Thursday, July 6, 2017

मंदिर से जुड़े ये रहस्य जानेंगे तो रोज़ एक बार जरूर जाना चाहेंगे

मंदिर जाने से मन को शांति मिलती है। इसलिए लोग मंदिर जाते हैं, लेकिन यहां दर्शन करने के पीछे छुपे वैज्ञा‍निक कारण कम ही लोगों को पता हैं। दरअसल, मंदिर में दर्शन के पीछे सबसे बड़ा कारण, सकारात्मक ऊर्जा को प्राप्त करना होता है। इस सकारात्मक ऊर्जा को सिर्फ तभी प्राप्त किया जा सकता है, जब शरीर की पांचों इंद्रियां सक्रिय हों। आइए जानते हैं मंदिर से जुड़े कुछ ऐसे ही रहस्य जिन्हें जानकर आप भी रोज मंदिर जाना चाहेंगे

मंदिर की बनावट पर दिया जाता है ध्यान
मंदिर के लिए हमेशा वो जगह चुनी जाती है जहां सकरात्मक ऊर्जा अधिक हो। एक ऐसा स्थान जहां उत्तरी ओर से सकारात्मक रूप से चुंबकीय और विद्युत तरंगों का प्रवाह हो। अक्सर ऐसे ही स्थान पर बड़े मंदिर का निर्माण करवाया जाता है, ताकि लोगों के शरीर में अधिकतम सकारात्मक ऊर्जा मिल सके।
जरूर बजाया जाता है घंटा
जब भी मंदिर में प्रवेश किया जाता है तो दरवाजे पर घंटा टंगा होता है जिसे बजाना होता है। मुख्य मंदिर (जहां भगवान की मूर्ति होती है) में भी प्रवेश करते समय घंटा या घंटी बजानी होती है, इसके पीछे कारण यह है कि इसे बजाने से निकलने वाली आवाज से सात सेकंड तक गूंज बनी रहती है जो शरीर के सात हीलिंग सेंटर्स को सक्रिय कर देती है।
बाहर उतारी जाती है चप्पल
मंदिर में प्रवेश नंगे पैर ही करना पड़ता है, यह नियम दुनिया के हर हिंदू मंदिर में है। इसके पीछे वैज्ञानिक कारण यह है कि मंदिर की फर्शों का निर्माण पुराने समय से अब तक इस प्रकार किया जाता है कि ये इलेक्ट्रिक और मैग्नैटिक तरंगों का सबसे बड़ा स्रोत होती हैं। जब इन पर नंगे पैर चला जाता है तो अधिकतम ऊर्जा पैरों के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर जाती है।
भगवान की मूर्ति को रखा जाता है इस जगह
मंदिर में भगवान की मूर्ति को गर्भ गृह के बिल्कुल बीच में रखा जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस जगह पर सबसे अधिक ऊर्जा होती है जहां सकारात्मक सोच से खड़े होने पर शरीर में सकारात्मक ऊर्जा पहुंचती है और नकारात्मकता दूर भाग जाती है।
आरती के समय किया जाता है ऐसा
आरती के बाद उसकी थाली को सभी दर्शनार्थियों तक पहुंचाया जाता है। दर्शनार्थी दीपक के ऊपर हाथ घुमाते हैं। उसके बाद हाथों को सिर पर लगाते हैं और आंखों पर स्पर्श करते हैं। ऐसा करने पर छटी इंद्री सक्रीय होती है और हल्की गर्माहट महसूस होती है।जिससे तनाव कम महसूस होता है।
मूर्ति पर चढ़ाए जाते हैं फूल
भगवान की मूर्ति पर फूल चढ़ाना भी एक परंपरा है। ऐसा करने से मंदिर परिसर में अच्छी और भीनी-भीनी सी खुशबू आती है। अगरबत्ती, कपूर और फूलों की खुशबू से सूंघने की शक्ति बढ़ती है और मन प्रसन्न हो जाता है।
परिक्रमा करने का भी है नियम
हर मुख्य मंदिर में दर्शन करने और पूजा करने के बाद परिक्रमा करनी होती है। परिक्रमा ८ से ९ बार करनी होती है। जब मंदिर में परिक्रमा की जाती है तो सारी सकारात्मक ऊर्जा, शरीर में प्रवेश कर जाती है और मन को शांति मिलती है।
परिक्रमा करने का भी है नियम
हर मुख्य मंदिर में दर्शन करने और पूजा करने के बाद परिक्रमा करनी होती है। परिक्रमा ८ से ९ बार करनी होती है। जब मंदिर में परिक्रमा की जाती है तो सारी सकारात्मक ऊर्जा, शरीर में प्रवेश कर जाती है और मन को शांति मिलती है।

