Wednesday, July 26, 2017

कर्नाटक के एक शहर सिरसी में शलमाला नाम की नदी बहती है। यह नदी अपने आप में खास है क्योंकि इस नदी में एक साथ हजारों शिवलिंग बने हुए हैं। ये सभी शिवलिंग नदी की चट्टानों पर बने हुए हैं। यहां की चट्टानों में शिवलिंगो के साथ-साथ नंदी, सांप आदी भगवान शिव के प्रियजनों की भी आकृतियां भी बनी हुई हैं। हजारों शिवलिंग एक साथ होने की वजह से इस स्थान का नाम सहस्त्रलिंग पड़ा।
राजा सदाशिवाराय ने करवाया था इनका निर्माण
मान्यताओं के अनुसार, 16वीं सदी में सदाशिवाराय नाम के एक राजा थे। वे भगवान शिव के बड़े भक्त थे। शिव भक्ति में डूबे रहने की वजह से वे भगवान शिव की अद्भुत रचना का निर्माण करवाना चाहते थे। इसलिए राजा सदाशिवाराय ने शलमाला नदी के बीच में भगवान शिव और उनके प्रियजनों की हजारों आकृतियां बनवा दीं। नदी के बीच में स्थित होने की वजह से सभी शिवलिंगों का अभिषेक और कोई नहीं बल्कि खुद शलमाला नदी के द्वारा किया जाता है।
शिवरात्रि व श्रावण के सोमवार को उमड़ता है भक्तों का सेलाब
वैसे तो इस अद्भुत नजारे को देखने के लिए यहां पर रोज ही अनेक भक्तों का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन शिवरात्रि व श्रावण के सोमवार पर यहां भक्त विशेष रूप आते हैं। यहां पर आकर भक्त एक साथ हजारों शिवलिंगों के दर्शन और अभिषेक का लाभ उठाते हैं।

Tuesday, July 25, 2017

ठाकुर जी की पूजा के समय ध्यान रखें ये नियम, नहीं होगी घर में कभी कोई कमी

भगवान विष्णु ने वैसे तो कई अवतार लिए हैं, लेकिन इनमें से सबसे अधिक लोकप्रिय अवतार है श्री कृष्ण। माना जाता है कि ठाकुरजी की सेवा यदि मन लगाकर की जाए तो घर में कभी धन-धान्य व सुख समृद्धि की कमी नहीं होती आइए जानते हैं ठाकुरजी की पूजा के लिए कौन सी चीजें जरूरी मानी गई हैं। काैन से हैं वो खास नियम जिन्हें उनकी पूजा के दौरान कभी नहीं भूलना चाहिए।

आचमन
आचमन, यानि पूजा से पूर्व हाथों को जल धोने की क्रिया, में उपयोग किए जाने वाले जल को आचमनीय कहा जाता है। यह शुद्ध जल और सुगंधित फूलों का मिश्रण होता है।

आसन
कृष्ण पूजा में सबसे जरूरी होता है आसन, जिस पर भगवान कृष्ण की स्थापना की जाती है। इसका रंग तेज और चमकीला, जैसे लाल, पीला, नारंगी, हो तो बेहतर रहेगा।

पाघ
जिस बर्तन में भगवान कृष्ण के पांव धोए जाते हैं उसे पाघ कहा जाता है। पूजा करने से पहले पाघ में स्वच्छ जल और फूलों की पंखुड़ियां डालें और उससे भगवान कृष्ण के चरणों को धोएं।
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पंचामृत
दूध, दही, घी, शहद और चीनी के मिश्रण से पंचामृत बनाकर उसे किसी शुद्ध बर्तन में भरें और फिर उस पंचामृत से भगवान कृष्ण को भोग लगाएं। याद रहे कृष्ण बिना तुलसी के भोग ग्रहण नहीं करते हैं।

पंचोपचार
पूजा में उपयोग होने वाली दूर्वा घास, कुमकुम, चावल, अबीर, सुगंधित फूल और शुद्ध जल को पंचोपचार या अनुलेपन नाम दिया गया है। श्रीकृष्ण पूजन में इन सभी का होना आवश्यक होता है।

