Friday, January 20, 2017

भगवान हनुमान जी ने यहां भेजा था शनिदेव को

मध्य प्रदेश में ग्वालियर के पास बने शनिदेव मंदिर का विशेष महत्व है। यह देश के सबसे प्राचीनतम शनि मंदिरों में से एक माना जाता है। शनिदेन के यहां विराजित होने के कारण इस जगह को बहुत ही प्रभावशाली माना जाता है। मान्यता है कि महाराष्ट्र के सिगनापुर शनि मंदिर में प्रतिष्ठित शनि शिला भी इसी शनि पर्वत से ले जाई गई थी।

भगवान हनुमान जी ने यहां भेजा था शनिदेव को
प्राचीन कथा के अनुसार, रावण ने शनिदेव को भी कैद कर रखा था। जब हनुमान जी माता सीता की खोज में लंका पहुंचे, तब उन्होंने वहां पर शनिदेव को रावण की कैद में देखा। भगवान हनुमान को देख शनिदेव ने उनसे यहां से आजाद करने की विनती की। शनिदेव के कहने पर भगवान हनुमान नो उन्हें लंका से कहीं दूर फेंक दिया, ताकि शनिदेव किसी सुरक्षित जगह पर जा सकें। हनुमान जी के द्वारा लंका से फेंके जाने पर शनिदेव इस क्षेत्र में आकर प्रतिष्ठित हो गए और तब से यह क्षेत्र शनिक्षेत्र के नाम से विख्यात हो गया।

आज भी मौजूद हैं शनिदेव के गिरने का निशान

जब शनिदेव यहां आ कर गिरे तो उल्कापास सा हुआ। शिला के रूप में वहां शनिदेव के प्रतिष्ठत होने से एक बड़ा गड्ढा बन गया, जैसा कि उल्का गिरने से होता है। ये गड्ढा आज भी मौजूद है।

तेल चढ़ाने के बाद गले मिलने की परंपरा
यहां शनि देव को तेल चढ़ाने के बाद उनसे गले मिलने की परंपरा प्रतलित है। जो भी यहां आता है वह शनिदेव को तेल चढ़ाने के बाद बड़े प्यार से शनि महाराज से गले मिलता है और अपनी तकलीफें उनसे बांटता है। कहा जाता है कि ऐसा करने से शनिदेव उस व्यक्ति की सारी तकलीफें दूर कर देते हैं।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-TID-shani-temple-in-gwalior-in-hindi-news-hindi-5507924-PHO.html

Thursday, January 19, 2017

नीतियां: ये नाम लेने से भी पुण्य की प्राप्ति होती है।

महर्षि मार्कण्डेय प्राचीन भारत के महान ऋषियों में से एक थे। इनका जन्म महर्षि भृगु के वंश में हुआ था। महर्षि मार्कण्डेय भगवान विष्णु और भगवान शिव के परम भक्त थे। इनका वर्णन कई पुराणों और ग्रंथों में मिलता है।
इन्होंने जीवन को सही ढंग से चलाने और पुण्य पाने के लिए कई नीतियां बताई हैं, जिनका पालन करके जीवन में कई लाभ पाए जा सकते हैं। महर्षि मार्कण्डेय ने 3 ऐसे काम बताए हैं, जिन्हें करना सबसे अच्छा माना गया है। इन कामों को करने से मनुष्य किसी भी मुसीबत का सामना बड़ी ही आसानी से कर लेता है और उसे शुभ फल की प्राप्ति होती है।
महर्षि मार्कण्डेय द्वार कहा गया श्लोक
पुण्यतीर्थाभिषेकं च पवित्राणां च कीर्तनम्।
सद्धिः सम्भाषणं चैव प्रशस्तं कीत्यते बुधैः।।
1. तीर्थों में स्नान
तीर्थ स्थानों पर स्वयं देवताओं का निवास माना जाता है। तीर्थ स्थानों पर जाना, वहां पूजा करना और वहां के कुंड या नदी में स्नान करने से मनुष्य के सभी पापों का नाश हो जाता है और पुण्य की प्राप्ति होती है। कई तीर्थों पर स्नान करने से मनुष्य को मोक्ष भी मिलता है। तीर्थों पर स्नान सभी कामों में से सबसे अच्छा बताया गया है।
2. पवित्र वस्तुओं का नाम लेना
गोमूत्र, गोबर, गोदुग्ध ( गाय का दूध), गोशाला हवन, पूजन, तुलसी, मंदिर, अग्नि, पुराण, ग्रंथ ऐसी कई वस्तुओं को पवित्र माना जाता है। इनमें में खाने योग्य चीजों का सेवन व ग्रंथों को पढ़ना महत्वपूर्ण माना जाता है, लेकिन अगर कोई व्यक्ति ऐसा न कर सके तो केवल उनका नाम लेने से ही पुण्य की प्राप्ति हो जाती है। हर मनुष्य को हिंदू धर्म में पवित्र मानी गई इन चीजों का नाम पवित्र भाव से लेते रहना चाहिए। इससे निश्चित ही शुभ फल मिलता है।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-JKR-DGRA-niti-of-rishi-markandeya-in-hindi-news-hindi-5507180-PHO.html