Tuesday, July 4, 2017

देवशयनी एकादशी : इस विधि से करें ये व्रत, ये है महत्व व कथा

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहते हैं। धर्म ग्रंथों के अनुसार, इस दिन से भगवान विष्णु चार महीने तक पाताल में शयन करते हैं। ये चार महीने चातुर्मास कहलाते हैं। चातुर्मास को भगवान की भक्ति करने का समय बताया गया है। इस दौरान कोई मांगलिक कार्य भी नहीं किए जाते।
4 महीने पाताल में रहेंगे भगवान विष्णु
धर्म शास्त्रों के अनुसार, भगवान विष्णु ने वामन अवतार में दैत्यराज बलि से तीन पग भूमि दान के रूप में मांगी थी। भगवान ने पहले पग में संपूर्ण पृथ्वी, आकाश और सभी दिशाओं को ढक लिया। अगले पग में सम्पूर्ण स्वर्ग लोक ले लिया। तीसरे पग में बलि ने अपने आप को समर्पित करते हुए सिर पर पग रखने को कहा। इस प्रकार के दान से प्रसन्न होकर भगवान ने बलि को पाताल लोक का राजा बना दिया और कहा वर मांगो।
बलि ने वर मांगते हुए कहा कि भगवान आप मेरे महल में निवास करें। तब भगवान ने बलि की भक्ति को देखते हुए चार मास तक उसके महल में रहने का वरदान दिया। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु देवशयनी एकादशी से देवप्रबोधिनी एकादशी तक पाताल में बलि के महल में निवास करते हैं।
ऐसे करें देवशयनी एकादशी का व्रत
देवशयनी एकादशी की सुबह जल्दी उठें। पहले घर की साफ-सफाई करें, उसके बाद स्नान आदि कर शुद्ध हो जाएं। घर के पूजन स्थल अथवा किसी भी पवित्र स्थान पर भगवान विष्णु की सोने, चांदी, तांबे अथवा पीतल की मूर्ति स्थापित करें। इसके उसका षोडशोपचार (16 सामग्रियों से) पूजा करें। भगवान विष्णु को पीतांबर (पीला कपड़ा) अर्पित करें।
व्रत की कथा सुनें। आरती कर प्रसाद वितरण करें। ब्राह्मणों को भोजन कराएं तथा दक्षिणा देकर विदा करें। अंत में सफेद चादर से ढंके गद्दे-तकिए वाले पलंग पर श्रीविष्णु को शयन कराएं तथा स्वयं धरती पर सोएं। धर्म शास्त्रों के अनुसार, यदि व्रती (व्रत रखने वाला) चातुर्मास नियमों का पूर्ण रूप से पालन करे तो उसे देवशयनी एकादशी व्रत का संपूर्ण फल मिलता है।
देवशयनी एकादशी व्रत की कथा
एक बार देवर्षि नारद ने ब्रह्माजी से देवशयनी एकादशी का महत्व जानना चाहा। तब ब्रह्माजी ने उन्हें बताया कि सतयुग में मांधाता नामक एक चक्रवर्ती राजा थे। उनके राज्य में प्रजा बहुत सुखी थी। एक बार उनके राज्य में भयंकर अकाल पड़ा। इस अकाल से चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई। प्रजा ने राजा के पास जाकर अपनी व्यथा सुनाई। राजा मांधाता यह देखकर बहुत दु:खी हुए। इस समस्या का निदान जानने के उद्देश्य से राजा सेना को लेकर जंगल की ओर चल दिए।
वहां वे एक दिन ब्रह्माजी के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम में पहुंचे। अंगिरा ऋषि ने उनके जंगल में घूमने का कारण पूछा तो राजा ने अपनी समस्या बताई। तब महर्षि अंगिरा ने कहा कि सब युगों से उत्तम यह सतयुग है। इसमें छोटे से पाप का भी बड़ा भयंकर दंड मिलता है। ब्राह्मण के अतिरिक्त किसी अन्य जाति को तप करने का अधिकार नहीं है, जबकि आपके राज्य में एक अन्य जाति का व्यक्ति तप कर रहा है। इसीलिए आपके राज्य में वर्षा नहीं हो रही है। जब तक उसका अंत नहीं होगा, तब तक यह अकाल समाप्त नहीं होगा।
किंतु राजा का हृदय एक निरपराध तपस्वी को मारने को तैयार नहीं हुआ। तब महर्षि अंगिरा ने राजा को आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करने के लिए कहा। राजा के साथ ही सभी नागरिकों ने भी देवशयनी एकादशी का व्रत विधिपूर्वक किया। व्रत के प्रभाव से उनके राज्य में मूसलाधार वर्षा हुई और पूरा राज्य धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया।

