Friday, May 26, 2017

इन 4 कामों से दूर होती है नकारात्मकता और मिल सकती है सफलता

पुरानी परंपराओं के अनुसार कुछ ऐसे काम बताए गए हैं जो नियमित रूप से करते रहने पर हमारे घर की नकारात्मकता दूर हो सकती है। नकारात्मकता की वजह से हमारी सोच भी नकारात्मक हो जाती है, जिससे कार्यों में बाधाओं का सामना करना पड़ता है। यहां जानिए घर की नकारात्मकता दूर करने के लिए घर में कौन-कौन से काम करते रहना चाहिए...

1.घर में रोज गौमूत्र का छिड़काव करना चाहिए। यदि आप घर में रोज गौमूत्र का छिड़काव नहीं कर सकते हैं तो कम से कम सभी त्योहारों पर, सभी शुभ मुहूर्त पर, पूर्णिमा तिथि पर घर में गौमूत्र का छिड़काव करना चाहिए। इससे वातावरण में मौजूद नकारात्मक ऊर्जा खत्म हो जाती है, घर का माहौल पवित्र होता है। जहां गौमूत्र की गंध में नकारात्मक ऊर्जा को खत्म करने की शक्ति होती है।

2.सुबह-शाम घर में घी का दीपक और कर्पूर जलाना चाहिए। कर्पूर और दीपक की रोशनी और इनसे निकलने वाले धुएं से भी वातावरण सकारात्मक बनता है।

3. रोज सुबह घर के बाहर रंगोली बनाने की परंपरा भी पुराने समय से चली आ रही है। रंगोली से भी घर के आसपास से नकारात्मकता खत्म होती है और इसे देखने से हमारे विचार सकारात्मक बनते हैं।

4.घर का कोन-कोना एकदम साफ रखना चाहिए। घर में गंदगी होगी तो किसी भी पूजा-पाठ या किसी भी उपाय से हमारी सोच सकारात्मक नहीं बन पाएगी।
https://religion.bhaskar.com/news/JM-JYO-RAN-infog-tips-to-avoid-negativity-mythological-tips-to-get-success-5605937-PHO.html