Wednesday, January 18, 2017

गुड़ और मेथीदाने से बनी है भगवान गणेश की यह विशाल प्रतिमा

भारत के हर कोने में भगवान गणेश जी के मंदिर हैं और उनके प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है, उज्जैन का बड़ा गणेश मंदिर। यह मंदिर उज्जैन के प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर के पास ही है। इस मंदिर में भगवान गणेश को बड़े गणेश के नाम के जाना जाता है। इस मंदिर में भगवान गणेश की एक विशाल मूर्ति है। जिस कारण से इसे बडे़ गणेश जी के नाम से पुकारा जाता है। यहां स्थापित गणेश जी की यह प्रतिमा विश्व की सबसे ऊँची और विशाल गणेश जी की मूर्तियों में से एक है।
गुड़ और मेथीदाने से बनी है यहां की गणेश मूर्ति
कहा जाता है कि इस गणेश प्रतिमा की स्थापना महर्षि गुरु महाराज सिद्धांत वागेश पं. नारायणजी व्यास ने करवाई थी। इस मंदिर की भगवान गणेश की प्रतिमा के निर्माण में अनेक प्रकार के प्रयोग किए गए थे। कहते हैं कि इस विशाल गणेश प्रतिमा को सीमेंट से नहीं बनाया गया था। इस मूर्ति की निर्माण ईट, चूने व बालू रेत से किया गया था। इस मूर्ति की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इस प्रतिमा को बनाने में गुड़ व मेथीदाने का मसाला भी उपयोग में लाया गया था।
मूर्ति में हैं सभी पावन तीर्थों का जल और मिट्टी
साथ ही इस मूर्ति को बनाने में सभी पवित्र तीर्थ स्थलों का जल मिलाया गया था और सात मोक्षपुरियों मथुरा, माया, अयोध्या, काँची, उज्जैन, काशी व द्वारिका की मिट्टी भी मिलाई गई है, जो की इस मूर्ति को और भी महत्वपूर्ण बनाती है। इस प्रतिमा के निर्माण में लगभग ढाई वर्ष का समय लगा था।
ऐसी है यहां की मूर्ति
यहां की गणेश प्रतिमा लगभग 18 फीट ऊंची और 10 फीट चौड़ी है और इस मूर्ति में भगवान गणेश की सूंड दक्षिणावर्ती है। प्रतिमा के मस्तक पर त्रिशूल और स्वस्तिक बना हुआ है। दाहिनी ओर घूमी हुई सूंड में एक लड्डू दबा है। भगवान गणेश के विशाल कान है, गले में पुष्प माला है। दोनों ऊपरी हाथ जपमुद्रा में व नीचे के दांये हाथ में माला व बांये में लड्डू का थाल है।
इस मंदिर में हैं कई देवी-देवता
इस मंदिर में भगवान गणेश के साथ-साथ कई देवी-देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित हैं। मंदिर में माता यशोदा की गोद में बैठे हुए भगवान कृष्ण की प्रतिमा है और उनके पीछे शेषनाग के ऊपर बांसुरी बजाते हुए कृष्णजी की बहुत ही सुन्दर मूर्ति स्थापित है। मंदिर के बीच में पञ्चमुखी हनुमान चिंतामणि की एक सुंदर प्रतिमा भी है, कहा जाता है इस मूर्ति की स्थापना बड़े गणपति की स्थापना के भी पहले की गई थी। पञ्चमुखी यानी पांच मुखों वाले हनुमान के मुख इस प्रकार हैं: पूर्व में हनुमान मुख है और पश्चिम में नरसिंह मुख, उत्तर में वराह है तो दक्षिण में गरुड़ मुख। पांचवा मुख ऊपर की तरफ है जो कि घोड़े का हयग्रीव अवतार है। हाथों में अस्त्र-शस्त्र लिए श्री पञ्चमुखी हनुमान की यह प्रतिमा बहुत ही सुंदर है।
कैसे पहुंचें
हवाई मार्ग- उज्जैन से लगभग 45 कि.मी की दूरी पर इन्दौर का एयरपोर्ट है। वहां तक हवाई मार्ग से आकर रेल या सड़क मार्ग से महाकाल मंदिर पहुंचा जा सकता है।
रेल मार्ग- देश के लगभग सभी बड़े शहरों से उज्जैन के लिए रेल गाड़ियां चलती हैं।
सड़क मार्ग- उज्जैन पहुंचने के लिए सड़क मार्ग का भी प्रयोग किया जा सकता है।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-TID-bade-ganesh-temple-of-ujjain-in-hindi-news-hindi-5506417-PHO.html

