Thursday, July 20, 2017

गायत्री मंत्र जप से होंगे ये 5 बड़े लाभ

सबसे जल्दी शुभ फल देने वाले मंत्रों में से एक है गायत्री मंत्र। इस मंत्र का सही तरीके से जप किया जाए तो धर्म लाभ के साथ ही स्वास्थ्य लाभ भी मिलते हैं। यह मंत्र सुबह या शाम को सूर्यास्त से पहले करना चाहिए। जानिए गायत्री मंत्र जप से मिलने वाले लाभ को...

गायत्री मंत्र:- ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।
सकारात्मकता बढ़ती है

गायत्री का नियमित जप करने से उत्साह व सकारात्मकता बढ़ती है। तेज बढ़ता है यानि त्वचा में चमक आती है। परमार्थ में रूचि बढ़ती है। पूर्वाभास होने लगता है। आर्शीवाद देने की शक्ति बढ़ती है। नेत्रों में तेज आता है। स्वप्न सिद्धि होती है। गुस्सा शांत होता है। ज्ञान की वृद्धि होती है।

रोग से मिलेगी मुक्ति
यदि किसी रोग से परेशान है और रोग से मुक्ति जल्दी चाहते हैं तो किसी भी शुभ मुहूर्त में एक कांसे के पात्र में जल भरकर रख लें एवं उसके सामने लाल आसन पर बैठकर गायत्री मंत्र के साथ ऐं ह्रीं क्लीं का संपुट लगाकर गायत्री मंत्र का जप करें। जप के बाद जल से भरे पात्र का सेवन करने से गंभीर से गंभीर रोग का नाश होता है। यही जल किसी अन्य रोगी को पीने देने से उसके भी रोग का नाश होता हैं।

विद्या मिलेगी
गायत्री मंत्र का जप सभी के लिए उपयोगी है लेकिन विद्यार्थियों के लिए तो यह मंत्र बहुत लाभदायक है। रोजाना इस मंत्र का एक सौ आठ बार जप करने से विद्यार्थी को सभी प्रकार की विद्या प्राप्त करने में आसानी होती है। विद्यार्थियों को पढ़ने में मन नहीं लगना, याद किया हुआ भूल जाना, जल्दी से याद न होना आदि समस्याओं से निजात मिल जाती है।

संतान पाने के लिए
किसी दंपत्ति को संतान पाने में कठिनाई आ रही हो या संतान से दुखी हो व संतान रोगग्रस्त हो तो सुबह पति-पत्नी एक साथ सफेद वस्त्र धारण कर यौं बीज मंत्र का सम्पुट लगाकर गायत्री मंत्र का जप करें। संतान संबंधी किसी भी समस्या से शीघ्र मुक्ति मिलती है।
गरीबी दूर होती है

यदि किसी व्यक्ति के व्यापार, नौकरी में हानि हो रही है या कार्य में सफलता नहीं मिलती, आमदनी कम है व व्यय अधिक है तो उन्हें गायत्री मंत्र का जप काफी फायदा पहुंचाता है। शुक्रवार को पीले वस्त्र पहनकर हाथी पर विराजमान गायत्री माता का ध्यान कर गायत्री मंत्र के आगे और पीछे श्रीं सम्पुट लगाकर जप करने से गरीबी का नाश होता है। इसके साथ ही रविवार को व्रत किया जाए तो ज्यादा लाभ होता है।

