवान हनुमान का एक मंदिर हैं, जहां हनुमान जी के साथ अहिरावण की भी पूजा की जाती है। अहिरावण रावण के भाई था और रामायम के युद्ध के दौरान उसने भगवान राम और लक्ष्मण का अपहरण कर लिया था। लगभग 300 साल पुराने इस मंदिर में हनुमान जी की विशाल मूर्ति के साथ साथ अहिरावण और उसके भाई महिरावण की भी प्रतिमा की पूजा की जाती है।
4. दशानन मंदिर (कानपुर, उत्तरप्रदेश)
उत्तरप्रदेश के कानपुर शहर के शिवाला इलाके में दशानन मंदिर है, जहां रावण की पूजा होती है। यहां रावण को शक्ति का प्रतीक और महान पंडित मानने वाले श्रध्दालु उसकी पूजा करते हैं और मन्नतें मांगते हैं। मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण वर्ष 1890 में हुआ था।
ये मंदिर साल में केवल एक बार दशहरे के दिन खुलता है। दशहरे पर मंदिर के कपाट खुलते हैं और दशानन की मूर्ति को नहला धुला कर उसका श्रृंगार किया जाता है। दोपहर को दशानन की आरती और पूजा अर्चना की जाती है और शाम को मंदिर के कपाट सालभर के लिए फिर से बंद कर दिए जाते हैं।

Friday, June 9, 2017

जो रोज करते हैं श्रीगणेश से जुड़ा ये 1 आसान काम, उन्हें मिलता है मनचाहा वरदान

श्रीगणेश अंक भगवान गणेश से जुड़ा एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें भगवान गणेश के जीवन की सभी घटनाओं और उनसे जुड़े उपायों का विवरण है। श्रीगणेश अंक में भगवान गणेश के 12 नामों का वर्णन किया गया हैं, जिनको लेने से मनुष्य के सभी दुखों का नाश हो जाता है और उसकी सभी इच्छा पूरी होती हैं।
श्लोक-
प्रथमं वक्रतुण्ड च एकदन्तं द्वितीयकम्, तृतीयं कृष्णपिड्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम्।।
लम्बोदरं पंचमं च षष्ठं विकटमेव च, सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्ण तथाष्टमम्।।
नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम्, एकादशं गणपतिं द्वादर्श तु गजाननम्।।
द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः, न च विध्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं परम्।।
अर्थात-
पहला नाम है वक्रतुण्ड, दूसरा एकदन्त, तीसरा कृष्णपिड्गाक्ष, चौथा गजवक्त्र, पांचवां लम्बोदर, छठा विकट, सातवां विघ्नराजेन्द्र, आठवां धूमवर्ण, नौवां भालचन्द्र, दसवां विनायक, ग्यारहवां गणपति और बारहवां नाम गजाजन है। जो मनुष्य प्रतिदिन भगवान गणेश के इन बारह नामों का जप करता है, उसके सभी विघ्न (परेशानियां) खत्म हो जाती हैं।
श्रीगणेश अंक के अनुसार, रोज श्रीगणेश की पूजा-अर्चना करने के कौन-कौन से लाभ आसानी से मिल सकते हैं-
श्लोक-
विद्यार्थी लभते विद्यां, धनार्थी लभते धनम्।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान्, मोक्षार्थी लभते गतिम्।।
1. विद्या की प्राप्ति-
भगवान गणेश को बुद्धि का देवता माना जाता है। अच्छी बुद्धि और विद्या के लिए श्रीगणेश की पूजा-अर्चना की जाती है। श्रीगणेश-अंक के अनुसार, जिस भी मनुष्य को अच्छी विद्या पाने की इच्छा हो, उसे भगवान गणेश के इन 12 नामों का पाठ करना चाहिए। नियमित रूप से इनका जप करने से भगवान गणेश की कृपा हमेशा बनी रहती है और मनुष्य की हर मनोकामना पूरी होती है।
2. धन की प्राप्ति-
भगवान गणेश को सुख और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। जिस भी मनुष्य को धन-संपत्ति पाने की इच्छा हो, उसे पूरी श्रद्धा के साथ भगवान गणेश के इन बारह नामों का पाठ करना चाहिए। ऐसा करने से घर से दरिद्रता कम होती है और धन-धान्य में वृद्धि होती है।
3. संतान की प्राप्ति-
भगवान गणेश के इन बारह नामों को चमत्कारी माना जाता है। इनके जप से मनुष्य की हर मनोकामना जरूर ही पूरी होती है। संतान चाहने वाले दंपत्ति को रोज सुबह और शाम इनका पाठ करना चाहिए। ऐसा करने से उनकी संतान पाने की इच्छा पूरी होती है।
4. मोक्ष की प्राप्ति-
भगवान गणेश प्रथम पूज्य माने जाते है। किसी भी काम की शुरुवात में सबसे पहले उनका पूजन किया जाता है। भगवान गणेश की आराधना करने से मनुष्य को अपने पापों से मुक्ति मिलती हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। भगवान गणेश के इन बारह नामों का पाठ करने से मनुष्य को धरती पर ही स्वर्ग के समान सुख मिलते है।