भोग
अगर घर में श्रीकृष्ण की पूजा रखवाई गई है तो पूजा के दौरान श्रीकृष्ण को जो भोग लगाया जाता है उसमें ताजे फल, मिठाइयां, लड्डू, मिश्री, खीर, तुलसी के पत्ते और फल शामिल होते हैं।

सुगंधित धूप व दीप
सुगंधित धूप भगवान कृष्ण को बहुत प्रिय होती है, उनकी पूजा में धूप अवश्य जलाएं।चांदी, तांबे, मिट्टी या फिर अन्य किसी धातु से बने दीए में गाय का शुद्ध देसी घी डालकर श्रीकृष्ण की मूर्ति के सामने प्रज्वलित करना चाहिए।

Saturday, July 22, 2017

भगवान शिव के इस अवतार के कारण हुई थी लक्ष्मण की मृत्यु

धर्म ग्रंथों में भगवान शिव के अनेक अवतार बताए गए हैं, उन्हीं में से एक अवतार हैं महर्षि दुर्वासा का। रामायण व महाभारत में भी महर्षि दुर्वासा से जुड़े प्रसंग मिलते हैं। महर्षि दुर्वासा अपन क्रोध के कारण प्रसिद्ध थे। आज हम आपको भगवान शिव के इसी अवतार के बारे में बता रहे हैं।

इस कारण त्यागे थे लक्ष्मण ने प्राण
वाल्मीकि रामायण के अनुसार, जब श्रीराम अयोध्या के राजा थे, तब एक दिन काल तपस्वी के रूप में अयोध्या आया। काल ने श्रीराम से अकेले में बात करने की इच्छा प्रकट की और कहा कि- यदि कोई हमें बात करता हुआ देख ले तो वह आपके द्वारा मारा जाए। श्रीराम ने काल को ये वचन दे दिया और लक्ष्मण को पहरा देने के लिए दरवाजे पर खड़ा कर दिया ताकि कोई अंदर न आ सके।
जब काल और श्रीराम बात कर रहे थे, तभी महर्षि दुर्वासा वहां आ गए। वे श्रीराम से मिलना चाहते थे। लक्ष्मण ने उनसे कहा कि- आपको जो भी कार्य है, मुझसे कहिए, मैं आपकी सेवा करूंगा। यह बात सुनकर महर्षि दुर्वासा क्रोधित हो गए और उन्होंने कहा- अगर इसी समय तुमने जाकर श्रीराम को मेरे आने के बारे में नहीं बताया तो तो मैं तुम्हारे पूरे राज्य को श्राप दे दूंगा।
लक्ष्मण ने सोचा कि- अकेले मेरी ही मृत्यु हो, यह अच्छा है किंतु प्रजा का नाश नहीं होना चाहिए। यह सोचकर लक्ष्मण ने श्रीराम को जाकर दुर्वासा मुनि के आने की सूचना दे दी। महर्षि दुर्वासा की इच्छा पूरी करने के बाद श्रीराम को अपने वचन का ध्यान आया। तब लक्ष्मण ने कहा कि- आप निश्चिंत होकर मेरा वध कर दीजिए, जिससे आपकी प्रतिज्ञा भंग न हो।
जब श्रीराम ने ये बात महर्षि वशिष्ठ को बताई तो उन्होंने कहा कि- आप लक्ष्मण का त्याग कर दीजिए। साधु पुरुष का त्याग व वध एक ही समान है। श्रीराम ने ऐसा ही किया। श्रीराम द्वारा त्यागे जाने से दुखी होकर लक्ष्मण सीधे सरयू नदी के तट पर पहुंचे और योग क्रिया द्वारा अपना शरीर त्याग दिया।

