Friday, June 10, 2016

जनेऊ पहनने के फायदे, क्या आपको पता हैं?

भारतीय संस्कृति में यज्ञोपवीत यानी जनेऊ धारण करने की परंपरा वैदिक काल से ही चली आ रही है इसे उपनयन भी कहा जाता है। उपनयन की गिनती सोलह संस्कारों में होती है। यह तीन धागों वाला एक सूत्र होता है जो लड़के के दस से बारह वर्ष की आयु हो जाने के बाद उसे पहनाया जाता है। पर आज के दौर में लोग जनेऊ पहनने से बचना चाहते हैं। नई पीढ़ी के मन में सवाल उठता है कि आखिर इसे पहनने से फायदा क्या होगा?


जनेऊ पहनने वाला हर वक्‍त नियमों से बंधा हुआ होता है। वह नित्य कर्म के बाद अपनी जनेऊ उतार नहीं सकता। यही कारण है कि आज के दौर में लोग जनेऊ पहनने से बचना चाहते हैं। इसे आउटडेटेड मानते हैं, लेकिन इसे पहनने से हमारे शरीर को कई बड़े फायदे होते हैं। आइए जानते हैं ऐसे ही कुछ फायदों को ...
1. जीवाणुओं और कीटाणुओं से बचाव
जो लोग जनेऊ पहनते हैं और इससे जुड़े नियमों का पालन करते हैं, वे मल-मूत्र त्याग करते वक्त अपना मुंह बंद रखते हैं। इसकी आदत पड़ जाने के बाद लोग बड़ी आसानी से गंदे स्थानों पर पाए जाने वाले जीवाणुओं और कीटाणुओं के प्रकोप से बच जाते हैं।
2. तन निर्मल, मन निर्मल
जनेऊ को कान के ऊपर कसकर लपेटने का नियम है। ऐसा करने से कान के पास से गुजरने वाली उन नसों पर भी दबाव पड़ता है, जिनका संबंध सीधे आंतों से है। इन नसों पर दबाव पड़ने से कब्ज की श‍िकायत नहीं होती है. पेट साफ होने पर शरीर और मन, दोनों ही सेहतमंद रहते हैं।
3. बल व तेज में बढ़ोतरी
दाएं कान के पास से वे नसें भी गुजरती हैं, जिसका संबंध अंडकोष और गुप्तेंद्रियों से होता है। मूत्र त्याग के वक्त दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से वे नसें दब जाती हैं, जिनसे वीर्य निकलता है। ऐसे में जाने-अनजाने शुक्राणुओं की रक्षा होती है। इससे इंसान के बल और तेज में वृद्ध‍ि होती है।
4. हृदय रोग व ब्लडप्रेशर से बचाव
रिसर्च में मेडिकल साइंस ने भी पाया है कि जनेऊ पहनने वालों को हृदय रोग और ब्लडप्रेशर की आशंका अन्य लोगों के मुकाबले कम होती है। जनेऊ शरीर में खून के प्रवाह को भी कंट्रोल करने में मददगार होता है।
 5. स्मरण शक्ति‍ में इजाफा
कान पर हर रोज जनेऊ रखने और कसने से स्मरण शक्त‍ि में भी इजाफा होता है। कान पर दबाव पड़ने से दिमाग की वे नसें एक्ट‍िव हो जाती हैं, जिनका संबंध स्मरण शक्त‍ि से होता है। दरअसल, गलतियां करने पर बच्चों के कान ऐंठने के पीछे भी मूल मकसद यही होता था।
6. मानसिक बल में बढ़ोतरी
यज्ञोपवीत की वजह से मानसिक बल भी मिलता है। यह लोगों को हमेशा बुरे कामों से बचने की याद दिलाता रहता है। साथ ही ऐसी मान्यता है कि जनेऊ पहनने वालों के पास बुरी आत्माएं नहीं फटकती हैं। इसमें सच्चाई चाहे जो भी हो, पर केवल मन में इसका गहरा विश्वास होने भर से फायदा तो होता ही है।
7. आध्यात्म‍िक ऊर्जा की प्राप्त‍ि
जनेऊ धारण करने से आध्यात्म‍िक ऊर्जा भी मिलती है। ऐसी मान्यता है कि यज्ञोपवीत में प्रभु का वास होता है। यह हमें कर्तव्य की भी याद दिलाता है।

