Tuesday, August 22, 2017

10 दिन क्यों मनाते हैं गणेश उत्सव, ये है इसका मुख्य कारण

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी का पर्व मनाया जाता है। शिवपुराण के अनुसार, इसी दिन भगवान श्रीगणेश का जन्म हुआ था। विद्वानों के अनुसार पहले ये पर्व सिर्फ एक दिन ही मनाया जाता था, लेकिन वर्तमान में ये उत्सव 10 दिन मनाया जाता है और 11वे दिन यानी अनंत चतुर्दशी पर गणेश प्रतिमाओं के विसर्जन के साथ इसका समापन होता है। सिर्फ 1 दिन मनाया जाने वाला पर्व 10 दिनों तक क्यों मनाया जाता है, इसके पीछे भी एक महत्वपूर्ण कारण छिपा है। आज हम आपको उसी के बारे में बता रहे हैं।

1    1.   हिंदू धर्म में शैव-वैष्णव जैसे कई उपासना पंथ हैं। इनमें गणपति की उपासना कनरे वालों को गाणपत्य कहा जाता है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को गणेश चतुर्थी का पर्व हजारों साल से मनाया जा रहा है। जब भारत में पेशवाओं का शासन था, उस समय इस पर्व को भव्य रूप से मनाया जाने लगा। सवाई माधवराव पेशवा के शासन में पूना के प्रसिद्ध शनिवारवाड़ा नामक राजमहल में भव्य गणेशोत्सव मनाया जाता था।

       2. जब अंग्रेज भारत आए तो उन्होंने पेशवाओं के राज्य पर अधिकार कर लिया। इसके कारण गणेश उत्सव की भव्यता में कमी आने लगी, लेकिन ये परंपरा बनी रही। उस समय हिंदू भी अपने धर्म के प्रति उदासी हो गए थे। युवकों में अपने धर्म के प्रति नकारात्मकता और अंग्रेजी आचार-विचार के प्रति आकर्षण बढ़ने लगा था। उस समय महान क्रांतिकारी व जननेता लोकमान्य तिलक ने सोचा कि हिंदू धर्म को कैसे संगठित किया जाए?

      3. लोकमान्य तिलक ने विचार किया कि श्रीगणेश ही एकमात्र ऐसे देवता हैं जो समाज के सभी स्तरों में पूजनीय हैं। गणेशोत्सव एक धार्मिक उत्सव होने के कारण अंग्रेज शासक भी इसमें दखल नहीं दे सकेंगे। इसी विचार के साथ लोकमान्य तिलक ने पूना में सन् 1893 में सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरूआत की। तिलक ने गणेशोत्सव को आजादी की लड़ाई के लिए एक प्रभावशाली साधन बनाया।

4    4.धीरे-धीरे पूरे महाराष्ट्र में सार्वजनिक गणेशोत्सव मनाया जाने लगा। ये वो दौर था जब अन्य धर्मों के लोग भी हिंदू धर्म पर हावी हो रहे थे। इस संबंध में लोकमान्य तिलक ने पूना में एक सभा आयोजित की। जिसमें ये तय किया गया कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से भद्रपद शुक्ल चतुर्दशी (अनंत चतुर्दशी) तक गणेश उत्सव मनाया जाए। 10 दिनों के इस उत्सव में हिंदुओं को एकजुट करने व देश को आजाद करने के लिए विभिन्न योजनाओं पर भी विचार किया जाता था।
https://religion.bhaskar.com/news/JM-JKR-DGRA-why-celebrate-ganesh-utsav-10-days-know-5673709-PHO.html?seq=1

Saturday, August 19, 2017

हस्तिनापुर को गंगा में डुबाना चाहते थे बलराम, ये हैं रोचक बातें

भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को बलदाऊ जयंती मनाई जाती है। इसे हरछठ भी कहते हैं। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम का जन्म इसी तिथि पर हुआ था। इस अवसर पर हम आपको भगवान बलराम से जुड़ी कुछ रोचक बातें बता रहे हैं।