Wednesday, July 19, 2017

भगवान शिव के 5 अवतार

संसार के कल्याण के लिए भगवान शिव ने भी अनेक अवतार लिए हैं, लेकिन उनमें से कुछ अवतारों के बारे में ही आमजन जानते हैं। सावन के इस पवित्र महीने में हम आपको भगवान शिव के कुछ ऐसे अवतारों के बारे में बता रहे हैं, जिनके बारे में कम ही लोग जानते हैं। इन अवतारों की जानकारी इस प्रकार है-
1. गृहपति अवतार
नर्मदा के तट पर धर्मपुर नाम का एक नगर था। वहां विश्वानर नाम के एक मुनि तथा उनकी पत्नी शुचिष्मती रहती थीं। शुचिष्मती ने बहुत समय तक नि:संतान रहने पर एक दिन अपने पति से शिव के समान पुत्र प्राप्ति की इच्छा की। पत्नी की अभिलाषा पूरी करने के लिए मुनि विश्वनार काशी आ गए। यहां उन्होंने घोर तप द्वारा भगवान शिव के वीरेश लिंग की आराधना की।
एक दिन मुनि को वीरेश लिंग के मध्य एक बालक दिखाई दिया। मुनि ने बालरूपधारी शिव की पूजा की। उनकी पूजा से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने शुचिष्मति के गर्भ से अवतार लेने का वरदान दिया। कालांतर में शुचिष्मति गर्भवती हुई और भगवान शंकर शुचिष्मती के गर्भ से पुत्र रूप में प्रकट हुए। कहते हैं, पितामह ब्रह्मा ने ही उस बालक का नाम गृहपति रखा था।
2. ऋषि दुर्वासा
भगवान शंकर के विभिन्न अवतारों में ऋषि दुर्वासा का अवतार भी प्रमुख है। धर्म ग्रंथों के अनुसार, सती अनुसूइया के पति महर्षि अत्रि ने ब्रह्मा के निर्देशानुसार पत्नी सहित ऋक्षकुल पर्वत पर पुत्र कामना से घोर तप किया। उनके तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों उनके आश्रम पर आए। उन्होंने कहा- हमारे अंश से तुम्हारे तीन पुत्र होंगे, जो त्रिलोकी में विख्यात तथा माता-पिता का यश बढ़ाने वाले होंगे।
समय आने पर ब्रह्माजी के अंश से चंद्रमा उत्पन्न हुए। विष्णु के अंश से श्रेष्ठ संन्यास पद्धति को प्रचलित करने वाले दत्तात्रेय उत्पन्न हुए और रुद्र के अंश से मुनिवर दुर्वासा ने जन्म लिया। शास्त्रों में इसका उल्लेख है-
अत्रे: पत्न्यनसूया त्रीञ्जज्ञे सुयशस: सुतान्।
दत्तं दुर्वाससं सोममात्मेशब्रह्मïसम्भवान्॥
श्रीमद्भागवत- 4/1/15

