Saturday, June 10, 2017

भारत के 4 ऐसे ही अनोखे मंदिर

सनातन धर्म में ऐसे कई राक्षसों और असुरों का वर्णन मिलता है, जिन्होंने मनुष्यों, ऋषि-मुनियों यहां तक की देवताओं के लिए भी कई बार परेशानियों का कारण बने। ऐसे में देवी-देवताओं ने उन असुरों का वध करके सुख-शांति और धर्म की स्थापना की।
देवी-देवताओं के मंदिर तो पूरी दुनिया में पाए जाते हैं, लेकिन बहुत ही कम लोग जानते होंगे की भारत में कुछ जगहें ऐसी भी हैं, जहां देवताओं के नहीं बल्कि असुरों के मंदिर बने हुए हैं और उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। आज हम आपके ऐसे ही कुछ मंदिरों के बारे में बताने जा रहे हैं-
1. दुर्योधन मंदिर (नेटवार, उत्तराखंड)
उत्तराखंड की नेटवार नामक जगह से लगभग 12 किमी की दूरी पर महाभारत के दुर्योधन का एक मंदिर बना हुआ है। इस मंदिर में दुर्योधन को देवता की तरह पूजा जाता है और यहां दुर्योधन की पूजा करने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। इस मंदिर से कुछ दूरी पर एक और मंदिर बना हुआ है। वह मंदिर दुर्योधन के प्रिय मित्र कर्ण का है।
2. पुतना का मंदिर (गोकुल, उत्तरप्रदेश)
उत्तरप्रदेश के प्रसिद्ध नगर गोकुल में भगवान कृष्ण को दूध पिलाने के बहाने मारने का प्रयास करने वाली पूतना का भी मंदिर है। यहां पूतना की लेटी हुई मूर्ति है और उसकी छाती पर चढ़कर उसका दूध पीते भगवान कृष्ण भी हैं। यहां मान्यता है कि पूतना ने श्रीकृष्ण को मारने के उद्देश्य से ही सही लेकिन एक मां का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को अपना दूध पिलाया था, इसलिए यहां पूतना को एक मां के रूप में पूजा जाता है।
3. अहिरावण मंदिर (झांसी, उत्तरप्रदेश)
झांसी के पचकुइंया में भगवान हनुमान का एक मंदिर हैं, जहां हनुमान जी के साथ अहिरावण की भी पूजा की जाती है। अहिरावण रावण के भाई था और रामायम के युद्ध के दौरान उसने भगवान राम और लक्ष्मण का अपहरण कर लिया था। लगभग 300 साल पुराने इस मंदिर में हनुमान जी की विशाल मूर्ति के साथ साथ अहिरावण और उसके भाई महिरावण की भी प्रतिमा की पूजा की जाती है।
4. दशानन मंदिर (कानपुर, उत्तरप्रदेश)
उत्तरप्रदेश के कानपुर शहर के शिवाला इलाके में दशानन मंदिर है, जहां रावण की पूजा होती है। यहां रावण को शक्ति का प्रतीक और महान पंडित मानने वाले श्रध्दालु उसकी पूजा करते हैं और मन्नतें मांगते हैं। मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण वर्ष 1890 में हुआ था।
ये मंदिर साल में केवल एक बार दशहरे के दिन खुलता है। दशहरे पर मंदिर के कपाट खुलते हैं और दशानन की मूर्ति को नहला धुला कर उसका श्रृंगार किया जाता है। दोपहर को दशानन की आरती और पूजा अर्चना की जाती है और शाम को मंदिर के कपाट सालभर के लिए फिर से बंद कर दिए जाते हैं।

