Tuesday, May 24, 2016

क्यों घर में मकड़ी के जाले अशुभ माने जाते हैं?


आपने अक्सर लोगों को कहते सुना होगा कि घर में मकड़ी के जाले नहीं रहना चाहिए। ये बहुत अशुभ होते है। ये कोई अंधविश्वास नहीं है। इसके पीछे कारण यह है कि मकड़ी के जालों की संरचना कुछ ऐसी होती है। उसमें नकारात्मक उर्जा एकत्रित हो जाती है। इसलिए घर के जिस भी कोने में मकड़ी के जाले होते है। वो कोना नकारात्मक उर्जा से भर जाता है( जिससे घर में कलह, मारियां, व अन्य कई समस्याएं हमारे जीवन को घेरने लगती है।
साथ ही, मकड़ी के एक जाले असंख्य सुक्ष्मजीव रहते हैं। जो कि हमारे स्वास्थय को नुकसान पंहुचाते हैं। इसलिए कहा जाता हैं कि घर में मकड़ी के जाले होते हैं तो घर की सुख-समृद्धि का नाश होने लगता है, क्योंकि नकारात्मक उर्जाओं के कारण घर का माहौल इतना अशांत हो जाता है कि व्यक्ति चाहकर भी अपने काम को मन लगाकर नहीं कर पाता है। इसलिए मकड़ी के जालों को अशुभ माना जाता है।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-JMJ-SAS-why-are-considered-inauspicious-house-spider-webs-5329818-NOR.html

Monday, May 23, 2016

वाल्मीकि रामायण: ये 3 काम बनते हैं बर्बादी के कारण

वाल्मीकि रामायण भगवान राम के जीवन पर आधारित एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें ज्ञान और धर्म की कई बातें बताई गई हैं। वाल्मीकि रामायण में 3 ऐसे काम बताए गए हैं, जो किसी भी मनुष्य का जीवन बर्बाद कर सकते हैं। इसलिए भूलकर भी इन 3 कामों को नहीं करना चाहिए। जानिए कौन से हैं वो 3 काम-
श्लोक-
परस्वानां च हरणं परदाराभिमर्शनम्।
सुह्मदयामतिशंका च त्रयो दोषाः क्षयावहाः।।
1. दूसरों का धन चुराना
जो मनुष्य दूसरों की वस्तु हड़पने या चुराने का प्रयास करता है, वह महापापी माना जाता है। किसी और की वस्तु को छल से पाने या चुराने से मनुष्य के जीवन के सभी पुण्यकर्म नष्ट हो जाते हैं। चोरी की हुई वस्तु से कभी भी लाभ नहीं मिलता, बल्कि उसकी वजह से नुकसान का ही सामना करना पड़ता है। चोरी करने वाले मनुष्य या ऐसे काम में साथ देने वाले मनुष्य को तामिस्र नामक नरक में दुःख भोगना पड़ते हैं। यह काम किसी के भी जीवन को बड़ी ही आसानी से बर्बाद कर सकता है, इसलिए इससे बचना चाहिए।
2. अपने हितैषियों के साथ धोखा करना
हमारे कई दोस्त या परिवारजन होते हैं, जो हम पर सबसे ज्यादा विश्वास करते हैं। ऐसे लोगो के साथ धोखा करना या उनका भरोसा तोड़ना भी किसी पाप से कम नहीं है। अपने हितैषियों का विश्वास तोड़कर हम कुछ समय के लिए लाभ जरूर पा सकते हैं, लेकिन आगे चलकर इसका फल भोगना ही पड़ता है। ऐसा करने पर भगवान भी हम से रूठ जाते हैं और इस काम के फलस्वरूप हमें कई परेशानियों और दुखों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए किसी भी लालच में आकर हमारे अपनों का विश्वार नहीं तोड़ना चाहिए।
3. पराई स्त्री के साथ संबंध बनाना
कई लोग कामातुर होकर पराई स्त्रियों पर बुरी नजर डालते हैं। ऐसी परिस्थिति में सही-गलत का निर्णय नहीं कर पाते और पराई स्त्री के साथ संबंध बना लेते हैं। धर्म ग्रंथों में इसे पाप कहा गया है। ग्रंथों के अनुसार, इस पाप का प्रायश्चित किसी भी तरह संभव नहीं होता। जो भी मनुष्य ऐसा काम करता है, उसे इसके बुरे परिणाम आज नहीं तो कल झेलना ही पड़ते हैं। पराई स्त्री के साथ समागम करने वाले मनुष्य के को जयंती नामक नरक में उनके पापों की सजा मिलती है। इसलिए हर किसी को इस पाप कर्म से दूर रहना चाहिए।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-JKR-DGRA-valmiki-ramayana-never-do-these-3-things-in-life-in-hindi-5329597-PHO.html