अर्थ- अत्रि की पत्नी अनुसूइया से दत्तात्रेय, दुर्वासा और चंद्रमा नाम के तीन परम यशस्वी पुत्र हुए। ये क्रमश: भगवान विष्णु, शंकर और ब्रह्मा के अंश से उत्पन्न हुए थे।
3. यतिनाथ अवतार
भगवान शंकर ने यतिनाथ अवतार लेकर अतिथि के महत्व का प्रतिपादन किया था। उन्होंने इस अवतार में अतिथि बनकर भील दंपत्ति की परीक्षा ली थी, जिसके कारण भील दंपत्ति को अपने प्राण गंवाने पड़े। धर्म ग्रंथों के अनुसार, अर्बुदाचल पर्वत के समीप शिवभक्त आहुक-आहुका भील दंपत्ति रहते थे। एक बार भगवान शंकर यतिनाथ के वेष में उनके घर आए। उन्होंने भील दंपत्ति के घर रात बिताने की इच्छा प्रकट की। आहुका ने अपने पति को गृहस्थ की मर्यादा का स्मरण कराते हुए स्वयं धनुष बाण लेकर बाहर रात बिताने और यति को घर में विश्राम करने देने का प्रस्ताव रखा।
इस तरह आहुक धनुष-बाण लेकर बाहर चला गया। सुबह आहुका और यति ने देखा कि वन्य प्राणियों ने आहुक को मार डाला है। इस पर यतिनाथ बहुत दु:खी हुए। तब आहुका ने उन्हें शांत करते हुए कहा कि आप शोक न करें। अतिथि सेवा में प्राण विसर्जन धर्म है और उसका पालन कर हम धन्य हुए हैं। जब आहुका अपने पति की चिताग्नि में जलने लगी तो शिवजी ने उसे दर्शन देकर अगले जन्म में पुन: अपने पति से मिलने का वरदान दिया।
4. अवधूत अवतार
भगवान शंकर ने अवधूत अवतार लेकर इंद्र के अंहकार को चूर किया था। धर्म ग्रंथों के अनुसार, एक समय बृहस्पति और अन्य देवताओं को साथ लेकर इंद्र शंकरजी के दर्शनों के लिए कैलाश पर्वत पर गए। इंद्र की परीक्षा लेने के लिए शंकरजी ने अवधूत रूप धारण कर उनका मार्ग रोक लिया। इंद्र ने उस पुरुष से अवज्ञापूर्वक बार-बार उसका परिचय पूछा तो भी वह मौन रहा।
क्रोधित होकर इंद्र ने जैसे ही अवधूत पर प्रहार करने के लिए वज्र छोड़ना चाहा, वैसे ही उनका हाथ जड़ हो गया। यह देखकर बृहस्पति ने शिवजी को पहचान कर अवधूत की बहुविधि स्तुति की, जिससे प्रसन्न होकर शिवजी ने इंद्र को क्षमा कर दिया।
5. सुरेश्वर अवतार
भगवान शंकर का सुरेश्वर (इंद्र) अवतार भक्त के प्रति उनकी प्रेम भावना को प्रदर्शित करता है। इस अवतार में भगवान शंकर ने एक छोटे से बालक उपमन्यु की भक्ति से प्रसन्न होकर उसे अपनी परम भक्ति और अमर पद का वरदान दिया। धर्म ग्रंथों के अनुसार, व्याघ्रपाद का पुत्र उपमन्यु अपने मामा के घर पलता था। वह सदा दूध की इच्छा से व्याकुल रहता था। उसकी मां ने उसे अपनी अभिलाषा पूर्ण करने के लिए शिवजी की शरण में जाने को कहा।
इस पर उपमन्यु वन में जाकर ऊं नम: शिवाय का जाप करने लगा। शिवजी ने सुरेश्वर (इंद्र) का रूप धारण कर उसे दर्शन दिए और शिवजी की अनेक प्रकार से निंदा करने लगे। इस पर उपमन्यु क्रोधित होकर इंद्र को मारने के लिए खड़ा हुआ। उपमन्यु की भक्ति और अटल विश्वास देखकर शिवजी ने उसे अपने वास्तविक रूप के दर्शन कराए तथा क्षीरसागर के समान एक अनश्वर सागर उसे प्रदान किया। उसकी प्रार्थना पर कृपालु शिवजी ने उसे परम भक्ति का पद भी दिया।

Tuesday, July 18, 2017

मंत्र जप का तरीका क्या है, मंत्र से जुड़े कुछ रहस्य

मंत्र सिद्धि के चमत्कारों के बारे में तो हम सभी ने कभी न कभी सुना है मगर क्या वाकई मंत्र सिद्ध होता है। यदि होता है तो उसका तरीका क्या है आइए जानते हैं मंत्र से जुड़े कुछ ऐसे ही रहस्यों को ...
1. 3 तरह के मंत्र होते हैं
3 तरह के मंत्र होते हैं-
1.वैदिक 2.तांत्रिक और 3.शाबर मंत्र।
पहले तो आपको यह तय करना होगा कि आप किस तरह के मंत्र को जपने का संकल्प ले रहे हैं। साबर मंत्र बहुत जल्द सिद्ध होते हैं, तांत्रिक मंत्र में थोड़ा समय लगता है और वैदिक मंत्र सबसे अधिक देर से सिद्ध होते हैं, लेकिन जब वैदिक मंत्र सिद्ध हो जाते हैं तो उनका असर कभी खत्म नहीं होता है।
2. मंत्र जप
मंत्र जप तीन तरह के होते हैं –
1.वाचिक जप, 2. मानस जप और 3. उपाशु जप।
1.वाचिक जप-वाचिक जप में ऊंचे स्वर में स्पष्ट शब्दों में मंत्र का उच्चारण किया जाता है।
2.मानस जप- मानस जप का अर्थ मन ही मन जप करना।
3. उपांशु जप- उपांशु जप का अर्थ जिसमें जप करने वाले की जीभ या ओष्ठ हिलते हुए दिखाई देते हैं लेकिन आवाज नहीं सुनाई देती। बिल्कुल धीमी गति में जप करना ही उपांशु जप है।
3. मंत्र नियम​
मंत्र-साधना में विशेष ध्यान देने वाली बात है- मंत्र का सही उच्चारण। दूसरी बात जिस मंत्र का जप और अनुष्ठान करना है। उसका अर्घ्य पहले से लेना चाहिए। मंत्र सिद्धि के लिए जरूरी है कि मंत्र को गुप्त रखा जाए। रोजाना के जप से ही सिद्धि होती है। किसी विशिष्ट सिद्धि के लिए सूर्य व चंद्रग्रहण के समय किसी भी नदी में खड़े होकर जप करना चाहिए। इसमें किया गया जप शीघ्र लाभदायक होता है। जप का दशांश हवन करना चाहिए और ब्राह्मणों या गरीबों को भोजन कराना चाहिए।
4. मन का तंत्र
मंत्र को सिद्ध करने के लिए पवित्रता और मंत्र के नियमों का पालन तो करना जरूरी ही है साथ ही यह समझना भी जरूरी है कि मंत्र को सिद्ध करने का विज्ञान क्या है। मन को एक तंत्र में लाना ही मंत्र होता है।