Friday, June 9, 2017

जो रोज करते हैं श्रीगणेश से जुड़ा ये 1 आसान काम, उन्हें मिलता है मनचाहा वरदान

श्रीगणेश अंक भगवान गणेश से जुड़ा एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें भगवान गणेश के जीवन की सभी घटनाओं और उनसे जुड़े उपायों का विवरण है। श्रीगणेश अंक में भगवान गणेश के 12 नामों का वर्णन किया गया हैं, जिनको लेने से मनुष्य के सभी दुखों का नाश हो जाता है और उसकी सभी इच्छा पूरी होती हैं।
श्लोक-
प्रथमं वक्रतुण्ड च एकदन्तं द्वितीयकम्, तृतीयं कृष्णपिड्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम्।।
लम्बोदरं पंचमं च षष्ठं विकटमेव च, सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्ण तथाष्टमम्।।
नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम्, एकादशं गणपतिं द्वादर्श तु गजाननम्।।
द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः, न च विध्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं परम्।।
अर्थात-
पहला नाम है वक्रतुण्ड, दूसरा एकदन्त, तीसरा कृष्णपिड्गाक्ष, चौथा गजवक्त्र, पांचवां लम्बोदर, छठा विकट, सातवां विघ्नराजेन्द्र, आठवां धूमवर्ण, नौवां भालचन्द्र, दसवां विनायक, ग्यारहवां गणपति और बारहवां नाम गजाजन है। जो मनुष्य प्रतिदिन भगवान गणेश के इन बारह नामों का जप करता है, उसके सभी विघ्न (परेशानियां) खत्म हो जाती हैं।
श्रीगणेश अंक के अनुसार, रोज श्रीगणेश की पूजा-अर्चना करने के कौन-कौन से लाभ आसानी से मिल सकते हैं-
श्लोक-
विद्यार्थी लभते विद्यां, धनार्थी लभते धनम्।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान्, मोक्षार्थी लभते गतिम्।।
1. विद्या की प्राप्ति-
भगवान गणेश को बुद्धि का देवता माना जाता है। अच्छी बुद्धि और विद्या के लिए श्रीगणेश की पूजा-अर्चना की जाती है। श्रीगणेश-अंक के अनुसार, जिस भी मनुष्य को अच्छी विद्या पाने की इच्छा हो, उसे भगवान गणेश के इन 12 नामों का पाठ करना चाहिए। नियमित रूप से इनका जप करने से भगवान गणेश की कृपा हमेशा बनी रहती है और मनुष्य की हर मनोकामना पूरी होती है।
2. धन की प्राप्ति-
भगवान गणेश को सुख और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। जिस भी मनुष्य को धन-संपत्ति पाने की इच्छा हो, उसे पूरी श्रद्धा के साथ भगवान गणेश के इन बारह नामों का पाठ करना चाहिए। ऐसा करने से घर से दरिद्रता कम होती है और धन-धान्य में वृद्धि होती है।
3. संतान की प्राप्ति-
भगवान गणेश के इन बारह नामों को चमत्कारी माना जाता है। इनके जप से मनुष्य की हर मनोकामना जरूर ही पूरी होती है। संतान चाहने वाले दंपत्ति को रोज सुबह और शाम इनका पाठ करना चाहिए। ऐसा करने से उनकी संतान पाने की इच्छा पूरी होती है।
4. मोक्ष की प्राप्ति-
भगवान गणेश प्रथम पूज्य माने जाते है। किसी भी काम की शुरुवात में सबसे पहले उनका पूजन किया जाता है। भगवान गणेश की आराधना करने से मनुष्य को अपने पापों से मुक्ति मिलती हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। भगवान गणेश के इन बारह नामों का पाठ करने से मनुष्य को धरती पर ही स्वर्ग के समान सुख मिलते है।

Thursday, June 8, 2017

देवताओं को छत्र क्यों चढ़ाया जाता है?