इंद्र को दिया श्राप
एक बार देवराज इंद्र ऐरावत हाथी पर सवार होकर जा रहे थे। महर्षि दुर्वासा ने जब उन्हें देखा तो आशीर्वाद स्वरूप पारिजात पुष्पों की माला उन्हें दे दी। अभिमान के कारण इन्द्र ने वह माला अपने हाथी के मस्तक पर रख दी। जब दुर्वासा ने देखा की इन्द्र ने मेरे द्वारा दी गई माला का अपमान किया है तो उन्होंने इन्द्र सहित संपूर्ण स्वर्ग को श्रीहीन होने का शाप दे दिया। इस श्राप के कारण स्वर्ग की धन-संपत्ति, ऐश्वर्य, लक्ष्मी आदि सभी कुछ नष्ट हो गया। बाद में जब देवताओं व दानवों ने मिलकर समुद्र मंथन किया, तब स्वर्ग का ऐश्वर्य पुनः लौट आया।

कुंती को दिया था वरदान
कुन्ती यदुवंशी राजा शूरसेन की पुत्री व श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव की बहन थीं। बचपन में इनका नाम पृथा था। कुंती को राजा शूरसेन ने अपनी बुआ के संतानहीन पुत्र कुंतीभोज को गोद दे दिया था। इसी के चलते पृथा का नाम कुंती हो गया। एक बार महर्षि दुर्वासा राजा कुंतीभोज के महल में आए। कुंतीभोज ने दुर्वासा ऋषि की सेवा की जिम्मेदारी कुंती को सौंप दी। कुंती ने मन लगाकार महर्षि दुर्वासा की सेवा की। प्रसन्न होकर महर्षि दुर्वासा ने कुंती को एक मंत्र दिया और वरदान दिया कि- तुम जिस देवता का आवाहन करोगी, उसी से तुम्हें संतान की प्राप्ति होगी। महर्षि दुर्वासा के इसी वरदान के कारण पांडवों व कर्ण की जन्म हुआ था।

जब पांडवों के अतिथि बने दुर्वासा मुनि
एक बार दुर्वासा मुनि अपने दस हज़ार शिष्यों के साथ दुर्योधन के यहां पहुंचे। दुर्योधन ने उनकी बहुत सेवा की और ये वरदान मांगा कि वे अपने शिष्यों सहित वनवासी युधिष्ठिर का आतिथ्य ग्रहण करें। वे उनके पास तब जाएं जब द्रौपदी भोजन कर चुकी हो। दुर्योधन जानता था कि द्रौपदी के भोजन करने के बाद बटलोई में कुछ भी शेष नहीं होगा और दुर्वासा पांडवों को श्राप दे देंगे।
दुर्वासा दुर्योधन के बताए समय पर पांडवों के पास पहुंचे तथा उन्हें रसोई बनाने का आदेश देकर स्नान करने चले गए। धर्म संकट में पड़कर द्रौपदी ने श्रीकृष्ण को याद किया। श्रीकृष्ण तुंरत वहां आ गए और उन्होंने बटलोई में लगा हुआ जरा सा साग खा लिया और कहा- इस साग से संपूर्ण विश्व के आत्मा, यज्ञभोक्ता सर्वेश्वर भगवान श्रीहरि तृप्त तथा संतुष्ट हों। उनके ऐसा करते ही दुर्वासा को अपने शिष्यों सहित तृप्ति के डकार आने लगे। वे लोग यह सोचकर कि पांडवगण अपनी बनाई रसोई को व्यर्थ जाता देख रुष्ट होंगे, वहां से चले गए।

Friday, July 21, 2017

महादेव क्यों रहते हैं श्मशान में? ये हैं शिवजी से जुड़ी रोचक बातें

भगवान शिव जितने रहस्यमयी हैं, उनकी वेश-भूषा व उनसे जुड़े तथ्य भी उतने ही विचित्र है। शिव श्मशान में निवास करते हैं, गले में नाग धारण करते हैं, भांग व धतूरा ग्रहण करते हैं। आदि न जाने कितने रोचक तथ्य इनके साथ जुड़े हैं। आज हम आपको भगवान शिव से जुड़ी ऐसी ही रोचक बातें व इनमें छिपे लाइफ मैनेजमेंट के सूत्रों के बारे में बता रहे हैं, जो इस प्रकार हैं-