Thursday, May 25, 2017

शनिदेव के 6 खास मंदिर, जहां दर्शन करने से दूर होते हैं शनि के दोष

आज हम आपको भगवान शनि के 6 ऐसे मंदिरों के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां पर शनि देव की आराधना करने पर वे अपने भक्तों के सभी दुःख दूर कर देते हैं।
1. शनि मंदिर (कोसीकलां)
दिल्ली से 128 किमी की दूरी पर कोसीकलां नाम की जगह पर सूर्यपुत्र भगवान शनिदेव का मंदिर है। यह उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में आता है, इसके आसपास ही नंदगांव, बरसाना और श्री बांकेबिहारी मंदिर भी है। कहा जाता है कि यहां की परिक्रमा करने पर मनुष्य की सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।
इसके बारे में लोक मान्यता है कि यहां पर खुद भगवान कृष्ण ने शनिदेव को दर्शन दिए थे और वरदान दिया था कि जो भी मनुष्य पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ इस वन की परिक्रमा करेगा उसे शनि कभी कष्ट नहीं पहुचाएंगे।
कैसे पहुंचें
मथुरा से कोसीकलां की दूरी लगभग 21 कि.मी. की है। मथुरा तक रेल मार्ग से आकर बस या निजी वाहन से कोसीकलां पहुंचा जा सकता है। कोसीकलां से लगभग 90 कि.मी. की दूरी पर खेरिया एयरपोर्ट है।
2. शनि मंदिर, उज्जैन
मध्य प्रदेश की धार्मिक राजधानी उज्जैन को मंदिरों की नगरी भी कहा जाता है। सांवेर रोड पर प्राचीन शनि मंदिर भी यहां का प्रमुख दर्शनीय स्थल है। इस मंदिर की खास बात यह है कि यहां शनि देव के साथ-साथ अन्य नवग्रह भी हैं, इसलिए इसे नवग्रह मंदिर भी कहा जाता है। यहां दूर-दूर से शनि भक्त तथा शनि प्रकोप से प्रभावित लोग दर्शन करने आते हैं। यह मंदिर के पास से ही शिप्रा नदी बहती है, जिसे त्रिवेणी संगम भी कहा जाता है।
कैसे पहुंचें-
उज्जैन देश के लगभग सभी बड़े शहरों से रेल और सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है। यहां से नियमित रूप से रेल गाड़ियां और बसें चलती हैं। उज्जैन से लगभग 50 कि.मी. की दूरी पर इंदौर का एयरपोर्ट है।
3. शनि शिंगणापुर
भगवान शनि के सबसे खास मंदिरों में से एक है महाराष्ट्र के शिगंणापुर नामक गांव का शनि मंदिर। यह मंदिर महाराष्ट्र के अहमदनगर से लगभग 35 कि.मी. की दूरी पर है। इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहां पर शनि देवी की प्रतिमा खुले आसमान के नीचे है। इस मंदिर में कोई छत नहीं है। साथ ही इस गांव में किसी भी घर में ताला नहीं लगाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि यहां के सभी घरों की रक्षा खुद शनि देव करते हैं।
कैसे पहुंचें-
शनि शिगणापुर पहुंचने के लिए मुंबई, औरंगाबाद या पुणे आकर शिंगणापुर के लिए बस या टैक्सी ली जा सकती हैं। यहां से सबसे पास में औरंगाबाद एयरपोर्ट है। यहां से औरंगाबाद की दूरी लगभग 90 कि.मी. है।
4. शनि मंदिर, इंदौर
इंदौर, मध्यप्रदेश के मुख्य शहरों में से एक है। यहां पर भगवान शनि का एक बहुत ही खास मंदिर है। यह मंदिर शनि देव के बाकि मंदिरों से अलग है, क्योंकि यहां पर भगवान शनि का 16 श्रृंगार किया जाता है।
इंदौर के जूनी इंदौर इलाके में बना ये शनि मंदिर अपनी प्राचीनता और चमत्कारी किस्सों के लिए प्रसिद्ध है। शनि देव के लगभग सभी मंदिरों में उनकी प्रतिमा काले पत्थर की बनी होती है जिन पर कोई श्रृंगार नहीं होता, लेकिन ये एक ऐसा मंदिर है, जहां शनि देव को रोज आकर्षक श्रृंगार किया जाता है और शाही कपड़े भी पहनाए जाते हैं। इस मंदिर में शनि देव बहुत ही सुंदर रूप में नजर आते हैं।
कैसे पहुंचें-
इंदौर, मध्य प्रदेश के मुख्य शहरों में से एक है। यहां से नियमित रेल गाड़ियां और बसें चलती हैं। यहां एयरपोर्ट भी है, तो हवाई मार्ग की मदद से भी यहां पहुंचा जा सकता है।
5. शनिश्चरा मंदिर, ग्वालियर
यह शनि मंदिर मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में है। यह शनि मंदिर भारत के पुराने शनि मंदिरों में से एक है। लोक मान्यता है कि यह शनि पिंड भगवान हनुमान ने लंका से फेंका था जो यहां आकर गिरा। तब से शनि देव यहीं पर स्थापित हैं। यहां शनि देव को तेल चढ़ाने के बाद उनसे गले मिलने की प्रथा भी है। जो भी यहां आता है वह बड़े प्यार से शनि देव से गले मिलकर अपनी तकलीफें उनसे बांटता है। कहा जाता है कि ऐसा करने से शनि उस व्यक्ति की सारी तकलीफें दूर कर देते हैं।
कैसे पहुंचें-
ग्वालियर, मध्य प्रदेश के मुख्य शहरों में से एक है। यहां से नियमित रेल गाड़ियां और बसें चलती हैं। ग्वालियर में एयरपोर्ट भी है, तो हवाई मार्ग की मदद से भी यहां पहुंचा जा सकता है।
6.कष्टभंजन हनुमान मंदिर (सारंगपुर)
गुजरात में भावनगर के सारंगपुर में भगवान हनुमान का एक प्राचीन मंदिर है, जिसे कष्टभंजन हनुमानजी के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर अपने आप में ही खास है, क्योंकि इस मंदिर में भगवान हनुमान के साथ शनिदेव विराजित हैं। इतना ही नहीं यहां पर शनिदेव स्त्री रूप में हनुमान के चरणों में बैठे दिखाई देते हैं। इस मंदिर को लेकर कहा जाता है कि यदि किसी भी भक्त की कुंडली में शनि दोष हो तो कष्टभंजन हनुमान के दर्शन और पूजा-अर्चना करने से सभी दोष खत्म हो जाते है। इसी वजह से इस मंदिर में सालभर भक्तों की भीड़ लगी रहती हैं।