Monday, July 3, 2017

नया घर बनवाएं तो न भूले ये 1 चीज़, इससे घर में हमेशा धन-धान्य बना रहता है

ऐसा माना जाता है कि जमीन के नीचे पाताल लोक है और इसके स्वामी शेषनाग हैं। पौराणिक ग्रंथों में शेषनाग के फण पर पृथ्वी टिकी होने का उल्लेख मिलता है।
शेषं चाकल्पयद्देवमनन्तं विश्वरूपिणम्।
यो धारयति भूतानि धरां चेमां सपर्वताम्।।

इन परमदेव ने विश्वरूप अनंत नामक देवस्वरूप शेषनाग को पैदा किया, जो पहाड़ों सहित सारी पृथ्वी को धारण किए है।
उल्लेखनीय है कि हजार फणों वाले शेषनाग सभी नागों के राजा हैं। भगवान की शय्या बनकर सुख पहुंचाने वाले, उनके अनन्य भक्त हैं। बहुत बार भगवान के साथ-साथ अवतार लेकर उनकी लीला में भी साथ होते हैं। श्रीमद्भागवत के 10 वे अध्याय के 29 वें श्लोक में भगवान कृष्ण ने कहा है-
अनन्तश्चास्मि नागानां
यानी मैं नागों में शेषनाग हूं।

नींव पूजन का पूरा कर्मकांड इस मनोवैज्ञानिक विश्वास पर आधारित है कि जैसे शेषनाग अपने फण पर पूरी पृथ्वी को धारण किए हुए हैं, ठीक उसी तरह मेरे इस घर की नींव भी प्रतिष्ठित किए हुए चांदी के नाग के फण पर पूरी मजबूती के साथ स्थापित रहे। इसी भावना के साथ मकान की नींव में एक कलश रखा जाता है उस कलश का पूजन कर उसमे लक्ष्मी का स्वरूप मानकर 1 सिक्का और चांदी के नाग का जोड़ा डाला जाता है। इसके बाद दूध, दही, घी डालकर मंत्रों से आह्वान पर शेषनाग को बुलाया जाता है, ताकि वे घर की रक्षा करें। मान्यता है इस तरह घर की नींव का पूजन करने पर और उसमें कलश और शेषनाग की स्थापना से घर हमेशा सुरक्षित और धन-धान्य से भरा रहता है।
https://religion.bhaskar.com/news/JM-JMJ-SAS-infog-remedies-for-new-house-5616541-PHO.html?seq=1

Saturday, June 24, 2017

बड़ों का करते हैं सम्मान, उन्हें मिलता है जीवन का हर सुख

महाभारत में ऐसी कई बातें बताई गई हैं, जिनका पालन करके जीवन को सुखद बनाया जा सकता है। महाभारत के अनुशासन पर्व में पांच ऐसे लोगों के बारे में बताया गया है, जिनका सम्मान करने से मनुष्य को जीवन का हर सुख मिलता है और स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