Thursday, June 9, 2016

महिलाओं को शादी के बाद इस कारण लगाना होता है सिंदूर


सदियों से विवाहित हिंदू महिलाएं मांग में सिंदूर लगाती रही हैं। कहते हैं माथे का सिंदूर सुहागन स्त्री के सौभाग्य को हमेशा बनाए रखता है। एक प्रचलित मान्यता के अनुसार, देवी पार्वती ने अपने पति के सम्मान के लिए अपने जीवन की आहुति दी थी। जिसके कारण सिंदूर देवी पार्वती का प्रतीक है। माना जाता है कि जो महिला अपने माथे पर सिंदूर लगाती है, देवी पार्वती का हाथ उसके सिर पर हमेशा बना रहता है। वे हर समय उसके पति की रक्षा करती हैं।
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार
मेष राशि का स्थान माथे पर होता है। मंगल, मेष राशि का स्वामी ग्रह है, क्योंकि मंगल ग्रह का रंग लाल होता है। इसे शुभ माना जाता है। इसे सौभाग्य का संकेत भी माना जाता है। उत्तर भारत में नवरात्रि व संक्राति जैसे त्योहारों पर विवाहित स्त्रियों के लिए सिंदूर लगाना बहुत अनिवार्य है। इससे पता चलता है कि सिंदूर धार्मिक कारणों की वजह से भी बहुत महत्व रखता है।
सिंदूर लगाने का वैज्ञानिक कारण
सिर के मध्य भाग में सिंदूर लगाया जाता है। इस बिंदु को महत्वपूर्ण और संवेदनशील माना जाता है। इस जगह सिंदूर लगाने से दिमाग हमेशा सतर्क और सक्रिय रहता है। दरअसल, सिंदूर में मरकरी होता है। ये अकेली ऐसी धातु है, जो लिक्विड रूप में पाई जाती है। यही वजह है कि सिंदूर लगाने से शीतलता मिलती है और दिमाग तनावमुक्त रहता है। सिंदूर शादी के बाद लगाया जाता है, क्योंकि माना जाता है शादी के बाद ही महिला की जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं और दिमाग को शांत और व्यवस्थित रखना जरूरी हो जाता है। इसलिए सिंदूर लगाने की प्रथा बनाई गई है।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-JMJ-SAS-why-indian-women-put-sindoor-in-their-maang-4918700-NOR.html

Wednesday, June 8, 2016

क्यों इस कांड का नाम सुंदरकाण्ड ही है?