Wednesday, May 24, 2017

श्रीकृष्ण ने खुद को कहा है पेड़ों में पीपल

भगवान श्रीकृष्‍ण ने गीता के 10 वें अध्याय में कहा है अश्वथ: सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारद: यानी हे अर्जुन वृक्षों में मैं पीपल हूं और देवर्षियों में नारद। इस श्लोक को पढ़कर मन में ये विचार जरूर आता है कि कदंब के नीचे रास रचाने वाले श्रीकृष्ण ने आखिर खुद को पीपल की संज्ञा ही क्यों दी। आइए जानते हैं इसके धार्मिक और वैज्ञानिक कारणों को…

1. पीपल में अनोखी तरह की जीने की चाह होती है। आप उसे उखाड़ कर फेंक दीजिए, वह कहीं भी फिर से उग आएगा। मिट्टी तो मिट्टी वह पत्थर पर भी उग आता है। आपके घर की दीवारों को तोड़ कर उग आता है। भगवान श्रीकृष्‍ण मानव को यह संदेश देते हैं कि हे मनुष्यों तुम सभी में पीपल के समान ही जिजीविषा यानी जीवन की चाह होनी चाहिए।

2. किसी स्थान को पकड़कर मत बैठो। जहां भी संभावना हो, जैसी भी परिस्थिति हो। उस परिस्थिति में खुद को ढालो और आगे बढ़ो। आखिर भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी जड़ों को मथुरा से उखाड़, द्वारका नगरी को बसाया ही था।

3. पीपल का तीसरा गुण भी जीवन देने से जुड़ा है। सभी पेड़ों में सबसे अधिक ऑक्‍सीजन पीपल का पेड़ ही देता है। इतना ही नहीं, पीपल एक मात्र पेड़ है, जो दिन के समान रात में भी ऑक्सीजन देता है। जबकि दूसरे सभी पेड़ कार्बनडाई ऑक्साइड छोड़ते हैं।

4. लगातार ध्यान और समाधि में एक मात्र पीपल के वृक्ष के नीचे ही बैठे रह सकते हैं। दूसरे पेड़ों के पास से आपको रात के समय उठना पड़ेगा। सनातन धर्म ने इसी कारण पीपल पर ब्रह्म का वास बताया है। ब्रहृम यानी सृष्टि। सृष्टि जिस दिन अपनी जीने की चाह छोड़ देगी, मानव ही नहीं, पूरे प्राणी जगत का विनाश हो जाएगा।

5. पीपल में कई औषधीय गुण पाए जाते हैं। यह सांस संबंधी समस्या में बेहद लाभकारी है। इसके अलावा इसके पत्तों का दूध में उबालकर पीने से भी दमा में लाभ होता है। पीपल के पत्तों का उपयोग कब्ज या गैस की समस्या में दवा के तौर पर किया जाता है। इसे पित्त खत्म करने वाला भी माना जाता है। पीपल की दातुन से दांत मजबूत होते हैं। इसके अलावा चमड़ी से जुड़े रोगों सहित कई असाध्य रोग इससे दूर किए जा सकते हैं।
https://religion.bhaskar.com/news/JM-JMJ-SAS-it-is-believed-that-lord-krishna-resides-on-peepal-tree-5601016-PHO.html?ref=keyreco

Tuesday, May 23, 2017

एकाग्रता और कामयाबी मिलती है रोज ये छोटा सा काम करने से

वेद माता गायत्री के मंत्र को सफलता देने वाला माना गया है। इस मंत्र का रोजाना 108 बार जप करने से विद्यार्थी को मन एकाग्र करने में आसानी होती है। वेदों के अनुसार गायत्री सर्वश्रेष्ठ मंत्र है। इसके जप के लिए तीन समय बताए गए हैं। गायत्री मंत्र का जप का पहला समय है सुबह का, सूर्योदय से थोड़ी देर पहले मंत्र जप शुरू किया जाना चाहिए।

मंत्र जप के लिए दूसरा समय है दोपहर का। दोपहर में भी इस मंत्र का जप किया जाता है। तीसरा समय है शाम को सूर्यास्त के कुछ देर पहले मंत्र जप शुरू करके सूर्यास्त के कुछ देर बाद तक जप करना चाहिए। इन तीन समय के अतिरिक्त यदि गायत्री मंत्र का जप करना हो तो मौन रहकर या मानसिक रूप से जप करना चाहिए। मंत्र का जप तेज आवाज में नहीं करना चाहिए।