Saturday, May 21, 2016

गायत्री मंत्र के जप से क्रोध होता है शांत


मंत्र जप एक ऐसा उपाय है, जिससे सभी समस्याएं दूर हो सकती हैं। शास्त्रों में मंत्रों को बहुत शक्तिशाली और चमत्कारी बताया गया है। सबसे ज्यादा प्रभावी मंत्रों में से एक मंत्र है गायत्री मंत्र। इसके जप से बहुत जल्दी शुभ फल प्राप्त हो सकते हैं।
गायत्री मंत्र जप के लिए तीन समय बताए गए हैं, जप के समय को संध्याकाल भी कहा जाता है।
गायत्री मंत्र के जप का पहला समय है सुबह का। सूर्योदय से थोड़ी देर पहले मंत्र जप शुरू किया जाना चाहिए। जप सूर्योदय के बाद तक करना चाहिए।
मंत्र जप के लिए दूसरा समय है दोपहर का। दोपहर में भी इस मंत्र का जप किया जाता है।
इसके बाद तीसरा समय है शाम को सूर्यास्त से कुछ देर पहले। सूर्यास्त से पहले मंत्र जप शुरू करके सूर्यास्त के कुछ देर बाद तक जप करना चाहिए।
यदि संध्याकाल के अतिरिक्त गायत्री मंत्र का जप करना हो तो मौन रहकर या मानसिक रूप से करना चाहिए। गायत्री मंत्र का जाप बोलकर नहीं करना चाहिए। मंत्र जप तेज आवाज में नहीं करना चाहिए।

गायत्री मंत्र-ऊँ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो न: प्रचोदयात्।।

गायत्री मंत्र का अर्थ: सृष्टिकर्ता प्रकाशमान परामात्मा के तेज का हम ध्यान करते है, परमात्मा का वह तेज हमारी बुद्धि को सद्मार्ग की ओर चलने के लिए प्रेरित करें।
इस मंत्र के जप के लिए रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करना श्रेष्ठ होता है। जप से पहले स्नान आदि कर्मों से खुद को पवित्र कर लेना चाहिए। मंत्र जप की संख्या कम से कम 108 होनी चाहिए। घर के मंदिर में या किसी पवित्र स्थान पर गायत्री माता का ध्यान करते हुए मंत्र का जप करना चाहिए।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-JYO-RAN-importance-and-benefits-of-gayatri-mantra-in-hindi-5328069-PHO.html