बलराम ने उखाड़ लिया था हस्तिनापुर
श्रीमद्भागवत के अनुसार, दुर्योधन की पुत्री का नाम लक्ष्मणा था। विवाह योग्य होने पर दुर्योधन ने उसका स्वयंवर किया। उस स्वयंवर में भगवान श्रीकृष्ण का पुत्र साम्ब भी गया। वह लक्ष्मणा के सौंदर्य पर मोहित हो गया और स्वयंवर से उसका हरण कर ले गया। कौरवों ने उसका पीछा किया और बंदी बना लिया। यह बात जब यदुवंशियों को पता चली तो वे कौरवों के साथ युद्ध की तैयारी करने लगे, लेकिन श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम ने उन्हें रोक दिया और स्वयं कौरवों से बात करने हस्तिनापुर आए।
यहां आकर उन्होंने कौरवों से साम्ब व लक्ष्मणा को द्वारिका भेजने के लिए कहा। तब कौरवों ने उनका खूब अपमान किया। अपने अपमान से क्रोधित होकर बलराम ने अपने हल से हस्तिनापुर को उखाड़ दिया और गंगा नदी की ओर खींचने लगे। कौरवों ने जब देखा कि बलराम तो हस्तिनापुर को गंगा में डूबाने वाले हैं तब उन्होंने साम्ब व लक्ष्मणा को छोड़ दिया और बलराम से माफी मांग ली।
जिसे बचाया बाद में उसी का वध कर दिया बलराम ने
जब भगवान श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी का हरण किया तब रुक्मिणी का भाई रुक्मी उन्हें रोकने आया। रुक्मी और श्रीकृष्ण में युद्ध हुआ। अंत में श्रीकृष्ण ने रुक्मी को पराजित कर दिया। श्रीकृष्ण उसका वध करना चाहते थे, लेकिन बलराम ने उन्हें रोक दिया। तब श्रीकृष्ण ने रुक्मी के दाढ़ी-मूंछ व सिर के बालों को कई स्थानों से मूंड़कर उसे कुरूप बना कर छोड़ दिया।
रुक्मी की पुत्री रुक्मवती का विवाह श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के साथ हुआ था। इसके बाद रुक्मी ने अपनी बहन रुक्मिणी को प्रसन्न करने के लिए अपनी पौत्री रोचना का विवाह श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध से कर दिया, लेकिन मन ही मन वह श्रीकृष्ण से बैर रखता था। अनिरुद्ध-रोचना के विवाह में रुक्मी ने बलराम को चौसर खेलने के लिए आमंत्रित किया। हारने पर भी रुक्मी कहने लगा कि मैं जीत गया। ऐसा कहते हुए वह बलरामजी की हंसी उड़ाने लगा। तब बलरामजी को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने रुक्मी का वध कर दिया।

बलरामजी ने किया था ये अपराध
जिस समय कौरव व पांडवों के बीच युद्ध हो रहा था, उस समय श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम तीर्थयात्रा कर रहे थे। यात्रा के दौरान वे नैमिषारण्य पहुंचे। वहां उस समय बड़े-बड़े ऋषि उपस्थित होकर सत्संग कर रहे थे। बलरामजी को आया देख सभी ने उनका अभिवादन और पूजन किया। तभी बलरामजी ने देखा कि महर्षि वेदव्यास के शिष्य रोमहर्षण सूत जाति में उत्पन्न होने पर भी श्रेष्ठ ब्राह्मणों से ऊंचे स्थान पर बैठे हैं और उन्होंने अभिवादन व प्रणाम भी नहीं किया।
यह देख बलरामजी को बहुत क्रोध आया और उन्होंने अपने हाथ में स्थित कुश (एक प्रकार की घास) की नोक से उन पर प्रहार कर दिया, जिससे उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद ब्राह्मणों ने बलरामजी को बताया कि उन्होंने ही रोमहर्षण को उच्च आसन और जब तक यह सत्संग समाप्त न हो, तब तक के लिए शारीरिक कष्ट रहित आयु दी थी। ऋषियों की बात सुनकर बलरामजी ने कहा कि आत्मा ही पुत्र के रूप में उत्पन्न होती है। इसलिए रोमहर्षण के स्थान पर उनका पुत्र आप लोगों को पुराणों की कथा सुनाएगा। उसे में अपनी शक्ति से दीर्घायु और बल प्रदान करता हूं।

जब बलराम ने किया राक्षस का वध
जब श्रीकृष्ण व बलराम वृंदावन में रहते थे। वहां से थोड़ी ही दूर एक बड़ा भारी वन था। उसमें धेनुकसुर नाम का दैत्य रहता है। एक बार श्रीकृष्ण और बलराम अपने मित्रों के साथ उस वन में खेलने पहुंच गए। जब धेनुकासुर ने उन्हें देखा तो श्रीकृष्ण व बलराम को मारने के दौड़ा। बलराम ने धेनुकासुर को देख लिए और अपने एक ही हाथ से उसके दोनों पैर पकड़ लिए और उसे आकाश में घुमाकर एक ताड़ के पेड़ पर दे मारा। घुमाते समय ही उस दैत्य के प्राणपखेरू उड़ गए।

Friday, August 18, 2017

इन 5 कामों में देर करना अच्छी बात है, बच सकते हैं परेशानियों से

महाभारत के एक श्लोक में बताया है कि हमें किन कामों को ज्यादा से ज्यादा टालने की कोशिश करना चाहिए...