हनुमानजी की सफलता के लिए सुंदरकाण्ड को याद किया जाता है। श्रीरामचरित मानस के इस पांचवें अध्याय को लेकर लोग अक्सर चर्चा करते हैं कि इस अध्याय का नाम सुंदरकाण्ड ही क्यों रखा गया है? यहां जानिए इस प्रश्न का उत्तर...
श्रीरामचरित मानस में हैं 7 काण्ड
श्रीरामचरित मानस में कुल 7 काण्ड (अध्याय) हैं। सुंदरकाण्ड के अतिरिक्त सभी अध्यायों के नाम स्थान या स्थितियों के आधार पर रखे गए हैं। बाललीला का बालकाण्ड, अयोध्या की घटनाओं का अयोध्या काण्ड, जंगल के जीवन का अरण्य काण्ड, किष्किंधा राज्य के कारण किष्किंधा काण्ड, लंका के युद्ध की चर्चा का लंका काण्ड और जीवन से जुड़े प्रश्नों के उत्तर उत्तरकाण्ड में दिए गए हैं।
सुंदरकाण्ड का नाम सुंदरकाण्ड क्यों रखा गया?
हनुमानजी, सीताजी की खोज में लंका गए थे और लंका त्रिकुटाचल पर्वत पर बसी हुई थी। त्रिकुटाचल पर्वत यानी यहांं 3 पर्वत थे। पहला सुबैल पर्वत, जहां के मैदान में युद्ध हुआ था। दूसरा नील पर्वत, जहां राक्षसों के महल बसे हुए थे और तीसरे पर्वत का नाम है सुंदर पर्वत, जहां अशोक वाटिका निर्मित थी। इसी अशोक वाटिका में हनुमानजी और सीताजी की भेंट हुई थी। इस काण्ड की यही सबसे प्रमुख घटना थी, इसलिए इसका नाम सुंदरकाण्ड रखा गया है।
सुंदरकांड के पाठ से मिलता है मनोवैज्ञानिक लाभ
वास्तव में श्रीरामचरितमानस के सुंदरकांड की कथा सबसे अलग है। संपूर्ण श्रीरामचरितमानस भगवान श्रीराम के गुणों और उनके पुरुषार्थ को दर्शाती है। सुंदरकांड एकमात्र ऐसा अध्याय है जो श्रीराम के भक्त हनुमान की विजय का कांड है। मनोवैज्ञानिक नजरिए से देखा जाए तो यह आत्मविश्वास और इच्छाशक्ति बढ़ाने वाला कांड है। सुंदरकांड के पाठ से व्यक्ति को मानसिक शक्ति प्राप्त होती है। किसी भी कार्य को पूर्ण करने के लिए आत्मविश्वास मिलता है।
हनुमानजी जो कि वानर थे, वे समुद्र को लांघकर लंका पहुंच गए और वहां सीता की खोज की। लंका को जलाया और सीता का संदेश लेकर श्रीराम के पास लौट आए। यह एक भक्त की जीत का कांड है, जो अपनी इच्छाशक्ति के बल पर इतना बड़ा चमत्कार कर सकता है। सुंदरकांड में जीवन की सफलता के महत्वपूर्ण सूत्र भी दिए गए हैं। इसलिए पूरी रामायण में सुंदरकांड को सबसे श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि यह व्यक्ति में आत्मविश्वास बढ़ाता है। इसी वजह से सुंदरकांड का पाठ विशेष रूप से किया जाता है।
सुंदरकांड के पाठ से मिलता है धार्मिक लाभ
हनुमानजी की पूजा सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली मानी गई है। बजरंग बली बहुत जल्दी प्रसन्न होने वाले देवता हैं। शास्त्रों में इनकी कृपा पाने के कई उपाय बताए गए हैं, इन्हीं उपायों में से एक उपाय सुंदरकांड का पाठ करना है। सुंदरकांड के पाठ से हनुमानजी के साथ ही श्रीराम की भी विशेष कृपा प्राप्त होती है। किसी भी प्रकार की परेशानी हो, सुंदरकांड के पाठ से दूर हो जाती है। यह एक श्रेष्ठ और सबसे सरल उपाय है। इसी वजह से काफी लोग सुंदरकांड का पाठ नियमित रूप करते हैं।
सुंदरकाण्ड के पाठ से प्रसन्न होते हैं हनुमानजी
माना जाता है कि सुंदरकाण्ड के पाठ से बजरंग बली की कृपा बहुत ही जल्द प्राप्त हो जाती है। जो लोग नियमित रूप से इसका पाठ करते हैं, उनके सभी दुख दूर हो जाते हैं। इस काण्ड में हनुमानजी ने अपनी बुद्धि और बल से सीता की खोज की है। इसी वजह से सुंदरकाण्ड को हनुमानजी की सफलता के लिए याद किया जाता है।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-JKR-DHAJ-importance-of-sundarkand-in-hindi-5342426-PHO.html

Tuesday, June 7, 2016

क्यों है शुभ काम में नारियल चढ़ाने की परंपरा ?