इस बात को महाभारत में दिए गए श्लोक से अच्छी तरह समझा जा सकता है-

शुश्रूषते यः पितरं न चासूयेत् कदाचन,
मातरं भ्रातरं वापि गुरुमाचार्यमेव च।
तस्य राजन् फलं विद्धि स्वर्लोके स्थानमर्चितम्,
न च पश्येत नरकं गुरुशुश्रूषयात्मवान्।।

1. माता और पिता
जो मनुष्य हमेशा अपने माता-पिता का सम्मान करता है, उनकी आज्ञा का पालन करता है वह जीवन में निश्चित ही हर सफलता पाता है, जैसे भगवान राम। भगवान राम अपने पिता के वचन की रक्षा करने के लिए 14 साल के लिए वनवास चले गए। उसी तरह मनुष्य को अपने माता-पिता की हर इच्छा का सम्मान करना चाहिए। इससे निश्चित ही उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

2. बड़ा भाई
बड़ा भाई भी पिता जैसा ही माना जाता है। जिस प्रकार पांडवों ने अपने बड़े भाई युधिष्ठिर की हर आज्ञा का पालन किया। कभी उनकी इच्छा के विरुद्ध नहीं गए। उसी तरह मनुष्य को भी अपने बड़े भाई को पिता के समान ही मान कर उसका सम्मान करना चाहिए।

3. गुरु
जिस व्यक्ति से मनुष्य जीवन में कभी भी कोई ज्ञान की बात या कला सीखने को मिल जाए, वह उस मनुष्य के लिए गुरु कहलाता है। एकलव्य ने द्रोणाचार्य को दूर से देखकर ही उनसे धनुष विद्या सीख ली और द्रोणाचार्य को गुरु की तरह सम्मान दिया। द्रोणाचार्य के गुरु दक्षिणा में अंगूठा मांगने पर भी उनमें दोष नहीं देखा और द्रोणाचार्य की मांगी हुई दक्षिणा उन्हें दे दी। उसी प्रकार हमें भी जिससे कुछ भी सीखने को मिल जाए, उसे गुरु की तरह ही सम्मान करना चाहिए।

4. आचार्य
जो मनुष्य को विद्या देता है, वह आचार्य कहलाता है। जो मनुष्य हमेशा अपने आचार्य की आज्ञा का पालन करता है। कभी उसकी दी हुई विद्या पर शंका नहीं करता, वह मनुष्य जीवन में आने वाली हर कठिनाई को आसानी से पार कर जाता है। आचार्य का सम्मान करने वाले को धरती पर ही स्वर्ग के समान सुख मिलता है। इसलिए मनुष्य को हमेशा अपने आचार्य का सम्मान करना ही चाहिए।

Friday, June 23, 2017

कैसे उतारें आरती

आरती किसी भी देवी-देवता या कहें अपने आराध्य की पूजा पद्धति का एक अभिन्न हिस्सा है। बिना आरती के पूजा को संपन्न नहीं माना जाता। मंदिरों में सुबह द्वार खुलने के साथ ही लोग आरती में शामिल होने के लिए पंहुचते हैं। रात के समय भी आरती के बाद ही मंदिरों के पट बंद भी होते हैं। आरती सिर्फ मंदिरों में ही नहीं बल्कि पवित्र नदियों और सरोवर पर भी की जाती है।

जो लोग अज्ञानतावश पूजा की विधियों से अंजान होते हैं वो भी अपने आराध्य की आरती तो उतार ही लेते हैं, लेकिन आरती उतारने की भी अपनी एक खास विधि होती है जिसका अपना महत्व है तो आइए आपको बताते हैं आरती के महत्व के बारे में और जानते हैं कैसे करनी चाहिए आरती। क्या है आरती उतारने की सही विधि....
कैसे उतारें आरती

आरती पूजा का एक महत्वपूर्ण अंग होती है इस शास्त्रानुसार आरक्तिका, आर्रतिका या नीराजन भी कहा जाता है। किसी भी तरह की पूजा हो या फिर कोई यज्ञ-हवन अथवा पंचोपचार-षोडशोपचार पूजा सबमें पूजा के अंत में आरती की जाती है। आमतौर पर आरती पांच बातियों से की जाती है जिस कारण इसे पंचप्रदीप भी कहा जाता है। हालांकि यह जरुरी नहीं है एक, सात या उससे अधिक बत्तियों से भी आरती उतारी जा सकती है।