Friday, May 20, 2016

क्या महत्व है तीर्थों का

आश्रम में गुरु जी के पास कुछ शिष्यगण बैठे हुए कुछ धार्मिक स्थलों की चर्चा कर रहे थे। एक शिष्य बोला गुरु जी अब की बार गर्मियों में गंगोत्री, यमनोत्री की यात्रा करवा दीजिए। आपके साथ यात्रा का कुछ अलग ही आनंद है। दर्शन के साथ-साथ हर चीज का महत्व भी जीवंत हो जाएगा। दूसरा शिष्य कहने लगा।
गुरु जी आप हमेशा कहते हैं कि ईश्वर व उसकी शक्ति कण-कण में व्याप्त है, वो घट-घट में है, आपमें व मुझमें भी ईश्वर है। गंगा तो यहां भी बह रही है, फिर क्यों गंगोत्री, यमनोत्री जाएं और 15 दिन खराब करें। कहावत भी है मन चंगा तो कठोती में गंगा। गुरु जी एक दम शांत हो गए फिर कुछ देर के बाद बोले -जमीन में पानी तो सब जगह है ना, फिर हमें जब प्यास लगे, जमीन से पानी मिल ही जाएगा तो हमें कुए, तालाब, बावड़ी बनाने की क्या जरूरत है।
कुछ लोग एक साथ बोले ये कैसे संभव है। जब हमें प्यास लगेगी तो कब तो कुंआ खुदेगा और कब पानी निकलेगा और कब उसे पीकर प्यास बुझाएंगे।गुरु जी बोले बस यही तुम्हारे प्रश्न, तुम्हारी जिज्ञासा का उत्तर है। पृथ्वी में हर जगह पानी होने के बावजूद जहां वह प्रकट है या कर लिया गया है, आप वहीं तो प्यास बुझा पाते हैं। इसी तरह ईश्वर जो सूक्ष्म शक्ति है, घट-घट में व्याप्त है, ये तीर्थ स्थल, कुंए और जलाशयों की भांति, उस सूक्ष्म शक्ति के प्रकट स्थल हैं।
जहां किसी महान आत्मा के तप से, श्रम से, उसकी त्रिकालदर्शी सोच से वो सूक्ष्म-शक्ति इन स्थानों पर प्रकट हुई और प्रकृति के विराट आंचल में समा गई। जहां आज भी जब हमें अपनी आत्मशक्ति की जरूरत होती है तो इन स्थलों पर जाकर अपनी विलीन आत्म-शक्ति को प्राप्त करते हैं। दूसरे शब्दों में हमारी इच्छा शक्ति को यहां आत्मशक्ति मिलती है और हमें प्यास लगने पर कुंआ खोदने की जरूरत नहीं होती।

Thursday, May 19, 2016

कैसे तैर गए राम सेतु निर्माण में पत्थर?


माता सीता की खोज के लिए जब प्रभु राम की सेना लंका की ओर चली, तो रास्ते में विशाल समुद्र बड़ी बाधा बनकर सामने आया। सेना सहित समुद्र को पार करना लगभग असंभव था। तीन दिन के इंतजार के बाद जब कोई हल न निकला तो श्रीराम ने गुस्से से अपना धनुष-बाण उठाया और मानव रूप बनाकर प्रकट हुए समुद्र ने उन्हें पुल निर्माण का सुझाव दिया। इसमें बढ़ी बाधा यह थी कि समुद्र की तेज लहरों पर पत्थर कैसे टिकेंगे। समुद्र ने ही इसका समाधान किया।

उसने प्रभु श्रीराम को बताया कि उनकी सेना में नल और नील नाम के दो वानर हैं, जिन्हें बचपन में एक ऋषि से आशीर्वाद मिला था कि उनसे स्पर्श किए पत्थर पानी में तैर जाएंगे। श्रीराम की आज्ञा से नल व नील ने सभी पत्थरों को अपने हाथों से स्पर्श कर वानरों को देते गए, क्योंकि उन्हें पत्थर तैराने का अशीर्वाद मिला हुआ था। इसलिए सारे पत्थर तैर गए और पुल निर्माण आसान हो गया। यह प्रतीकात्मक है। दरअसल नल और नील पुल निर्माण के विशेषज्ञ इंजीनियर थे। समुद्र ने केवल सेना में उनकी उपस्थिति का परिचय भर कराया। बस फिर क्या था श्रीराम की कृपा से प्रसिद्ध राम सेतु बन गया।

Wednesday, May 18, 2016

क्यों करते हैं घर में सत्यनारायण भगवान की कथा ?