सनातन धर्म के ज्यादातर धार्मिक संस्कारों में नारियल का विशेष महत्व है। कोई भी व्यक्ति जब कोई नया काम शुरू करता है तो भगवान के सामने नारियल फोड़ता है। चाहे शादी हो, त्योहार हो या फिर कोई महत्वपूर्ण पूजा, पूजा की सामग्री में नारियल आवश्यक रूप से रहता है। नारियल को संस्कृत में श्रीफल के नाम से जाना जाता है। जानकारों के अनुसार यह फल बलि कर्म का प्रतीक है। बलि कर्म का अर्थ होता है उपहार या नैवेद्य की वस्तु। देवताओं को बलि देने का अर्थ है,उनके द्वारा की गई कृपा के प्रति आभार व्यक्त करना या उनकी कृपा का अंश के रूप मे देवता को अर्पित करना।
क्यों बनाई गई नारियल फोड़ने की परंपरा
कहते हैं एक समय हिंदू धर्म में मनुष्य और जानवरों की बलि सामान्य बात थी। तभी आदि शंकराचार्य ने इस अमानवीय परंपरा को तोड़ा और मनुष्य के स्थान पर नारियल चढ़ाने की शुरुआत की। नारियल कई तरह से मनुष्य के मस्तिष्क से मेल खाता है। नारियल की जटा की तुलना मनुष्य के बालों से, कठोर कवच की तुलना मनुष्य की खोपड़ी से और नारियल पानी की तुलना खून से की जा सकती है। साथही, नारियल के गूदे की तुलना मनुष्य के दिमाग से की जा सकती है।
नारियल फोड़ने का ये है महत्व
नारियल फोड़ने का मतलब है कि आप अपने अहंकार और स्वयं को भगवान के सामने समर्पित कर रहे हैं। माना जाता है कि ऐसा करने पर अज्ञानता और अहंकार का कठोर कवच टूट जाता है और ये आत्मा की शुद्धता और ज्ञान का द्वार खोलता है, जिससे नारियल के सफेद हिस्से के रूप में देखा जाता है।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-JMJ-SAS-ritual-of-coconut-with-breaking-4909388-NOR.html 

Monday, June 6, 2016

मनु स्मृतिः रोज करना चाहिए ये 5 यज्ञ, जानिए क्यों व कैसे?


मनु स्मृति के अनुसार, मनुष्य को जाने-अनजाने में हुए पाप की शांति के लिए रोज 5 यज्ञ करना चाहिए। यहां यज्ञ का अर्थ अग्नि में आहुति देने से नहीं है बल्कि अध्ययन, अतिथि सत्कार आदि से है। इन 5 यज्ञ इस प्रकार हैं-
श्लोक

अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञस्तु तर्पणम्।
होमो दैवो बलिर्भौतोनृयज्ञोतिथिपूजनम्।।
अर्थात्- वेदों का अध्ययन करना और कराना ब्रह्मयज्ञ, अपने पितरों (स्वर्गीय पूर्वजों) का श्राद्ध-तर्पण करना पितृ यज्ञ, हवन करना देव यज्ञ, बलिवैश्वदेव करना भूत यज्ञ और अतिथियों का सत्कार करना तथा उन्हें भोजन कराना नृयज्ञ अर्थात मनुष्य यज्ञ कहलाता है।
1. ब्रह्मयज्ञ
हर रोज वेदों का अध्ययन करने से ब्रह्मयज्ञ होता है। वेदों के अलावा पुराण, उपनिषद, महाभारत, गीता या अध्यात्म विद्याओं के पाठ से भी यह यज्ञ पूरा हो जाता है। यह न हो तो मात्र गायत्री साधना भी ब्रह्मयज्ञ संपूर्ण कर देती है। धार्मिक दृष्टि से इस यज्ञ से ऋषि ऋण से मुक्ति मिलती है। इसलिए इसे ऋषियज्ञ या स्वाध्याय यज्ञ भी कहा जाता है।
2. देवयज्ञ
देवी-देवताओं की प्रसन्नता के लिए हवन करना देवयज्ञ कहलाता है।
3. पितृयज्ञ
मृत पितरों की संतुष्टि व तृप्ति के लिये अन्न-जल समर्पित करना पितृयज्ञ कहलाता है। जिससे पितरों की असीम कृपा से सुख-समृद्धि प्राप्त होती है। अमावस्या, श्राद्धपक्ष आदि इसके लिए विशेष दिन है।
4. भूतयज्ञ
कीट-पतंगों, पशु-पक्षी, कृमि या धाता-विधाता स्वरूप भूतादि देवताओं के लिए अन्न या भोजन अर्पित करना भूतयज्ञ कहलाता है।
5. मनुष्य यज्ञ
घर के दरवाजे पर आए अतिथि को अन्न, वस्त्र, धन से तृप्त करना या दिव्य पुरुषों के लिए अन्न दान आदि मनुष्य यज्ञ कहलाता है।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-JKR-DHAJ-every-day-should-do-this-5-yagya-know-why-5334589-PHO.html