इस मंत्र के नियमित जप से त्वचा में चमक आती है। आंखों की रोशनी बढ़ती है। सिद्धि प्राप्त होती है। गुस्सा शांत होता है। ज्ञान की वृद्धि होती है। कामों में आ रही रुकावटें दूर होने लगती है और कामयाबी मिलने लगती है।

Monday, May 22, 2017

लक्ष्मी का रूप नहीं है तुलसी, फिर भी बिना इसके भोग नहीं लगता ठाकुरजी को, ये है कारण

शालिग्राम भगवान विष्‍णु का रूप है, लेकिन मां तुलसी माता लक्ष्मी का रूप नहीं है। एक शाप के चलते भगवान विष्‍णु ने पत्थर का रूप लिया था और ये श्राप दिया था मां तुलसी ने। जानिए इसके पीछे की कहानी। पौराणिक कथा के अनुसार राक्षस कुल में जन्मी वृंदा नाम की एक कन्या थी, जो भगवान विष्‍णु की भक्त थी। जब वृंदा बड़ी हुई तो उनका विवाह राक्षस कुल में दानव जलंधर से हुआ।
पतिव्रता वृंदा अपने पति की खूब सेवा करती थी। एक बार देवताओं और दानवों में युद्ध हुआ और जब जलंधर युद्ध पर जाने लगा तो वृंदा ने कहा कि वे जब तक विजयी होकर वापस नहीं आएंगे, वो अनुष्ठान करेंगी और इस संकल्प के साथ वृंदा पूजा में बैठ गई। उनके व्रत के प्रभाव के कारण देवता जलंधर से हार रहे थे। ऐसे में सभी देवता मदद के लिए भगवान विष्‍णु के पास गए। तब भगवान विष्‍णु ने कहा कि वृंदा मेरी परम भक्त है और मैं उसके साथ छल नहीं कर सकता, लेकिन कोई दूसरा रास्ता ना होने के कारण भगवान विष्‍णु देवताओं की मदद के लिए तैयार हो गए। माना जाता है कि भगवान ने जलंधर का ही रूप लिया।

वृंदा के महल में पहुंच गए और जैसे ही वृंदा ने भगवान विष्णु को अपना पति समझकर छूआ। इसी के साथ वृंदा का संकल्प टूटते ही युद्ध में देवताओं ने जलंधर को मार दिया और उसका सिर काटकर अलग कर दिया। जलंधर का सिर सीधे महल में वृंदा के सामने गिरा। अपने पति का कटा सिर देखकर जब उन्होंने पूछा तो भगवान अपने असली रूप में आ गए। सारी बात समझ आने पर वृंदा ने भगवान को शाप दे दिया कि आप पत्थर के हो जाओ और भगवान उसी समय पत्थर के हो गए।

जिस कारण देवताओं में हाहाकर मच गया। ऐसे में देवी लक्ष्मी के प्रार्थना करने के बाद वृंदा ने भगवान को पहले जैसा ही कर दिया। भगवान को पहले जैसा करने के साथ ही वृंदा अपने पति का सिर लेकर सती हो गई और उनकी राख से एक पौधा निकला, जिसे भगवान विष्‍णु ने तुलसी नाम दिया और कहा कि उनका एक रूप इस पत्थर के रूप रहेगा। जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जाएगा। भगवान विष्‍णु ने यह भी कहा कि बिना तुलसी के वो प्रसाद स्वीकार नहीं करेंगे।

Saturday, May 20, 2017

ग्रंथ और हेल्थ: 6 कारणों से बार-बार होती है बीमारी, ध्यान रखेंगे तो रहेंगे हेल्दी

