Saturday, June 18, 2016

क्यों घट रही हमारे युवकों की नैतिकता है !

१. युवकों की अनुचित सोच
अ. विश्व की सभी वस्तुएं हमारे ही उपभोग के लिए निर्मित हैं और उनका आस्वाद लेना हमारा अधिकार/कर्तव्य है, ऐसा भोगवादी विचार युवा पीढीद्वारा खुलकर प्रस्तुत किया जा रहा है ।
आ. सम्पन्न युवकों को लगता है कि वेगसे वाहन चलाना और किसी को टक्कर मारना, अपनी अपार सम्पत्ति का प्रदर्शन करना है ।
२. युवकोंमें अपराधकी प्रवृत्ति बढनेके कारण
अ. युवा पीढी का – भावना, लालसा, लोभ जैसे दोष स्थायी स्वभाव बन गए हैं । हमारे युवक किसी  भी प्रकार से सुख प्राप्त करने के लिए तथा इसके लिए कितना भी मूल्य चुकाने के लिए तत्पर रहते हैं । ऐसी मानसिकता से युक्त युवा पीढी अपराध की ओर बढ रही है ।
आ. राजनीतिज्ञ लोग जब राजनियमों को अंगूठा दिखाकर भ्रष्टाचार करते हैं, तब यह दृश्य देखकर युवा पीढी को – दृढता, साहस, सिद्धान्तवादिता आदि गुण महत्त्वहीन लगते हैं ।
इ. आज की युवा पीढी समाज में अपना वर्चस्व प्रस्थापित करने के लिए अनुचित मार्गसे सम्पत्ति अर्जित करने के पीछे पडी हुई है ।
ई. खुली अर्थव्यवस्था अपनाने के पश्चात, युवा पीढी अपराध की ओर बढ रही है । जबतक उन्हें शिक्षा का महत्त्व नहीं ज्ञात होगा, तबतक उन्हें पश्चाताप नहीं होगा ।
३. युवकों से होने वाला पश्चिमी देशों का अन्धानुकरण !
अ. दूरचित्रप्रणालों पर प्रदर्शित होनेवाले असभ्य धारावाहि कों के कारण, संस्कारी युवक सकुचाए हैं, तो संस्कार विहीन पीढी बहक गयी है ।
आ. लडके, पश्चिमी देशों का अन्धानुकरण कर, भारतीय संस्कारों की होली कर रहे हैं ।
इ. आज नगरों में पब (मद्यालय), डान्स बार, हुक्कापार्लर खुलने से युवक भोगविलास के लिए घरसे पैसे चुरा रहे हैं ।
ई. आज के युवकों द्वारा पैसे के बलपर किए जाने वाले अनैतिक कृत्यों के कारण उनकी नैतिकता ढल रही है तथा भविष्य अन्धकारमय हो रहा है ।
४. अभिभावकों की अनुचित भूमिका !
अ. वैश्वीकरण का भारतीय संस्कृति पर दुष्परिणाम होना, स्वाभाविक है । ऐसी स्थिति में उन्हें मार्गदर्शन करने वाला कोई नहीं है । यहां तक कि अभिभावक भी अपनी भूमिका नहीं निभाते ।
आ. पूर्वकाल में सायंकाल दीप लगाने के समय घर आने की परम्परा थी । आज स्थिति यह है कि अभिभावक रात्रि में विलम्ब से आनेवाले अपने लडके की प्रशंसा करते नहीं थकते । अभिभावकों का यही दृष्टिकोण लडकों का भविष्य चौपट कर रहा है ।
५. अभिभाव को, भटकी युवा पीढी को दिशा देने के लिए यह कीजिए !
अ. लडकों का भविष्य उज्ज्वल बनाने के लिए अभिभावक उनसे चर्चा अवश्य करें ।
आ. अभिभावक ही यदि लडकों को संस्कारों के प्रभाव में रखेंगे, तो वे अपराध करने से बचेंगे और देश के विकास में हाथ बंटाएंगे ।
https://www.hindujagruti.org/hinduism-for-kids-hindi/703.html