Saturday, June 4, 2016

रसोईघर में चप्पल नहीं पहनना चाहिए क्योंकि...

प्राचीन काल से ही ऋषि-मुनियों और विद्वानों द्वारा रसोईघर में चरण पादुकाएं यानी जूते-चप्पल नहीं पहनने की बात कही गई है। दरअसल, इसकी वजह यह है कि रसोईघर में जूते-चप्पल के साथ गंदगी भी आती है जो कि परिवार के सदस्यों के लिए स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक होती है।

इस वजह से घर में जूते-चप्पल पहनना उचित नहीं है।साथ ही, इसके पीछे धार्मिक कारण ये है कि रसोईघर में जो खाना बनता है उसका नैवैद्य भगवान को लगता है। कहते हैं रसोईघर में अन्नपूर्णा देवी भी निवास करती हैं। ऐसे में यदि हम जूते-चप्पल पहनकर किचन में काम करते हैं तो भगवान का भी अपमान होता है।

Thursday, June 2, 2016

सूर्योदय से पहले क्यों उठना चाहिए?


सनातन धर्म में सूर्योदय से पहले उठना सबसे अच्छा माना जाता है।रात का अंतिम प्रहर जिसे ब्रह्म मुहूर्त कहते हैं। हमारे ऋषि मुनियों ने उसका विशेष महत्व बताया है। दरअसल, उनके अनुसार यह समय जागने के लिए सर्वोत्तम है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने से सौंदर्य, बल, विद्या, बुद्धि और स्वास्थ्य मिलता है। ब्रह्म मुहूर्त का विशेष महत्व बताने के पीछे हमारे विद्वानों की वैज्ञानिक सोच निहित थी।

वैज्ञानिक शोधों से ज्ञात हुआ है कि ब्रह्म मुहूर्त में वायु मंडल प्रदूषित नहीं होता है। इसी समय वायु मंडल में ऑक्सीजन (प्राण वायु) की मात्रा सबसे ज्यादा (41 प्रतिशत) होती है, जो फेफड़ों की शुद्धि के लिए महत्वपूर्ण होती है। शुद्ध हवा मिलने से मन, दिमाग भी स्वस्थ रहता है। आयुर्वेद के अनुसार ब्रह्म मुहूर्त में उठकर टहलने से शरीर में संजीवनी शक्ति का संचार होता है। यही कारण है कि इस समय बहने वाली वायु को अमृततुल्य (अमृत के समान) कहा गया है। इसके अलावा यह समय अध्ययन के लिए भी सर्वोत्तम बताया गया है, क्योंकि रात को आराम करने के बाद सुबह जब हम उठते हैं तो शरीर व दिमाग में भी स्फूर्ति व ताजगी रहती है।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-JMJ-GYVG-ritual-of-hindu-dharma-5321494-NOR.html