Tuesday, January 17, 2017

शुरू हो चुका है हिंदू कैलेंडर का 11वां महीना, जानिए इसका महत्व

हिंदू पंचांग के अनुसार, साल के 11वें महीने का नाम माघ है। धर्म शास्त्रों में इस महीने को बहुत पवित्र माना गया है। इस बार माघ मास का प्रारंभ 13 जनवरी, शुक्रवार से हो चुका है, जो 10 फरवरी, शुक्रवार तक रहेगा। इस मास में भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करने तथा नदी स्नान करने से मनुष्य स्वर्गलोक में स्थान पाता है। धर्मग्रंथों के अनुसार-

स्वर्गलोके चिरं वासो येषां मनसि वर्तते।
यत्र क्वापि जले तैस्तु स्नातव्यं मृगभास्करे।।

अर्थ- जिन मनुष्यों को चिरकाल तक स्वर्गलोक में रहने की इच्छा हो, उन्हें माघ मास में सूर्य के मकर राशि में स्थित होने पर पवित्र नदी में सुबह स्नान करना चाहिए।

माघं तु नियतो मासमेकभक्तेन य: क्षिपेत्।
श्रीमत्कुले ज्ञातिमध्ये स महत्त्वं प्रपद्यते।।
(
महाभारत अनु. 106/5)

अर्थ-जो माघ मास में नियमपूर्वक एक समय भोजन करता है, वह धनवान कुल में जन्म लेकर अपने कुटुम्बीजनों में महत्व को प्राप्त होता है।

अहोरात्रेण द्वादश्यां माघमासे तु माधवम्।
राजसूयमवाप्रोति कुलं चैव समुद्धरेत्।।
(
महाभारत अनु. 109/5)

अर्थ- माघ मास की द्वादशी तिथि को दिन-रात उपवास करके भगवान माधव की पूजा करने से उपासक को राजसूययज्ञ का फल प्राप्त होता है और वह अपने कुल का उद्धार करता है।

माघ मास की कथा इस प्रकार है-
प्राचीन काल में नर्मदा के तट पर सुव्रत नामक एक ब्राह्मण रहते थे। वे समस्त वेद-वेदांगों, धर्मशास्त्रों व पुराणों के ज्ञाता थे। वे अनेक देशों की भाषाएं व लिपियां भी जानते थे। इतना विद्वान होते हुए भी उन्होंने अपने ज्ञान का उपयोग धर्म के कामों में नहीं किया। पूरा जीवन केवल धन कमाने में ही गवां दिया। जब सुव्रत बूढ़े हो गए तब उन्हें याद आया कि मैंने धन तो बहुत कमाया, लेकिन परलोक सुधारने के लिए कोई काम नहीं किया। यह सोचकर वे पश्चाताप करने लगे। उसी रात चोरों ने उनके धन को चुरा लिया, लेकिन सुव्रत को इसका कोई दु:ख नहीं हुआ क्योंकि वे तो परमात्मा को प्राप्त करने के लिए उपाय सोच रहे थे। तभी सुव्रत को एक श्लोक याद आया-
माघे निमग्ना: सलिले सुशीते विमुक्तपापास्त्रिदिवं प्रयान्ति।।
सुव्रत को अपने उद्धार का मूल मंत्र मिल गया। सुव्रत ने माघ स्नान का संकल्प लिया और नौ दिनों तक प्रात: नर्मदा के जल में स्नान किया। दसवें दिन स्नान के बाद उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया। सुव्रत ने जीवन भर कोई अच्छा काम नहीं किया था, लेकिन माघ मास में स्नान करके पश्चाताप करने से उनका मन निर्मल हो चुका था। जब उन्होंने अपने प्राण त्यागे तो उन्हें लेने दिव्य विमान आया और उस पर बैठकर वे स्वर्गलोक चले गए।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-JKR-DHAJ-maagh-month-start-on-13-january-news-hindi-5504258-PHO.html