देवताओं को छत्र क्यों चढ़ाया जाता है?
देवताओं के श्रृंगार, अलंकरण या महिमा मंडन के लिए जो चीजें उपयोग में लाई जाती हैं। उनमें छत्र प्रमुख है। यह राज सत्ता और अधिकार का भी प्रतीक है। प्राचीन समय में राजा के पीछे छत्र लगाने का विधान था। जो एक तरह की छाया, सम्मान और सत्ता का सूचक है। राजपद सूचक उपकरणों में भी छत्र प्रधान हैं, जो राज्याभिषेक के समय से ही राजा के ऊपर रहता था। इसलिए राजा को छत्रपति की पदवी दी जाती थी। देवताओं के ऊपर प्राय: आभा मंडल के रूप में छत्र का अंकन हुआ है।
उदाहरण के लिए भगवान विष्णु को चित्रों में जब क्षीरसागर में शयन करते दर्शाया जाता है तो उनके सिर पर सहस्त्र मुख के शेष नाग छत्र की भांति छाए रहते हैं।इसी तरह देवी लक्ष्मी के चित्रों व प्रतिमाओं में अपनी सूंडों से जल वर्षा करते दो हाथियों का अंकन होता है, जो छत्र का ही एक रूप माना गया है। ध्यान रहे देवताओं के चित्र व प्रतिमाओं के पीछे जो एक गोलाकार बनाया जाता है, वह भी छत्र का ही एक रूप है। यह ठीक वैसा ही है जैसा किसी पर विशेष रूप से प्रकाश डाला जाए, अर्थात फोकस किया जाए। ऐसा इसलिए कि देवता परंपरागत धार्मिक मन्यताओं के अनुसार विशेष शक्तियों से विभूषित माने गए हैं। इस आभा मंडल या छत्र के माध्यम से इनकी इन्हीं विशेष शक्तियों को प्रतीकात्मक रूप से प्रदर्शित किया जाता है। राजा के संदर्भ में भी इसका यही अर्थ है।
भगवान विष्णु के सिर पर शेषनाग क्यों है?
नागराज अनंत को ही शेष भी कहा गया है। जो भगवान विष्णु के प्रिय और स्वयं भगवत स्वरूप माने गए हैं। प्रलयकाल में नई सृष्टि से पूर्व विश्व का जो शेष या मूल अव्यक्त रह जाता है। हिंदू धर्मकोश के अनुसार वे उसी के प्रतीक माने गए हैं। भविष्य पुराण में इनका ध्यान एक हजार फन वाले सर्प के रूप में किया गया है। ये जीव तत्व के अधिष्ठाता हैं और ज्ञान व बल नाम के गुणों की इनमें प्रधानता होती है। इनका आवास पाताल लोक के मूल में माना गया है। प्रलयकाल में इन्हीं के मुखों से संवर्तक अग्नि प्रकट होकर पूरे संसार को भस्म करती है। ये भगवान विष्णु के पलंग के रूप में क्षीर सागर में रहते हैं और अपने हजार मुखों से भगवान का गुणानुवाद करते हैं।
भक्तों के सहायक और जीव को भगवान की शरण में ले जाने वाले भी शेष ही हैं, क्योंकि इनके बल, पराक्रम और प्रभाव को गंधर्व, अप्सरा, सिद्ध, किन्नर, नाग आदि भी नही जान पाते, इसलिए इन्हें अनंत भी कहा गया है। ये पंचविष ज्योति सिद्धांत के प्रवर्तक माने गए हैं। भगवान के निवास शैया, आसन, पादुका, वस्त्र, पाद पीठ, तकिया और छत्र के रूप में शेष यानी अंगीभूत होने के कारण् इन्हें शेष कहा गया है। लक्ष्मण और बलराम इन्हीं के अवतार हैं जो राम व कृष्ण लीला में भगवान के परम सहायक बने।
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विष्णुजी के हाथ में सुदर्शन चक्र क्यों रहता है?
हर देवता के अपने आयुध यानी हथियार है। स्वभाव से देवता भले लोगों को कष्ट देने वाले बुरे लोगों में लड़ाई करते हैं और इनका संहार करते हैं। हथियारों के दो प्रकार हैं अस्त्र और शस्त्र। अस्त्र वह जिसे फेंककर दूसरस्थ शत्रु पर प्रहार किया जाए। शस्त्र वह जिसका उपयोग निकट शत्रु पर प्रहार करने में किया जाए। विष्णु के हाथों में दो हथियार होते हैं गदा जो शस्त्र है और चक्र जो अस्त्र है यानी यदि शत्रु दूरी पर है तो उसे मारने के लिए अस्त्र की आवश्यकता होगी।
भगवान शिव अपने पास त्रिशूल और धनुष बाण दोनों रखते हैं। बाण अस्त्र हैं व त्रिशूल शस्त्र। रामजी के पास भी धनुष बाण के अलावा तलवार होती है। यह भी माना जाता है कि सुदर्शन चक्र श्रीकृष्ण के पास था।
यह गोफन की तरह एक हथियार था, जो श्रीकृष्ण को भेंट में मिला था। इसका उपयोग उन्होंने केवल एक बार शिशुपाल वध के लिए किया। श्रीकृष्ण विष्णु के अवतार माने जाते हैं। इसलिए कालांतर में इस चक्र को विष्णु का आयुध भी मान लिया गया।