आरती के लिए जरूरी सामान
आरती करने के लिए चांदी, पीतल या फिर तांबे की थाली का इस्तेमाल किया जाता है। इस थाली में धातु या आटे से बना दीपक रखा जाता है। उसमें घी या तेल डालकर रूई की बत्तियों को बनाकर रखा जाता है। यदि रूई की बत्ती उपलब्ध न हो तो कर्पूर से भी काम चलाया जा सकता है। थाली में थोड़े फूल, अक्षत और मिठाईयां भी रखनी चाहिए। हालांकि बहुत सारे मंदिरों में पुजारी केवल घी का दीपक जलाकर ही आरती करते हैं। आरती सुबह और शाम दोनों समय करनी चाहिए।

आरती का महत्व
आरती में जो पांच बत्तियां जलाई जाती हैं उसके पीछे मान्यता है कि ये पांच बत्तियां ब्रह्मांड में मौजूद पांच तत्वों का प्रतिनिधित्व करती हैं जिनसे मिलकर हमारे शरीर की रचना भी होती है। ये पांच तत्त्व हैं आकाश, पृथ्वी, जल, वायु और अग्नि। यह भी मान्यता है आरती करते समय दिए की लौ आरती करने वाले के चारों और प्रकाश का एक सुरक्षाकवच बनाती है। जो जितनी श्रद्धा के साथ लीन होकर आरती करता है उसका कवच उतना ही मजबूत होता है। आस-पास की नकारात्मक ऊर्जा सकारात्मक ऊर्जा में बदल जाती है।
आरती ईश्वर के दक्षिणावर्त तरीके से वामावर्त की ओर की जाती है, इसे पहले 3 से 5 बार दक्षिणावर्त की दिखा में घुमय जाता है फिर 1 बार वामावर्त की दिशा में घुमाया जाता है। यह दर्शाता है कि भगवान हमारी सारी गतिविधियों का केंद्र है। यह हमे यह याद दिलाता है कि ईश्वर पहले है और सब बाद में। आरती सिर्फ पूजा का अंग नहीं है बल्कि, यह हमारी संस्कृति को आगे बढ़ाने को भी दिखता है जैसे आरती करने के बाद यह आरती, पूजा में शामिल और लोगों को भी दी जाती है। यह दिखा ता है कि ईश्वर हम सब के अंदर है, और हम सब इनके सामने नतमस्तक रहें।

Thursday, June 22, 2017

महर्षि मार्कण्डेय के बताएं हैं 3 काम, जरूर करें

महर्षि मार्कण्डेय प्राचीन भारत के महान ऋषियों में से एक थे। इनका जन्म महर्षि भृगु के वंश में हुआ था। महर्षि मार्कण्डेय भगवान विष्णु और भगवान शिव के परम भक्त थे। इनका वर्णन कई पुराणों और ग्रंथों में मिलता है।
इन्होंने जीवन को सही ढंग से चलाने और पुण्य पाने के लिए कई नीतियां बताई हैं, जिनका पालन करके जीवन में कई लाभ पाए जा सकते हैं। महर्षि मार्कण्डेय ने 3 ऐसे काम बताए हैं, जिन्हें करना सबसे अच्छा माना गया है। इन कामों को करने से मनुष्य किसी भी मुसीबत का सामना बड़ी ही आसानी से कर लेता है और उसे शुभ फल की प्राप्ति होती है।

महर्षि मार्कण्डेय द्वार कहा गया श्लोक-
पुण्यतीर्थाभिषेकं च पवित्राणां च कीर्तनम्।
सद्धिः सम्भाषणं चैव प्रशस्तं कीत्यते बुधैः।।
1. तीर्थों में स्नान
तीर्थ स्थानों पर स्वयं देवताओं का निवास माना जाता है। तीर्थ स्थानों पर जाना, वहां पूजा करना और वहां के कुंड या नदी में स्नान करने से मनुष्य के सभी पापों का नाश हो जाता है और पुण्य की प्राप्ति होती है। कई तीर्थों पर स्नान करने से मनुष्य को मोक्ष भी मिलता है। तीर्थों पर स्नान सभी कामों में से सबसे अच्छा बताया गया है।