Monday, July 17, 2017

रोचक कथाएं: शिवजी की पूजा में कौन सा फूल नहीं चढ़ाया जाता

भगवान शिव आदि और अनंत है यानी न कोई इनकी उत्पत्ति के बारे में जानता है और न कोई अंत के बारे में। अनेक ग्रंथों में भगवान शिव की महिमा का वर्णन किया गया है। शिव से जुड़ी अनेक कथाएं में पुराणों में बताई गई हैं। सावन के पवित्र महीने में हम आपको भगवान शिव की वही रोचक कथाएं बता रहे हैं-

शिवजी को इसलिए नहीं चढ़ाते केतकी का फूल
शिवपुराण के अनुसार, एक बार ब्रह्मा व विष्णु में विवाद छिड़ गया कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है? ब्रह्माजी सृष्टि के रचयिता होने के कारण श्रेष्ठ होने का दावा कर रहे थे और भगवान विष्णु पूरी सृष्टि के पालनकर्ता के रूप में स्वयं को श्रेष्ठ कह रहे थे। तभी वहां एक विराट ज्योतिर्मय लिंग प्रकट हुआ। दोनों देवताओं ने सर्वानुमति से यह निश्चय किया गया कि जो इस लिंग के छोर का पहले पता लगाएगा, उसे ही श्रेष्ठ माना जाएगा।
अत: दोनों विपरीत दिशा में शिवलिंग का छोर ढूंढने निकले। छोर न मिलने के कारण विष्णु लौट आए। ब्रह्माजी भी सफल नहीं हुए परंतु उन्होंने आकर विष्णु से कहा कि वे छोर तक पहुंच गए थे। उन्होंने केतकी के फूल को इस बात का साक्षी बताया। ब्रह्माजी के असत्य कहने पर स्वयं भगवान शिव वहां प्रकट हुए और उन्होंने ब्रह्माजी की आलोचना की।
दोनों देवताओं ने महादेव की स्तुति की तब शिवजी बोले कि मैं ही सृष्टि का कारण, उत्पत्तिकर्ता और स्वामी हूं। मैंने ही तुम दोनों को उत्पन्न किया है। शिव ने केतकी पुष्प को झूठा साक्ष्य देने के लिए दंडित करते हुए कहा कि यह फूल मेरी पूजा में उपयोग नहीं किया जा सकेगा। इसीलिए शिव के पूजन में कभी केतकी का फूल नहीं चढ़ाया जाता।
इसलिए शिव ने दिया था विष्णु को सुदर्शन चक्र
भगवान विष्णु को हर चित्र व मूर्ति में सुदर्शन चक्र धारण किए दिखाया जाता है। यह सुदर्शन चक्र भगवान शंकर ने ही जगत कल्याण के लिए विष्णु को दिया था। इस संबंध में शिवपुराण की कोटिरुद्र संहिता में एक कथा है। उसके अनुसार-
एक बार जब दैत्यों के अत्याचार बहुत बढ़ गए तब सभी देवता श्रीहरि विष्णु के पास आए। तब भगवान विष्णु ने कैलाश पर्वत पर जाकर भगवान शिव की विधिपूर्वक आराधना की। वे हजार नामों से शिव की स्तुति करने लगे। वे प्रत्येक नाम पर एक कमल का फूल भगवान शिव को चढ़ाते। तब भगवान शंकर ने विष्णु की परीक्षा लेने के लिए उनके द्वारा लाए एक हजार कमल में से एक कमल का फूल छिपा दिया। शिव की माया के कारण विष्णु को यह पता न चला। एक फूल कम पाकर भगवान विष्णु उसे ढूंढने लगे। परंतु फूल नहीं मिला।