1. भगवान शिव को क्यों कहते श्मशान का निवासी?
भगवान शिव को वैसे तो परिवार का देवता कहा जाता है, लेकिन फिर भी श्मशान में निवास करते हैं। भगवान शिव के सांसारिक होते हुए भी श्मशान में निवास करने के पीछे लाइफ मैनेजमेंट का एक गूढ़ सूत्र छिपा है। संसार मोह-माया का प्रतीक है जबकि श्मशान वैराग्य का। भगवान शिव कहते हैं कि संसार में रहते हुए अपने कर्तव्य पूरे करो, लेकिन मोह-माया से दूर रहो। क्योंकि ये संसार तो नश्वर है। एक न एक दिन ये सबकुछ नष्ट होने वाला है। इसलिए संसार में रहते हुए भी किसी से मोह मत रखो और अपने कर्तव्य पूरे करते हुए वैरागी की तरह आचरण करो।

2. क्यों है भूत-प्रेत शिव के गण?
शिव को संहार का देवता कहा गया है। अर्थात जब मनुष्य अपनी सभी मर्यादाओं को तोड़ने लगता है तब शिव उसका संहार कर देते हैं। जिन्हें अपने पाप कर्मों का फल भोगना बचा रहता है वे ही प्रेतयोनि को प्राप्त होते हैं। चूंकि शिव संहार के देवता हैं। इसलिए इनको दंड भी वे ही देते हैं। इसलिए शिव को भूत-प्रेतों का देवता भी कहा जाता है। दरअसल यह जो भूत-प्रेत है वह कुछ और नहीं बल्कि सूक्ष्म शरीर का प्रतीक है। भगवान शिव का यह संदेश है कि हर तरह के जीव जिससे सब घृणा करते हैं या भय करते हैं वे भी शिव के समीप पहुंच सकते हैं, केवल शर्त है कि वे अपना सर्वस्व शिव को समर्पित कर दें।

3. भगवान शिव गले में क्यों धारण करते हैं नाग?
भगवान शिव एकमात्र ऐसे देवता हैं जो गले में नाग धारण करते हैं। देखा जाए तो नाग बहुत ही खतरनाक प्राणी है, लेकिन वह बिना कारण किसी को नहीं काटता। नाग पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण जीव है। जाने-अंजाने में ये मनुष्यों की सहायता ही करता है। कुछ लोग डर कर या अपने निजी स्वार्थ के लिए नागों को मार देते हैं। लाइफ मैनेजमेंट के दृष्टिकोण से देखा जाए तो भगवान शिव नाग को गले में धारण कर ये संदेश देते हैं कि जीवन चक्र में हर प्राणी का अपना विशेष योगदान है। इसलिए बिना वजह किसी प्राणी की हत्या न करें।

4. भगवान शिव के हाथ में त्रिशूल क्यों?
त्रिशूल भगवान शिव का प्रमुख अस्त्र है। यदि त्रिशूल का प्रतीक चित्र देखें तो उसमें तीन नुकीले सिरे दिखते हैं। यूं तो यह अस्त्र संहार का प्रतीक है पर वास्तव में यह बहुत ही गूढ़ बात बताता है। संसार में तीन तरह की प्रवृत्तियां होती हैं- सत, रज और तम। सत मतलब सात्विक, रज मतलब सांसारिक और तम मतलब तामसी अर्थात निशाचरी प्रवृति। हर मनुष्य में ये तीनों प्रवृत्तियां पाई जाती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि इनकी मात्रा में अंतर होता है। त्रिशूल के तीन नुकीले सिरे इन तीनों प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। त्रिशूल के माध्यम से भगवान शिव यह संदेश देते हैं कि इन गुणों पर हमारा पूर्ण नियंत्रण हो। यह त्रिशूल तभी उठाया जाए जब कोई मुश्किल आए। तभी इन तीन गुणों का आवश्यकतानुसार उपयोग हो।