Wednesday, June 7, 2017

खाना खाते समय दिशाओं का ध्यान रखेंगे तो मिलेगी ज्यादा एनर्जी

खाना खाते समय यदि कुछ बातों का ध्यान रखा जाए तो स्वास्थ्य लाभ के साथ ही देवी-देवताओं की कृपा भी प्राप्त की जा सकती है। यहां जानिए पुरानी मान्यताओं की कुछ ऐसी बातें जो भोजन करते समय ध्यान रखना चाहिए...
खाना खाते समय दिशाओं का ध्यान रखें
पूर्व और उत्तर दिशा की ओर मुंह करके भोजन करना चाहिए। इस उपाय से हमारे शरीर को भोजन से अधिक ऊर्जा प्राप्त होती है।
दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके भोजन करना अशुभ माना गया है।
पश्चिम दिशा की ओर मुंह करके भोजन करने से रोगों की वृद्धि होती है। इसीलिए दक्षिण और पश्चिम दिशा की ओर मुंह करके खाना नहीं खाना चाहिए।
इसस्थिति में भोजन नहीं करना चाहिए
कभी भी बिस्तर पर बैठकर भोजन नहीं करना चाहिए।
खाने की थाली को हाथ में लेकर भोजन नहीं करना चाहिए।
भोजन खड़े होकर नहीं, बल्कि बैठकर ही करना चाहिए।
थाली को किसी बाजोट या लकड़ी की पाटे पर रखकर भोजन करना चाहिए।
खाने के बर्तन साफ होने चाहिए। टूटे-फूटे बर्तन में भोजन नहीं करना चाहिए।
खानाबनाने वाले व्यक्ति को ध्यान रखनी चाहिए ये बातें
व्यक्ति को स्नान करके और पूरी तरह से पवित्र होकर ही खाना बनाना चाहिए।
खाना बनाते समय मन शांत रखना चाहिए। साथ ही, इस दौरान किसी की बुराई भी ना करें।
शुद्ध मन से भोजन बनाएंगे तो खाना स्वादिष्ट बनेगा और अन्न की कमी भी नहीं होगी।
भोजन बनाना शुरू करने से पहले इष्टदेव का ध्यान करना चाहिए। किसी देवी-देवता के मंत्र का जप भी किया जा सकता है।
खानेसे पहले ये उपाय भी करें
भोजन करने से पहले अन्न देवता, अन्नपूर्णा माता का स्मरण करना चाहिए।
देवी-देवताओं को भोजन के लिए धन्यवाद देते हुए खाना खाएं। साथ ही, भगवान से ये प्रार्थना भी करें कि सभी भूखों को भोजन प्राप्त हो जाए।
कभी भी परोसे हुए खाने की बुराई नहीं करना चाहिए। इससे अन्न का अपमान होता है।