तब विष्णु ने एक फूल की पूर्ति के लिए अपना एक नेत्र निकालकर शिव को अर्पित कर दिया। विष्णु की भक्ति देखकर भगवान शंकर बहुत प्रसन्न हुए और श्रीहरि के समक्ष प्रकट होकर वरदान मांगने के लिए कहा। तब विष्णु ने दैत्यों को समाप्त करने के लिए अजेय शस्त्र का वरदान मांगा। तब भगवान शंकर ने विष्णु को सुदर्शन चक्र प्रदान किया। विष्णु ने उस चक्र से दैत्यों का संहार कर दिया। इस प्रकार देवताओं को दैत्यों से मुक्ति मिली तथा सुदर्शन चक्र उनके स्वरूप के साथ सदैव के लिए जुड़ गया।
ये हैं भगवान शिव के 11 रुद्र अवतार
शिवपुराण के अनुसार, एक बार देवताओं और दानवों में लड़ाई छिड़ गई। इसमें दानव जीत गए और उन्होंने देवताओं को स्वर्ग से बाहर निकाल दिया। सभी देवता बड़े दु:खी मन से अपने पिता कश्यप मुनि के पास गए। उन्होंने पिता को अपने दु:ख का कारण बताया। कश्यप मुनि परम शिवभक्त थे। उन्होंने अपने पुत्रों को आश्वासन दिया और काशी जाकर भगवान शिव की पूजा की। उनकी सच्ची भक्ति देखकर भगवान भोलेनाथ प्रसन्न हुए और दर्शन देकर वर मांगने को कहा।
कश्यप मुनि ने देवताओं की भलाई के लिए उनके यहां पुत्र रूप में आने का वरदान मांगा। शिव भगवान ने कश्यप को वर दिया और वे उनकी पत्नी सुरभि के गर्भ से ग्यारह रूपों में प्रकट हुए। यही ग्यारह रुद्र कहलाए। ये देवताओं के दु:ख को दूर करने के लिए प्रकट हुए थे। इसीलिए इन्होंने देवताओं को पुन: स्वर्ग का राज्य दिलाया। यह ग्यारह रुद्र सदैव देवताओं की रक्षा के लिए स्वर्ग में ही रहते हैं।
इनके नाम इस प्रकार हैं- 
1- कपाली           2- पिंगल           3- भीम                         4- विरुपाक्ष        5- विलोहित       6- शास्ता
7- अजपाद         8- अहिर्बुधन्य     9- शंभु              10- चण्ड           11- भव
शिव के वरदान से द्रोपदी बनीं पांडवों की पत्नी
द्रौपदी महाभारत के सबसे अहम पात्रों में से एक थी। द्रौपदी को स्वयंवर में अर्जुन ने अपने पराक्रम से प्राप्त किया था फिर भी वह पांचों भाइयों (पांडवों) की पत्नी बनी। इसका कारण द्रौपदी के पिछले जन्म में शंकर भगवान द्वारा दिया गया वरदान था। महाभारत के आदि पर्व में श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यास ने इस कथा का वर्णन किया है। कथा के अनुसार-
द्रौपदी पूर्व जन्म में महात्मा ऋषि की कन्या थी। सर्वगुण संपन्न होने पर भी पूर्व जन्मों के कर्मों के फलस्वरूप किसी ने उसे पत्नी के रूप में स्वीकार नहीं किया। इससे दु:खी होकर उसने भगवान शंकर की घोर तपस्या की। भगवान शंकर उसकी तपस्या से प्रसन्न हुए तथा वरदान मांगने को कहा। ऋषि पुत्री ने पांच बार कहा- मैं सर्वगुण युक्त पति चाहती हूं। ऐसा उसने पांच बार कहा।
शंकर भागवान ने कहा- तुझे पांच भरतवंशी पति प्राप्त होंगे। ऋषि कन्या बोली- मैंने तो एक ही पति का कामना की थी। भगवान शंकर ने कहा- तूने पति प्राप्त करने के लिए मुझसे पांच बार प्रार्थना की, इसीलिए अगले जन्म में तुझे पांच ही पति प्राप्त होंगे। भगवान शंकर के इसी वरदान के रूप में द्रौपदी पांडवों की पत्नी बनी।