Friday, June 17, 2016

बच्चे परेशान रहते हैं तो ध्यान रखें

असफलता कोई नहीं चाहता। सफलता जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। फिर आजकल तो सफलता के लिए जीवन झोंक दिया जाता है। सफलता की अंधी दौड़ चल रही है। यदि आप गिरे तो कोई न तो आपके लिए रुकेगा, न उठाएगा, बल्कि यह भीड़ पैरों तले रौंदते हुए निकल जाएगी। आपका शव आपके ही लोग नहीं पहचान पाएंगे। मृत्यु का ऐसा वर्णन ठीक नहीं है। देश के कोने-कोने से परीक्षा में असफल होने पर आत्महत्या करने की खबरें आ रही हैं। इसके दो कारण हैं- नासमझी और दबाव। ये दोनों ही आसपास के लोगों की देन हैं। जिनके ऊपर इनके लालन-पालन की जिम्मेदारी है, सावधानी उन्हें रखनी होगी। इस उम्र के पास जितना जोश है, उतनी ही तीव्र निराशा भी है। हम बच्चों को बहुत अधिक हिदायतें न दें। कुछ मां-बाप को बीमारी-सी लग जाती है। हर गतिविधि, निर्णय पर समझाने बैठ जाते हैं। इसकी बजाय अधिक समय दें।
बच्चों को दिया जाने वाला जो समय है, उसका ठीक से अर्थ समझें। इसमें पहला काम यह करें कि उन्हें खूब सुनें। वे आपके सामने पूरी तरह से खुल जाने चाहिए। वे भीतर से खाली हो जाएं। तब उन्हें इस तरह समझाएं कि उसमें सहयोग का भाव ज्यादा हो। हुक्म की शक्ल में ज्ञान न बांटें। इसे मदद के रूप में पेश करें। यदि आपको यह अंदाज हो जाए कि आपका बेटा या बेटी इन दिनों कुछ परेशान हैं, सफलता प्राप्त करने के दबाव में हैं, तो उन्हें अकेला बिल्कुल न छोड़ें। यह अकेलापन अच्छे-अच्छों को मार डालता है। किसी का अकेलापन मिटाने के लिए समय देना पड़ता है, इसलिए बच्चों के मामले में समय को लेकर सावधान हो जाएं। यदि वे मृत्यु का आलिंगन करने के लिए आगे बढ़ रहे हैं, तो केवल आपका प्रेम उन्हें नहीं रोक पाएगा, आपकी सजगता ही उनका जीवन बन सकेगी।
पं. विजयशंकर मेहता
http://religion.bhaskar.com/news/JM-FMT-family-management-tips-about-children-in-home-5340021-NOR.html

Wednesday, June 15, 2016

गुरुकुल धर्मशिक्षण पद्धती

हर एक बालक प्रतीक्षा करता है की कब हमारी परिक्षा हो जाए और कब हमारा अभ्यास ख़त्म हो रहा है | हर एक बालक अभ्यास करते करते वही पाठ्य पुस्तक में वही परिच्छेद पढ पढ कर ऊब जाता है | परिक्षा ख़त्म होते ही कही बाहर जाना और आनंद लेना चाहता है | परिक्षा काल में घर घर में ऐसे ही संवाद पालकों से और विद्यार्थीयों से सुनने को मिलते है | यही आजकलका अभ्यास क्रम और विज्ञान का अपयश है | अभ्यास करने से बालक आनंदित होते है ऐसे दृश्य तो देखने के लिये मुस्किल हो गया है |

इसके विरुद्ध बात है अध्यात्म की, जहा प्राचीन गुरुकुल का दृश्य तो स्मरण करो ! स्मरण करते ही मन आनंदविभोर हो जाता है | क्योंकी गुरुकुल में हिन्दू धर्मं सम्बन्धी आचार और विचारों का, हिन्दू धर्मं में जो शास्त्र प्रमाण के अनुसार उसको अत्याधिक महत्त्व प्रदान करके ईश्‍वर, ऋषी गण के कृपा से अध्ययन और अध्यापन किया जाता है | इसके कारण ही सभी परिसर चैतन्य से भर जाता है | लेकिन आज यह सभी शिक्षा व्यवस्था समय के साथ नष्ट हो गयी है, यह बड़ी दुर्भाग्य की बात है |