Tuesday, June 6, 2017

सनातन धर्म में कोई भी शुभ कार्य करने से पहले यज्ञ करवाया जाता है। मत्स्य पुराण में यज्ञ के संबंध में कहा गया है कि जिस काम में देवता, हवनीय द्रव्य, वेदमंत्र, ऋत्विक और दक्षिणा इन पांचों का संयोग हो, उसे यज्ञ कहा जाता है। यज्ञ के जरिए शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शांति, आत्मा शुद्धि, आत्मबल वृद्धि, आध्यात्मिक उन्नति और स्वास्थ्य की रक्षा होती है। 
हवन के दौरान जब आहुति दी जाती है तो एक शब्द का बार-बार उच्चारण किया जाता है वो है स्वाहा, लेकिन क्या आपने सोचा है इस शब्द का अर्थ क्या होता है और इसे क्यो बोला जाता है। दरअसल स्वाहा का अर्थ होता है सही तरीके से पहुंचाना। हवन के दौरान स्वाहा बोलने से देवताओं को अग्नि के जरिए भोग लगाया जाता है। कोई भी यज्ञ तक तक सफल नहीं माना जा सकता है जब तक कि भोग का ग्रहण देवता न कर लें, पर देवता ऐसा भोग को तभी स्वीकार करते हैं जबकि अग्नि के द्वारा स्वाहा के माध्यम से अपर्ण किया जाए।
दरअसल, कहानियों के अनुसार स्वाहा अग्निदेव की पत्नी हैं। ऐसे में स्वाहा का उच्चारण कर निर्धारित हवन सामग्री का भोग अग्नि के माध्यम से देवताओं को पहुंचाते हैं। आहुति देते समय अपने सीधे हाथ के मध्यमा और अनामिक उंगलियों पर सामग्री लेना चाहिए और अंगूठे का सहारा लेकर मृगी मुद्रा से उसे अग्नि में ही छोड़ा जाना चाहिए। आहुति हमेशा झुक कर डालाना चाहिए।

Friday, June 2, 2017

पूजा में घंटी बजाना क्यों अनिवार्य

देवी-देवताओं की पूजा में घंटी बजाने की परंपरा पुराने समय से चली आ रही है। हम जब भी घर में पूजा करते हैं तो उस समय में भी घंटी अनिवार्य रूप से बजानी चाहिए। घंटी बजाने के धार्मिक महत्व भी हैं और वैज्ञानिक महत्व भी हैं।
यहां जानिए घर में घंटी बजाने से कौन-कौन से लाभ मिलते हैं...
दूर होती है नकारात्मक ऊर्जा
घंटी से जो आवाज निकलती है, वह वातावरण को शुद्ध और पवित्र बनाती है। वातावरण में कई सूक्ष्म कीटाणु रहते हैं, जो हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं। घर में लगातार एक लय में घंटी बजने से जो ध्वनि निकलती है, वह इन सूक्ष्म कीटाणुओं को नष्ट कर देती है। साथ ही, इस आवाज से वातावरण की नकारात्मक ऊर्जा भी बेअसर हो जाती है। इसी वजह सभी मंदिरों में घंटी लगाई जाती है और घंटियों की आवाज से ही मंदिर में सकारात्मकता महसूस होती है।
घंटी के बिना पूर्ण नहीं होती आरती
देवी-देवताओं की आरती, घंटी के नाद के बिना पूर्ण नहीं हो सकती है। भगवान की आरती में कई प्रकार के वाद्य यंत्र बजाए जाते हैं, इनमें घंटी भी महत्वपूर्ण है। घंटी की ध्वनि मन, मस्तिष्क और शरीर को ऊर्जा प्रकार प्रदान करती है। इस ऊर्जा से बुद्धि तेज होती है। मंदिरों में जब भी आरती होती है तो घंटी की आवाज से वहां उपस्थित लोग खुद को तनाव मुक्त महसूस करते हैं।
घंटी बजाने से कई जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं
धार्मिक मान्यता है कि मंदिर में घंटी बजाने से पुराने समय में किए पाप नष्ट हो जाते हैं। नियमित रूप से आरती करने और लगातार घंटी बजाने से मंदिर की देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी सकारात्मकता बढ़ाती हैं। ऐसी प्रतिमाओं की पूजा अधिक प्रभावशाली और शीघ्र फल प्रदान करने वाली होती है।