Saturday, July 15, 2017

महामत्युंजय मंत्र

धर्म ग्रंथों के अनुसार मार्कण्डेय ऋषि अमर हैं। आठ अमर लोगों में मार्कण्डेय ऋषि का भी नाम आता है। इनके पिता मर्कण्डु ऋषि थे। मर्कण्डु ऋषि को जब कोई संतान नहीं हुई तो उन्होंने सपत्नीक भगवान शिव की आराधना की। तपस्या से प्रकट हुए शिव ने उनसे पूछा कि वे गुणहीन दीर्घायु पुत्र चाहते हैं या गुणवान 16 साल का अल्पायु पुत्र। तब मर्कण्डु ऋषि ने दूसरी बात को चुना, यानी गुणी अल्पायु पुत्र।
बड़ा होने पर मार्कण्डेय को जब यह बात पता चली तो वे शिव भक्ति में लीन हो गए। इस दौरान सप्तऋषियों की सहायता से ब्रह्मदेव से उनको महामृत्युंजय मंत्र की दीक्षा मिली। इस मंत्र का प्रभाव यह हुआ कि जब यमराज उनकी मृत्यु के नियत दिन उन्हें लेने आए तो स्वयं भगवान शिव ने यमराज के वार को बेअसर कर दिया और बालक मार्कण्डेय को दीर्घायु होने का वरदान दिया।
मंत्र-
ॐ त्र्यम्बकम् यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्धनम् |
उर्वारुकमिव बन्धनात् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात ||
इस मंत्र को संपुट-युक्त बनाने के लिए इसका उच्चारण इस प्रकार किया जाता है 
ॐ हौं जूं स: ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ 
त्र्यम्बकम् यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्धनम् | 
उर्वारुकमिव बन्धनात् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात || 
ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ
मंत्र के लाभ- रूद्राक्ष माला से महामृत्युंजय मंत्र का जप करना चाहिए। रोजाना सुबह और शाम इस मंत्र का जप करने से सेहत बनी रहती है। किसी को यदि कोई गंभीर असाध्य बीमारी हो जाए तो उसके लिए महामृत्युंजय जप किया या करवाया जाता है। किसी भी तरह की अकास्मिक दुर्घटना का भय होने या घर में किसी भी तरह का दोष होने पर भी महामृत्युंजय मंत्र का जप लाभदायक होता है।
https://religion.bhaskar.com/news/JM-JMJ-SAS-mahamratumjay-mantra-5646106-PHO.html?seq=1

Friday, July 14, 2017

देवी सती के रौद्र रूप से भयभीत हो गए थे भगवान शिव, क्यों हुआ ऐसा?