गरुड़ पुराण में 6 ऐसे कारण बताए गए हैं, जिनकी वजह से हम बीमारियों की गिरफ्त में आ जाते हैं। अगर इन बातों का ध्यान रखा जाए तो ज्यादा से ज्यादा समय स्वस्थ रह सकते हैं। जानें, गरुड़ पुराण में कहे गए बीमारियों के 6 कारण-
श्लोक-
अत्यम्बुपानं कठिनाशनं च, धातुक्षयो वेगविधापणं च।
दिवाशयो जागरणं च रात्रौ, षड्भिर्नराणा प्रभवन्ति रोगाः।।
1. जरूरत से ज्यादा पानी पीना
वैसे को पानी पीना शरीर के लिए अच्छा माना जाता है। पर्याप्त पानी पीने से पेट संबंधी कई बीमारियों से बचा जा सकता है, लेकिन जरूरत से ज्यादा पानी आपको फायदे की जगह नुकसान भी पहुंचा सकता है। गरुड़ पुराण के अनुसार, जो मनुष्य शरीर की आवश्यकता से ज्यादा पानी पीता है, उसे कई तरह की बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए, अपने शरीर की जरूरत को समझें और उतना ही पानी पीएं, जितना आवश्यक हो।
2. दबाव बनने पर भी नित्यक्रियाएं रोकना
नित्यक्रियाएं बीमारियों को खुद से दूर रखने का एक आसान तरीका है। जो मनुष्य रोज अपने दिन की शुरुआत में ही नित्यकर्मों का पालन करता है, वह ज्यादा स्वस्थ रहता है। जो दबाव बनने पर भी नित्यक्रिया को रोकता है, उसके बीमारियों से घिरने की आशंका बनी रहती है। इसलिए, कभी भी ऐसा न करें।
3. दिन में सोना
दिन में सोना बीमारियों का सबसे बड़ा कारण माना जाता है। दिन में सोने वाला आलसी प्रवृत्ति का माना जाता है। दिन में सोना लोग आराम पाने का एक जरिया मानते हैं, लेकिन यह आदत आपके आराम नहीं बल्कि कई बीमारियां देती है। इसलिए, ध्यान रखें कि ये आदत आपको ना लगे और अगर ये आदत आप में हैं तो फिर तुरंत छोड़ दें।
3. रात में जागना
कई लोगों को रात में देर तक जागने की आदत होती है। जिस तरह दिन में सोना बीमारियों का घर है, उसी तरह रात में जागना भी बहुत घातक होता है। हर काम के लिए एक निश्चित समय होता है और उस काम को निश्चित समय पर ही करना चाहिए। रात में देर तक जागने से आप कई तरह की बीमारियों का शिकार हो सकते हैं।
5. धातु (इम्युनिटी पावर) खत्म हो जाना
शरीर में बीमारियों से लड़ने की ताकत को इम्युनिटी पावर कहते हैं। जिस मनुष्य की इम्युनिटी पावर जितनी कमजोर होती है, वह उतना ही ज्यादा बीमार रहता है। किसी की भी इम्युनिटी पावर उसकी दिनचर्या और आदतों पर निर्भर करती है। जो मनुष्य नियमित समय पर उठता है, थोड़ा समय व्यायाम आदि करता है। सही समय पर खाना खाता और सोता है, उसकी इम्युनिटी पावर बहुत अच्छी होती है और वह कई बीमारियों से बचा रहता है। इसलिए, कोशिश करें की आप भी एक सही दिनचर्या का पालन करें और अपनी इम्युनिटी पावर को बनाए रखें।
6. भारी भोजन करना
खाने में सभी विटामिन और प्रोटीन होना अनिर्वाय कहा गया है, लेकिन इसमें भी सावधानी रखना बहुत ही जरूरी है। लगातार भारी भोजन करना शरीर के लिए बहुत ज्यादा नुकसान दायक हो सकता है। स्वस्थ्य रहने के लिए सुबह नाश्ता करना चाहिए और फिर विटामिन और प्रोटीन से भरा लंच करना चाहिए। रात को भारी या मसालेदार खाने से बचें। ऐसा करने से आप ज्यादा से ज्यादा समय सेहतमंद रहेंगे।