5. भगवान शिव ने क्यों पीया था जहर?
देवताओं और दानवों द्वारा किए गए समुद्र मंथन से निकला विष भगवान शंकर ने अपने कंठ में धारण किया था। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकंठ के नाम से प्रसिद्ध हुए। समुद्र मंथन का अर्थ है अपने मन को मथना, विचारों का मंथन करना। मन में असंख्य विचार और भावनाएं होती हैं, उन्हें मथ कर निकालना और अच्छे विचारों को अपनाना। हम जब अपने मन को मथेंगे तो सबसे पहले बुरे विचार ही निकलेंगे। यही विष हैं, विष बुराइयों का प्रतीक है। शिव ने उसे अपने कंठ में धारण किया। उसे अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। शिव का विष पीना हमें यह संदेश देता है कि हमें बुराइयों को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए।

6. क्यों है भगवान शंकर का वाहन बैल?
भगवान शंकर का वाहन नंदी यानी बैल है। बैल बहुत ही मेहनती जीव है। वह शक्तिशाली होने के बावजूद शांत एवं भोला होता है। वैसे ही भगवान शिव भी परमयोगी एवं शक्तिशाली होते हुए भी परम शांत एवं इतने भोले हैं कि उनका एक नाम भोलेनाथ भी जगत में प्रसिद्ध है। भगवान शंकर ने जिस तरह कामदेव को भस्म कर उस पर विजय प्राप्त की थी, उसी तरह उनका वाहन भी कामी नही होता। उसका काम पर पूरा नियंत्रण होता है। साथ ही नंदी पुरुषार्थ का भी प्रतीक माना गया है। कड़ी मेहनत करने के बाद भी बैल कभी थकता नहीं है। वह लगातार अपने कर्म करते रहता है। इसका अर्थ है कि हमें भी सदैव अपना कर्म करते रहना चाहिए। कर्म करते रहने के कारण जिस तरह नंदी शिव को प्रिय है, उसी प्रकार हम भी भगवान शंकर की कृपा पा सकते हैं।

7. क्यों है भगवान शिव के मस्तक पर चंद्रमा?
भगवान शिव का एक नाम भालचंद्र भी प्रसिद्ध है। भालचंद्र का अर्थ है मस्तक पर चंद्रमा धारण करने वाला। चंद्रमा का स्वभाव शीतल होता है। चंद्रमा की किरणें भी शीतलता प्रदान करती हैं। लाइफ मैनेजमेंट के दृष्टिकोण से देखा जाए तो भगवान शिव कहते हैं कि जीवन में कितनी भी बड़ी समस्या क्यों न आ जाए, दिमाग हमेशा शांत ही रखना चाहिए। यदि दिमाग शांत रहेगा तो बड़ी से बड़ी समस्या का हल भी निकल आएगा। ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को मन का कारक ग्रह माना गया है। मन की प्रवृत्ति बहुत चंचल होती है। भगवान शिव का चंद्रमा को धारण करने का अर्थ है कि मन को सदैव अपने काबू में रखना चाहिए। मन भटकेगा तो लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो पाएगी। जिसने मन पर नियंत्रण कर लिया, वह अपने जीवन में कठिन से कठिन लक्ष्य भी आसानी से पा लेता है।

8. क्यों हैं भगवान शिव की तीन आंखें?
धर्म ग्रंथों के अनुसार, सभी देवताओं की दो आंखें हैं, लेकिन एकमात्र शिव ही ऐसे देवता हैं जिनकी तीन आंखें हैं। तीन आंखों वाला होने के कारण इन्हें त्रिनेत्रधारी भी कहते हैं। लाइफ मैनेजमेंट की दृष्टि से देखा जाए तो शिव का तीसरा नेत्र प्रतीकात्मक है। आंखों का काम होता है रास्ता दिखाना और रास्ते में आने वाली मुसीबतों से सावधान करना। जीवन में कई बार ऐसे संकट भी आ जाते हैं, जिन्हें हम समझ नहीं पाते। ऐसे समय में विवेक और धैर्य ही एक सच्चे मार्गदर्शक के रूप में हमें सही-गलत की पहचान कराते हैं। यह विवेक अत:प्रेरणा के रूप में हमारे अंदर ही रहता है। बस जरूरत है उसे जगाने की।