सावन का पवित्र महीना चल रहा है। ये महीना भगवान शिव को बहुत प्रिय है। भगवान शंकर त्रिदेवों में प्रमुख देवता हैं। वे भगवान विष्णु व ब्रह्मा के भी आराध्य देव हैं। महादेव को किसी का भी भय नहीं है, लेकिन देवी पुराण के एक प्रसंग के अनुसार, एक बार भगवान शिव माता सती के रौद्र रूप से घबराकर भाग गए थे। ये पूरा प्रसंग इस प्रकार है-
पिता के घर जाना चाहती थी सती
देवी पुराण के अनुसार, भगवान शिव का प्रथम विवाह दक्ष प्रजापति की पुत्री सती से हुआ था। एक बार सती के पिता दक्ष प्रजापति ने बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया। उस यज्ञ में दक्ष प्रजापति ने अपनी पुत्री सती और दामाद शिव को निमंत्रित नहीं किया। यज्ञ के बारे में जान कर सती बिना निमंत्रण ही पिता के यज्ञ में जाने की जिद करने लगी।
तब भगवान महादेव ने सती से कहा कि- किसी भी शुभ कार्य में बिना बुलाए जाना और मृत्यु- ये दोनों ही एक समान है। मेरा अपमान करने की इच्छा से ही तुम्हारे पिता ये महायज्ञ कर रहे हैं। यदि ससुराल में अपमान होता है तो वहां जाना मृत्यु से भी बढ़कर होता है। ये बात सुनकर सती बोलीं- महादेव। आप वहां जाएं या नहीं, लेकिन मैं वहां अवश्य जाऊंगी।
देवी सती के ऐसा कहने पर शिवजी ने कहा- मेरे रोकने पर भी तुम मेरी बात नहीं सुन रही हो। दुर्बुद्धि व्यक्ति स्वयं गलत कार्य कर दूसरे पर दोष लगाता है। अब मैंने जान लिया है कि तुम मेरे कहने में नहीं रह गई हो। अत: अपनी रूचि के अनुसार तुम कुछ भी करो, मेरी आज्ञा की प्रतीक्षा क्यों कर रही हो।
सती ने धारण किया भयंकर रूप
जब महादेव ने यह बात कही तो सती क्षणभर के लिए सोचने लगीं कि इन शंकर ने पहले तो मुझे पत्नी रूप में प्राप्त करने के लिए प्रार्थना की थी और अब ये मेरा अपमान कर रहे हैं। इसलिए अब मैं इन्हें अपना प्रभाव दिखाती हूं। यह सोचकर देवी सती ने अपना रौद्र रूप धारण कर लिया।
क्रोध से फड़कते हुए ओठों वाली तथा कालाग्नि के समान नेत्रों वाली उन भगवती सती को देखकर महादेव ने अपने नेत्र बंद कर लिए। भयानक दाढ़ों से युक्त मुख वाली भगवती ने अचानक उस समय अट्टहास किया, जिसे सुनकर महादेव भयभीत हो गए। बड़ी कठिनाई से आंखों को खोलकर उन्होंने भगवती के इस भयानक रूप को देखा।
देवी भगवती के इस भयंकर रूप को देखकर भगवान शिव भय के मारे इधर-उधर भागने लगे। शिव को दौड़ते हुए देखकर देवी सती ने कहा-डरो मत-डरो मत। इस शब्द को सुनकर शिव अत्यधिक डर के मारे वहां एक क्षण भी नहीं रुके और बहुत तेजी से भागने लगे।
ऐसे शांत हुआ सती का क्रोध
इस प्रकार अपने स्वामी को भयभीत देख देवी भगवती अपने दस श्रेष्ठ रूप धारण कर सभी दिशाओं में स्थित हो गईं। महादेव जिस ओर भी भागते उस दिशा में वे भयंकर रूप वाली भगवती को ही देखते थे। तब भगवान शिव ने अपनी आंखें बंद कर ली और वहीं ठहर गए।
जब भगवान शिव ने अपनी आंखें खोली तो उन्होंने अपने सामने भगवती काली को देखा। तब उन्होंने कहा- श्याम वर्ण वाली आप कौन हैं और मेरी प्राणप्रिया सती कहां चली गईं? तब देवी काली बोलीं- क्या अपने सामने स्थित मुझ सती को आप नहीं देख रहे हैं। ये जो अलग-अलग दिशाओं में स्थित हैं ये मेरे ही रूप हैं। इनके नाम काली, तारा, लोकेशी, कमला, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, षोडशी, त्रिपुरसुंदरी, बगलामुखी, धूमावती और मातंगी हैं।
देवी सती की बात सुनकर शिवजी बोले- मैं आपको पूर्णा तथा पराप्रकृति के रूप में जान गया हूं। अत: अज्ञानवश आपको न जानते हुए मैंने जो कुछ कहा है, उसे क्षमा करें। ऐसा कहने पर देवी सती का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने महादेव से कहा कि- यदि मेरे पिता दक्ष के यज्ञ में आपका अपमान हुआ तो मैं उस यज्ञ को पूर्ण नहीं होने दूंगी। ऐसा कहकर देवी सती अपने पिता के यज्ञ में चली गईं।
https://religion.bhaskar.com/news/JM-JKR-DHAJ-why-lord-shiva-was-scared-of-sati-5644622-PHO.html?seq=1&ref=keyreco