भारत में हिंदू धर्मावलंबियो के बीच सबसे प्रतिष्ठित व्रत कथा के रूप में भगवान विष्णु के सत्य स्वरूप की सत्यनारायण व्रत कथा है। भगवान की पूजा कई रूपों में की जाती है। उनमें से उनका सत्यनारायण स्वरूप इस कथा में बताया गया है। विद्वानों की माने तो स्कंद पुराण के रेवाखंड में इस कथा का उल्लेख मिलता है। इसके मूल पाठ में पाठांतर से करीब 170 श्लोक संस्कृत भाषा मे उपलब्ध है। जो पांच अध्यायों में बंटे हुए हैं। इस कथा के दो प्रमुख विषय हैं। जिनमें एक है संकल्प को भूलना और दूसरा है प्रसाद का अपमान।
व्रत कथा के अलग-अलग अध्यायों में छोटी कहानियों के माध्यम से बताया गया है कि सत्य का पालन न करने पर किस तरह की परेशानियां आती है। इसलिए जीवन में सत्य व्रत का पालन पूरी निष्ठा और सुदृढ़ता के साथ करना चाहिए। ऐसा न करने पर भगवान न केवल नाराज होते हैं अपितु दंड स्वरूप संपति और बंधु बांधवों के सुख से वंचित भी कर देते हैं। इस अर्थ में यह कथा लोक में सच्चाई की प्रतिष्ठा का लोकप्रिय और सर्वमान्य धार्मिक साहित्य हैं। अक्सर पूर्णमासी को इस कथा का परिवार में वाचन किया जाता है। अन्य पर्वों पर भी इस कथा को विधि विधान से करने का निर्देश दिया गया है।

Tuesday, May 17, 2016

ये 4 बातें ध्यान रखें हनुमानजी की, हमेशा मिलेगी कामयाबी


हनुमानजी की पूजा से ही नहीं, बल्कि उनसे कुछ बातें सीख लेने पर भी हमारी सभी परेशानियां दूर हो सकती हैं और सभी कामों में सफलता मिल सकती है। यहां जानिए हनुमानजी से हम कौन-कौन सी बातें सीख सकते हैं...
1. संघर्ष क्षमता
हनुमानजी जब सीता की खोज में समुद्र पार कर रहे थे, तब उन्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। सुरसा और सिंहिका नाम की राक्षसियों ने हनुमानजी को समुद्र पार करने से रोकना चाहा था, लेकिन बजरंग बली नहीं रुके और लंका पहुंच गए। हमें भी कदम-कदम पर ऐसे ही संघर्षों का सामना करना पड़ता है। संघर्षों से न डरते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने की सीख हनुमानजी से लेनी चाहिए।
2.चतुराई
हनुमानजी ने समुद्र पार करते समय सुरसा से लड़ने में समय नहीं गंवाया। सुरसा हनुमानजी को खाना चाहती थी। उस समय हनुमानजी ने अपनी चतुराई से पहले अपने शरीर का आकार बढ़ाया और अचानक छोटा रूप कर लिया। छोटा रूप करने के बाद हनुमानजी सुरसा के मुंह में प्रवेश करके वापस बाहर आ गए। हनुमानजी की इस चतुराई से सुरसा प्रसन्न हो गई और रास्ता छोड़ दिया। चतुराई की यह कला हम हनुमानजी से सीख सकते हैं।
3.संयमितजीवन
हनुमानजी आजीवन ब्रह्मचारी रहे यानी उनका जीवन संयमित था। संयमपूर्वक रहने के कारण ही वे बहुत ताकतवर थे। हमारे जीवन में खान-पान और रहन-सहन सबकुछ असंयमित हो रहा है। असंयमित दिनचर्या के कारण गंभीर रोगों का डर लगा रहता है। संयम के साथ कैसा रहना चाहिए, ये बात हम हनुमानजी से सीख सकते हैं। आज जो लोग विवाहित हैं, वे भी अपने खान-पान और रहन-सहन में सावधानी रखेंगे तो उन्हें भी श्रेष्ठ स्वास्थ्य मिल सकता है।
4.लोक-कल्याण
हनुमानजी का अवतार ही श्रीराम के काम के लिए हुआ था। श्रीराम का काम यानी रावण का अंत करके तीनों लोकों का सुखी करना। हनुमानजी ने श्रीराम का साथ दिया। हमें भी हनुमानजी से यह प्रेरणा लेनी चाहिए कि जो लोग अच्छा और समाज सेवा का काम करते हैं, उनका साथ दें।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-SEHE-we-should-learn-these-4-things-from-hanumanji-5322204-PHO.html?seq=1