9. शिव अपने शरीर पर भस्म क्यों लगाते हैं?
हमारे धर्म शास्त्रों में जहां सभी देवी-देवताओं को वस्त्र-आभूषणों से सुसज्जित बताया गया है, वहीं भगवान शंकर को सिर्फ मृग चर्म (हिरण की खाल) लपेटे और भस्म लगाए बताया गया है। भस्म (राख) शिव का प्रमुख वस्त्र भी है, क्योंकि शिव का पूरा शरीर ही भस्म से ढंका रहता है। शिव का भस्म रमाने के पीछे कुछ वैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक कारण भी हैं।
भस्म की एक विशेषता होती है कि यह शरीर के रोम छिद्रों को बंद कर देती है। इसका मुख्य गुण है कि इसको शरीर पर लगाने से गर्मी में गर्मी और सर्दी में सर्दी नहीं लगती। भस्म त्वचा संबंधी रोगों में भी दवा का काम करती है। भस्मी धारण करने वाले शिव यह संदेश भी देते हैं कि परिस्थितियों के अनुसार अपने आपको ढालना ही मनुष्य का सबसे बड़ा गुण है।

10. भगवान शिव को क्यों चढ़ाते हैं भांग-धतूरा?
भगवान शिव को भांग-धतूरा मुख्य रूप से चढ़ाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि भगवान को भांग-धतूरा चढ़ाने से वे प्रसन्न होते हैं। भांग व धतूरा नशीले पदार्थ हैं। आमजन इनका सेवन नशे के लिए करते हैं। लाइफ मैनेजमेंट के अनुसार, भगवान शिव को भांग-धतूरा चढ़ाने का अर्थ है अपनी बुराइयों को भगवान को समर्पित करना। यानी अगर आप किसी प्रकार का नशा करते हैं तो इसे भगवान को अर्पित करे दें और भविष्य में कभी भी नशीले पदार्थों का सेवन न करने का संकल्प लें। ऐसा करने से भगवान की कृपा आप पर बनी रहेगी और जीवन सुखमय होगा।

11. भगवान शिव को क्यों चढ़ाते हैं बिल्व पत्र?
शिवपुराण आदि ग्रंथों में भगवान शिव को बिल्व पत्र चढ़ाने का विशेष महत्व बताया गया है। 3 पत्तों वाला बिल्व पत्र ही शिव पूजन में उपयुक्त माना गया है। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि बिल्वपत्र के तीनों पत्ते कहीं से कटे-फटे न हो।
लाइफ मैनेजमेंट के दृष्टिकोण से देखा जाए तो बिल्व पत्र के ये तीन पत्ते चार पुरुषार्थों में से तीन का प्रतीक हैं- धर्म, अर्थ व काम। जब आप ये तीनों निस्वार्थ भाव से भगवान शिव को समर्पित कर देते हैं तो चौथा पुरुषार्थ यानी मोक्ष अपने आप ही प्राप्त हो जाता है।

12. कैलाश पर्वत क्यों है भगवान शिव को प्रिय?
शिवपुराण के अनुसार, भगवान शिव कैलाश पर्वत पर निवास करते हैं। पर्वतों पर आम लोग नहीं आते-जाते। सिद्ध पुरुष ही वहां तक पहुंच पाते हैं। भगवान शिव भी कैलाश पर्वत पर योग में लीन रहते हैं। लाइफ मैनेजमेंट की दृष्टि से देखा जाए तो पर्वत प्रतीक है एकांत व ऊंचाई का। यदि आप किसी प्रकार की सिद्धि पाना चाहते हैं तो इसके लिए आपको एकांत स्थान पर ही साधना करनी चाहिए। ऐसे स्थान पर साधना करने से आपका मन भटकेगा नहीं और साधना की उच्च अवस्था तक पहुंच जाएगा।