Monday, January 16, 2017

देवी-देवता को इन 7 चीजों का भोग लगाना चाहिए

हिंदू धर्म में भोजन करते समय सात्विकता के अलावा अच्छी भावना और अच्छे वातावरण और आसन का बहुत महत्व माना गया है। यही कारण है कि सिर्फ इंसान ही नहीं देवता भी भोजन का खास ख्याल रखने पर जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं। देवी और देवताओं को इन 7 चीजों में से अक्सर किसी का एक का भोग लगाया जाए तो घर में कभी धन व धान्य की कमी नहीं होती है।
1. खीर
खीर कई प्रकार से बनाई जाती है। इसे हविष्य भोजन माना गया है। खीर में किशमिश, बारीक कतरे हुए बादाम, बहुत थोड़ी-सी नारियल की कतरन, काजू, पिस्ता, चारौली, थोड़े से पिसे हुए मखाने, सुगंध के लिए एक इलायची, कुछ केसर और अंत में तुलसी डालकर देवी-देवताओं को अर्पित करने से उनकी कृपा बनी रहती हे।
2. मालपुए
मालपुए देवी के साथ भगवान विष्णु के भी प्रिय भोग में से एक है। अधिक मास में भगवान को ये ही भोग लगाने का नियम है। पूरी शुद्धता के साथ बने मालपुए का भोग लगाने से भी देवी की कृपा हमेशा बनी रहती है।
3. केसर भात
केसर भात बहुत ही स्वादिष्ट और मन को भाने वाली होती है। केसरिया भात को बनाने के लिए बासमती चावल, केसर और सूखे मेवे आदि की जरुरत होती है। अक्सर माता लक्ष्मी और सरस्वती को केसर भात का भोग लगाया जाता है, क्योंकि इनको ये भात विशेष रूप से पसंद है ऐसी मान्यता है।
4. हलुआ
भारत में हलवा पारंपरिक मिठाईयों में से एक है। जैसे सूजी का हलुआ, आटे का हलुआ, गाजर का हलुआ, मूंग का हलुआ, कद्दू का हलुआ, आदि। इसमें से सूजी के हलुवे का भोग लगाया जाता है। हनुमानजी को हलुआ, पंच मेवा, गुड़ से बने लड्डू या रोठ, डंठल वाला पान और केसर- भात बहुत पसंद हैं। देवी मां को भी हलुआ प्रिय है।
5. पूरणपोली
मां दुर्गा को इसका भोग लगाने से हर तरह की मनोकामना पूर्ण होती है। माताजी को हलुए के साथ पूरणपोली भी पसंद है।
6. लड्डू
मोदक के लड्डू, बेसन के लड्डू, सूजी के लड्डू, मोतीचूर के लड्डू, नारियल के लड्डू, बूंदी के लड्डू, गेंहू के लड्डू, मलाई के लड्डू, चूरमा के लड्डू आदि। सभी देवताओं को पसंद हैं, लेकिन गणेशजी को ये विशेष रूप से पसंद हैं।
7. सफेद मावे की मिठाई
सफेद मावे की मिठाई देवी-देवताओं को विशेष रूप से पसंद है, जब किसी विशेष मनोकामना के लिए इसका भोग लगाएं तो मिठाई को कन्याओं में बांटना चाहिए।

Saturday, January 14, 2017

महाभारत से समझें, कैसे बनाए बच्चों का सुनहरा भविष्य

समाज और देश-दुनिया की महत्वपूर्ण इकाई है परिवार जबकि परिवार की शुरुआत होती है दाम्पत्य से। परिवार की सम्पत्ति होती है संतान। अगर यह कहें कि संतान के बिना समाज का कोई अस्तित्व ही नहीं है तो कोई अचरज नहीं है। अपना परिवार बढ़ाना या संतान का उत्पादन करना सिर्फ व्यक्तिगत ही नहीं बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यह कार्य साधारण नहीं बल्कि बड़ा ही महत्वपूर्ण और चुनौती वाला है।