2. पवित्र वस्तुओं का नाम लेना
गोमूत्र, गोबर, गोदुग्ध ( गाय का दूध), गोशाला हवन, पूजन, तुलसी, मंदिर, अग्नि, पुराण, ग्रंथ ऐसी कई वस्तुओं को पवित्र माना जाता है। इनमें में खाने योग्य चीजों का सेवन व ग्रंथों को पढ़ना महत्वपूर्ण माना जाता है, लेकिन अगर कोई व्यक्ति ऐसा न कर सके तो केवल उनका नाम लेने से ही पुण्य की प्राप्ति हो जाती है। हर मनुष्य को हिंदू धर्म में पवित्र मानी गई इन चीजों का नाम पवित्र भाव से लेते रहना चाहिए। इससे निश्चित ही शुभ फल मिलता है।

3. सत्पुरुषों के साथ बातें करना
सत्पुरुष यानी विद्वान, ज्ञानी, चरित्रवान और सत्यवादी इंसान। हर मनुष्य को अपने जीवन में सफलता पाने के लिए सही राह की जरुरत होती है। मनुष्य को सही राह विद्वान या ज्ञानी पुरुषों के द्वारा दिखाई जा सकती है। जिस व्यक्ति को सही-गलत, अच्छे-बुरे, धर्म-अधर्म का ज्ञान होता है, हमें उसका आदर करना चाहिए। ऐसे लोगों से बातें करके हम अपने हित की बात जान सकते हैं। मनुष्य को हमेशा ही विद्वान और ज्ञानी लोगों का सम्मान करना चाहिए और उनकी बताई हुई राह पर चलना चाहिए।

Wednesday, June 21, 2017

परेशानियां दूर कर हर इच्छा पूरी करते हैंं, हनुमानजी से जुड़े ये उपाय

हनुमानजी को कलियुग में सबसे जल्दी प्रसन्न होने वाला देवता माना गया है। हनुमान चालीसा की कुछ चौपाईयां ऐसी हैं जिनका जप यदि नियमिल रूप से 108 बार किया जाए तो जीवन से हर तरह की परेशानियां दूर हो सकती हैं साथ ही मनोकामनाएं भी पूरी हो जाती हैं। आइए जानते हैं 5 ऐसी ही चौपाईयों को …
विद्यावान गुनी अति चातुर। रामकाज करिबे को आतुर।।
यदि किसी व्यक्ति को विद्या और धन चाहिए तो इन पंक्तियों के जप से हनुमान जी का आशीर्वाद मिल जाता है। रोजाना 108 बार जप करने से व्यक्ति का पैसों से जुड़ा दुख दूर हो जाता है।
भीम रूप धरि असुर संहारे। रामचंद्रजी के काज संवारे।।
जीवन में ऐसा कई बार होता है कि तमाम कोशिशों के बावजूद कामों में रुकावट आती हैं। यदि आपके साथ भी कुछ ऐसा हो रहा है तो यहां बताई चौपाई का108 बार जप करें, लाभ होगा।
भूत-पिशाच निकट नहीं आवे। महावीर जब नाम सुनावे।।
इस चौपाई का निरंतर जप उस व्यक्ति को करना चाहिए जिसे किसी का डर सताता हो। इस चौपाइ को रोजाना 108 बार बोलने से हर तरह के डर से मुक्ति मिलती है।
नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा।।
यदि कोई व्यक्ति बीमारियों से घिरा रहता है, अनेक इलाज कराने के बाद भी वह ठीक नही हो पा रहा, तो उसे इस चौपाई का जप करना चाहिए। इस चौपाइ का जप निरंतर सुबह-शाम 108 बार करना चाहिए।
अष्ट-सिद्धि नवनिधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता।।
यह चौपाइ व्यक्ति को समस्याओं से लड़ने की शक्ति देती है। यदि किसी को भी जीवन में शक्तियों को पाना हो तो रोज, ब्रह्म मुहूर्त में आधा घंटा इन पंक्तियों का जप करे, लाभ मिलेगा।