अध्यात्म के विषय में जो ग्रन्थ, संत चरित्र, देव देवताओं की पौराणिक कथा या संत वचनो के माध्यम से किया गया मार्गदर्शन उपदेश पुनरावृत्त करते है तो प्रतिदिन आनंद ही आनंद मिलता है | कभी भी उसका ऊब नहीं आता | ये ग्रन्थ चैतन्य के स्त्रोत है | इसके कारण हमारी बुद्धि शुद्ध हो जाने से आनंद मिलता है | इसलिए संत चरित्र का वाचन पठन हमें नित्य नूतन अर्थ की प्रचिती देता है | ऐसा क्यों होता है, क्योंकि इस ग्रंथो का वाचन पठन करने से स्थूल देह, मनोदेह, कारण देह और महाकारण देह की अंतर शुद्धी होती है और उस देह पर उसका असर होने पर मन और बुद्धी को संत चरित्र से मिलनेवाला भावार्थ निराला होता है |  इसलिए दिन प्रतीदिन निराला ही आनंद प्रतीत होता है |

विज्ञान चैतन्य रहित होता है | इसलिये वह तो केवल परीक्षार्थी होने के कारण परीक्षार्थीयो के मन पर एक तरह का तान यानी टेंशन आता है | लेकिन अध्यात्म नित्य नूतन और चैतन्यमय होने के कारण अध्यात्म हर दिन भक्त और भाविकों को नित्य नूतन आनंद प्रदान करता है | वाचन में जितना आप सखोल जाओगे उतना आनंद द्विगुणित होने का समाधान मिलता है | उसके पठन की अरुची होती है, यह संत चरित्र कब पढके खत्म होगा ऐसे किसीको कहते हुए नहीं सुना है | संत चरित्र का प्रभाव भी ऐसा ही होता है, क्योंकी संत चरित्रों में चैतन्य होता है, उनके शब्द अनुभूती देते है |
आप सभी को आवाहन करती हूँ की पुन: एकबार, हमें अपनी प्राचीन गुरुकुल शिक्षण व्यवस्था भारत में लाने के लिए कटिबद्ध होकर, आनेवाली पीढी के लिए चैतन्य और ईश्‍वरी कृपा का आनंद अनुभव करने के लिए सिद्ध हो जाए |
 – सौ. अंजली गाडगीळ, रामनाथी, गोवा. (चैत्र पौर्णिमा, कलियुग वर्ष ५११३)
https://www.hindujagruti.org/hinduism-for-kids-hindi/6641.html

Tuesday, June 14, 2016

अभिभावको, अर्थहीन नाम रखने से होनेवाले परिणाम जान लें !


वर्तमान में अनेक अभिभावक अपने बच्चों के प्रयल, रूमीन, लविला, आशिता ऐसी अर्थहीन नाम रखते हैं । कुछ अभिभावक बच्चों के नाम विकी, रीटा, डॉली इत्यादि, ऐसे विलायती नाम भी रखते हैं ।

अ. अर्थहीन नाम रखनेसे बच्चोंको आध्यात्मिक स्तरपर उसका लाभ नहीं होता है ।
आ. विलायती नाम रखना एकप्रकारसे विदेशी संस्कृतिका दास्यत्व स्वीकारने समान है । देश स्वतंत्र होकर इतने वर्ष हो गए, तब भी हम आजतक दास्यत्वमें रहेंगे क्या ? ऐसे नाम रखने से अनजानेमें ही अपनी संस्कृतिको भूलाते जाते हैं !

१.अध्यात्मशास्त्रके अनुसार नाम रखने से होने वाले लाभ
अ.आध्यात्मिक नाम का बच्चों पर संस्कार होकर बच्चों की वृत्ती नामके अर्थ अनुसार बनने में सहायता होना : जब-जब बच्चे अपना नाम सुनते हैं अथवा उच्चारते हैं, उस समय नामका बच्चों पर संस्कार होता जाता है । इसलिए बच्चों की वृत्ती अनजाने में ही नामके अर्थके अनुरूप बनने में सहायक होती है, बच्चोंका नाम ‘समर्पण’ हो, तो उसके मनमें समर्पण की (त्यागकी) भावना निर्माण होती है । मान लें यदि किसी लडकी का नाम ‘अर्चना’ हो, तो उसके मन में अर्चना (भगवान की उपासना) करने के विचार आएंगे ।