Friday, May 19, 2017

श्रीकृष्ण ने सीख लिए थे 64 दिन में ये 64 काम

श्री कृष्ण अपनी शिक्षा ग्रहण करने आवंतिपुर (उज्जैन) गुरु सांदीपनि के आश्रम में गए थे। जहां वो मात्र 64 दिन रहे थे। वहां पर उन्होंने ने मात्र 64 दिनों में ही अपने गुरु से 64 कलाओं की शिक्षा हासिल कर ली थी। दरअसल, श्री कृष्ण भगवान के अवतार थे और ये कलाएं उन को पहले से ही आती थी। मगर उनका जन्म एक साधारण इंसान के रूप में हुआ था इसलिए उन्होंने गुरु के पास जाकर इन्हें सीखा।
1-नृत्य – नाचना
2-
वाद्य- तरह-तरह के बाजे बजाना
3-
गायन विद्या – गायकी।
4-
नाट्य – तरह-तरह के हाव-भाव व अभिनय
5-
इंद्रजाल- जादूगरी
6-
नाटक आख्यायिका आदि की रचना करना
7-
सुगंधित चीजें- इत्र, तेल आदि बनाना
8-
फूलों के आभूषणों से श्रृंगार करना
9-
बेताल आदि को वश में रखने की विद्या
10-
बच्चों के खेल
11- विजय प्राप्त कराने वाली विद्या
12-
मंत्रविद्या
13-
शकुन-अपशकुन जानना, प्रश्नों उत्तर में शुभाशुभ बतलाना
14-
रत्नों को अलग-अलग प्रकार के आकारों में काटना
15-
कई प्रकार के मातृका यन्त्र बनाना
16-
सांकेतिक भाषा बनाना
17-
जल को बांधना।
18-
बेल-बूटे बनाना
19-
चावल और फूलों से पूजा के उपहार की रचना करना। (देव पूजन या अन्य शुभ मौकों पर कई रंगों से रंगे चावल, जौ आदि चीजों और फूलों को तरह-तरह से सजाना)
20-
फूलों की सेज बनाना।
21- तोता-मैना आदि की बोलियां बोलना – इस कला के जरिए तोता-मैना की तरह बोलना या उनको बोल सिखाए जाते हैं।
22- वृक्षों की चिकित्सा
23- भेड़, मुर्गा, बटेर आदि को लड़ाने की रीति
24- उच्चाटन की विधि
25- घर आदि बनाने की कारीगरी
26- गलीचे, दरी आदि बनाना
27- बढ़ई की कारीगरी
28- पट्टी, बेंत, बाण आदि बनाना यानी आसन, कुर्सी, पलंग आदि को बेंत आदि चीजों से बनाना।
29- तरह-तरह खाने की चीजें बनाना यानी कई तरह सब्जी, रस, मीठे पकवान, कड़ी आदि बनाने की कला।
30- हाथ की फूर्ती के काम
31- चाहे जैसा वेष धारण कर लेना
32- तरह-तरह पीने के पदार्थ बनाना
33- द्यू्त क्रीड़ा
34- समस्त छन्दों का ज्ञान
35- वस्त्रों को छिपाने या बदलने की विद्या
36- दूर के मनुष्य या वस्तुओं का आकर्षण
37- कपड़े और गहने बनाना
38- हार-माला आदि बनाना
39- विचित्र सिद्धियां दिखलाना यानी ऐसे मंत्रों का प्रयोग या फिर जड़ी-बुटियों को मिलाकर ऐसी चीजें या                                                       औषधि बनाना जिससे शत्रु कमजोर हो या नुकसान उठाए।
40-कान और चोटी के फूलों के गहने बनाना – स्त्रियों की चोटी पर सजाने के लिए गहनों का रूप देकर फूलों को      गूंथना।
41- कठपुतली बनाना, नाचना
42- प्रतिमा आदि बनाना
43- पहेलियां बूझना
44- सूई का काम यानी कपड़ों की सिलाई, रफू, कसीदाकारी व मोजे, बनियान या कच्छे बुनना।
45 – बालों की सफाई का कौशल
46- मुट्ठी की चीज या मनकी बात बता देना
47- कई देशों की भाषा का ज्ञान
48 – मलेच्छ-काव्यों का समझ लेना – ऐसे संकेतों को लिखने व समझने की कला जो उसे जानने वाला ही             समझ सके।
49 – सोने, चांदी आदि धातु तथा हीरे-पन्ने आदि रत्नों की परीक्षा
50 – सोना-चांदी आदि बना लेना
51 – मणियों के रंग को पहचानना
52- खानों की पहचान
53- चित्रकारी
54- दांत, वस्त्र और अंगों को रंगना
55- शय्या-रचना
56- मणियों की फर्श बनाना यानी घर के फर्श के कुछ हिस्से में मोती, रत्नों से जड़ना।
57- कूटनीति
58- ग्रंथों को पढ़ाने की चातुराई
59- नई-नई बातें निकालना
60- समस्यापूर्ति करना
61- समस्त कोशों का ज्ञान
62- मन में कटक रचना करना यानी किसी श्लोक आदि में छूटे पद या चरण को मन से पूरा करना।
63-छल से काम निकालना
64- कानों के पत्तों की रचना करना यानी शंख, हाथीदांत सहित कई तरह के कान के गहने तैयार करना।
https://religion.bhaskar.com/news/JM-JMJ-SAS-64-kalas-arts-and-14-vidyas-techniques-of-ancient-india-5597233-PHO.html