किसी भी युवक या युवति को माता-पिता बनने की जिम्मेदारी को उठाने के लिए आगे आने से पहले हर तरह से तैयार हो जाना चाहिए। पति तथा पत्नी दोनों की शारीरिक, मानसिक और आर्थिक स्थिति इस लायक हो कि वे संतान और परिवार की जिम्मेदारी को बखूबी निभा सकें , तभी उन्ंहे इस दिशा में आगे कदम बढ़ाना चाहिए। स्वयं और परिवार की स्थिति तो ध्याान में रखना ही चाहिये साथ ही देश, समय और परिस्थितियों का भी ध्यान करना ही चाहिए। गलत स्थान, अनुचित समय और विपरीत परिस्थितियों में संतान का जन्म लेना भी समस्याओं को बढ़ावा देता है।

परिवार का भविष्य संतानों के संस्कार और उनकी परवरिश पर ही निर्भर करता है। बच्चों के लालन-पालन के लिए सिर्फ सुख और सुविधाओं की ही आवश्यकता नहीं होती। अभावों में भी बच्चों को अच्छे संस्कार दिए जा सकते हैं। जब संतानें संस्कारवान और सभ्य होंगी तो परिवार सफल होगा। अगर अधिक लाड़-प्यार में संतानों को बिगाड़ दिया जाए तो परिवार को टूटने में देर नहीं लगेगी।

महाभारत में कौरव और पांडवों में क्या फर्क था। कौरव महलों की सुख-सुविधाओं में पले थे और पांडव जंगल में। फिर भी पांडव नायक हुए और कौरव खलनायक। पांडवों को उनकी मां कुंती ने अकेले ही जंगल में पाला। कोई सुख-सुविधा नहीं। जबकि कौरवों को धृतराष्ट्र और गांधारी ने महलों में पाला। फिर भी आप फर्क देखिए। अपने बच्चों को हमेशा हर चीज सुलभ ना कराएं, कभी-कभी अभावों में जीना भी सिखाएं। अभाव हम में किसी वस्तु को पाने की लालसा भरते हैं। उसके लिए परिश्रम करना सिखाते हैं।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-FMT-family-management-tips-from-mahabharat-in-hindi-news-hindi-5374066-NOR.html

Thursday, January 12, 2017

पूजा घर में इनकी तस्वीर नहीं लगाना चाहिए, ये है इस मान्यता का साइंटिफिक कारण

हिंदू धर्म में मृत पूर्वजों को पितृ माना जाता है और पितृ को पूज्यनीय। यही कारण है कि पितरों की पुण्यतिथि पर उनकी आत्मा की शांति के लिए विभिन्न तरह का दान करने की परंपरा है। मगर पूजा वाले स्थान पर मृत लोगों की तस्वीर लगाना शुभ नहीं माना गया है। साथ ही, दोनों की तस्वीरों की साथ में पूजा भी नहीं करना चाहिए।

इसके पीछे कारण सकारात्मक-नकारात्मक ऊर्जा और अध्यात्म में हमारी एकाग्रता का है। दरअसल, मृतात्माओं से हम भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं। उनके चले जाने से हमें एक खालीपन का एहसास होता है। मंदिर में इनकी तस्वीर होने से हमारी एकाग्रता भंग हो सकती है। भगवान की पूजा के समय यह भी संभव है कि हमारा सारा ध्यान उन्हीं मृत रिश्तेदारों की ओर हो। इस बात का घर के वातावरण पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

हम पूजा में बैठते समय पूरी एकाग्रता लाने की कोशिश करते हैं ताकि पूजा का अधिकतम प्रभाव हो। ऐसे में मृतात्माओं की ओर ध्यान जाने से हम उस दु:खद घड़ी में खो जाते हैं जिसमें हमने अपने प्रियजनों को खोया था। हमारी मन:स्थिति नकारात्मक भावों से भर जाती है। इसलिए घर में भगवान और मृत लोगों की तस्वीर कभी भी एक साथ नही लगाना चाहिए।