आ.अध्यात्म के नियमके अनुसार नाम से संबंधित भाव अथवा स्पंदन बच्चो में निर्मित होने में सहायक बनते हैं : अध्यात्म में एक नियम ऐसा है – ‘शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध एवं उनसे संबंधित शक्ति एकत्रित होती है ।’ मान लो किसी लडकी का नाम ‘आनंदी’ हो तो उपरोक्त नियम के अनुसार उस नाम से जोडे गए आनंद के स्पंदनों का उसे लाभ होकर उसकी वृत्ती सदैव आनंदमें रहनेमें सहायता होगी ।

२.धर्मशास्त्र के अनुसार लडके-लडकियों के नाम कितने अक्षरके हों ?
अ. बच्चोंके नाम सम अक्षर संख्या में, अर्थात २-४-६ अक्षर में हों ।
आ. बच्चियोंके नाम विषम अक्षर संख्या में, अर्थात ३-५-७ अक्षरों में हों ।

३. कुछ आध्यात्मिक नामों के उदाहरण
अ. लडके: गुरुदास, देवीदास, रामदास, समर्पण, प्रेमानंद, नित्यानंद, सदानंद, विनय एवं आनंद ।
आ.लडकियां : अर्चना, आरती, प्रार्थना, साधना, नम्रता, नमिता, विनया, ऋजुता, सुविद्या, आनंदी, स्वानंदी एवं मोक्षदा ।
https://www.hindujagruti.org/hinduism-for-kids-hindi/76.html

Monday, June 13, 2016

२ से ५ वर्ष तक के बच्चों को कौन–कौन से संस्कार सिखाएं ?


बालपन पर जिस प्रकार के संस्कार किए जाते है, उसी के अनुसार आगे के काल में बच्चों का वैसा ही स्वभाव हो जाता है । बाल आयु में होनेवाले संस्कारों के कारण ही बच्चोंका व्यक्तित्व निर्भर करता है । अपने बच्चोंपर क्या संस्कार करें, यह प्रश्न सर्वसामन्य जनों के मन में उत्पन्न हो सकता है । उसके लिए बच्चोंको कौनसी बातों का अभ्यास बालपन से ही करवाना चाहिए । इसके संदर्भ में निम्नलिखत जानकारी दे रहे हैं।
इस आयु के बच्चों को निम्न बातों का अभ्यास करवा कर उनमें अच्छे संस्कार भी करें ।
१. भोजन के पूर्व हाथ-पाव एवं मुहको स्वच्छ करवाएं ।
२. उनके स्वयं के हाथ से ही भोजन करना सिखाएं ।
३. भोजन के अथवा कुछ भी खानेके उपरांत कुल्ला करना एवं दात स्वच्छ  करना सिखाएं ।
४. मल त्याग करने के उपरांत उनसे स्वयं गुदद्वार का भाग एवं हाथ-पैर पानी से स्वच्छ करना सिखाएं ।
५. स्वतंत्रत रूप से अलग बिछानेपर सुलाएं तथा आवश्यकतानुसार रात्रि में अल्प प्रकाश के दिया का  (बल्बका) उपयोग करें ।
६. खासी अथवा छींक आने पर नाक-मुह पर हाथ रुमाल रखना सिखाएं ।
७. ‘धन्यवाद’, ‘नमस्कार’ ऐसे शब्दों का उपयोग कर लोगों का स्वागत करना सिखाएं ।
८. खेल समाप्त होने पर अपने खिलोनों को पेटिका में (खाने में)  व्यवस्थित रखना सिखाएं ।
९. शूरवीरों की कथाएं सुनाएं ।
१०. सुभाषित, श्लोक, सूक्त, कंठस्थ कर उसका उपयोग मंगल अवसरों पर करवाएं ।
११. रात्रि शयन से पूर्व एवं सुबह उठने के उपरांत ईश्वर का स्मरण करना सिखाएं ।
१२. प्रतिदिनी बडे जनों को झुककर नमस्कार करना सिखाएं ।
https://www.hindujagruti.org/hinduism-for-kids-hindi/571.html