रागे दर्पे च माने च द्रोहे पापे च कर्मणि।
अप्रिये चैव कर्तव्ये चिरकारी प्रशस्यते।।
ये श्लोक महाभारत के शांति पर्व में दिया गया है। इस श्लोक में 5 काम ऐसे बताए गए हैं, जिनमें देर करने पर हम कई परेशानियों से बच सकते हैं। 

पहला काम है राग यानी अत्यधिक मोह
पहला काम है राग यानी अत्यधिक मोह, अत्यधिक जोश, अत्यधिक वासना। राग एक बुराई है। इससे बचना चाहिए। जब भी मन में राग भाव जागे तो कुछ समय के शांत हो जाना चाहिए। अधिक जोश में किया गया काम बिगड़ भी सकता है। वासना को काबू न किया जाए तो इसके भयंकर परिणाम हो सकते हैं। किसी के प्रति मोह बढ़ाने में भी कुछ समय रुक जाना चाहिए। राग का भाव जागने पर कुछ देर रुकेंगे तो ये विचार शांत हो सकते हैं और हम बुराई से बच जाएंगे।

दूसरा काम है घमंड
दर्प यानी घमंड ऐसी बुराई है जो व्यक्ति को बर्बाद कर सकती है। घमंड के कारण ही रावण और दुर्योधन का अंत हुआ था। घमंड का भाव मन में आते ही एकदम प्रदर्शित नहीं करना चाहिए। कुछ देर रुक जाएं। ऐसा करने पर हो सकता है कि आपके मन से घमंड का भाव ही खत्म हो जाए और आप इस बुराई से बच जाएं।

तीसरा काम है लड़ाई करना
यदि कोई ताकतवर इंसान किसी कमजोर से भी लड़ाई करेगा तो कुछ नुकसान तो ताकतवर को भी होता है। लड़ाई करने से पहले थोड़ी देर रुक जाना चाहिए। ऐसा करने पर भविष्य में होने वाली कई परेशानियों से हम बच सकते हैं। आपसी रिश्तों में वाद-विवाद होते रहते हैं, लेकिन झगड़े की स्थिति आ जाए तो कुछ देर शांत हो जाना चाहिए। झगड़ा भी शांत हो जाएगा।

चौथा काम है पाप करना
यदि मन में कोई गलत काम यानी पाप करने के लिए विचार बन रहे हैं तो ये परेशानी की बात है। गलत काम जैसे चोरी करना, स्त्रियों का अपमान करना, धर्म के विरुद्ध काम करना आदि। ये काम करने से पहले थोड़ी देर रुक जाएंगे तो मन से गलत काम करने के विचार खत्म हो सकते हैं। पाप कर्म से व्यक्ति का सुख और पुण्य नष्ट हो जाता है।

पांचवां काम है दूसरों को नुकसान पहुंचाना
यदि हम किसी का नुकसान करने की योजना बना रहे हैं तो इस योजना पर काम करने से पहले कुछ देर रुक जाना चाहिए। इस काम में जितनी देर करेंगे, उतना अच्छा रहेगा। किसी को नुकसान पहुंचाना अधर्म है और इससे बचना चाहिए। पुरानी कहावत है जो लोग दूसरों के लिए गड्ढा खोदते हैं, एक दिन वे ही उस गड्ढे में गिरते हैं। इसीलिए दूसरों का अहित करने से पहले कुछ देर रुक जाना चाहिए।

Thursday, August 17, 2017

महाभारत में युद्ध के नियम नहीं माने थे अश्वत्थामा ने, किया था ये काम

महाभारत के सौप्तिक पर्व के अनुसार दुर्योधन को मरा हुआ समझने के बाद से द्रोण पुत्र अश्वत्थामा गुस्से से भरा हुआ था। उस दिन की युद्ध समाप्ति के बाद कौरवों का पक्ष लगभग पूरी तरह खत्म हो चुका था। मगर कृपाचार्य, कृतवर्मा और अश्वत्थामा तीनों ने हार नहीं मानी और वे विश्राम के लिए वन की ओर चले गए अगले दिन फिर से युद्ध लड़ने के मन से। घने जंगल में एक पेड़ के नीचे विश्राम करने लगे। उस दिन के युद्ध के बाद अश्वत्थामा का शरीर तो विश्राम चाहता था, लेकिन उसके दिमाग में इतना क्रोध था कि वह कैसे भी पांडवों से बदला लेना चाहता था।

पांडवों से बदला लेने की चाहत में वो पेड़ की तरफ देख रहा था तभी उसने एक उल्लू को शांति से अपने घोंसले में सोए कौओं पर हमला करते देखा। उस उल्लू ने कुछ ही देर में सारे कौओं को मार डाला यह दृश्य देखकर अश्वत्थामा को लगा कि वो भी पांडवों को इसी तरह खत्म कर सकता है। उसने अपना ये निर्णय कृपाचार्य व कृतवर्मा को सुनाया और उनके मना करने पर भी उन्हें जैसे-तैसे मना कर अपने साथ कर लिया। इसके बाद अश्वत्थामा तुरंत उठा और अपने रथ पर सवार हो गया। उसके पीछे-पीछे रथ पर सवार होकर कृतवर्मा व कृपाचार्य भी चल दिए।

जैसे ही अश्वत्थामा पांडवों की छावनी के बाहर पहुंचा। उसे एक दिव्य पुरुष के दर्शन हुए, जिन्होंने कपड़ों के रूप में मृग चर्म पहन रखा था। साथ ही, सांपों की जनेऊ को धारण कर रखा था। अश्वत्थामा उस दिव्य रूप को देखकर भी घबराया नहीं उसने उन पर अनेक अस्त्रों- शस्त्रों की बारिश कर दी, लेकिन उसका एक भी अस्त्र या शस्त्र काम न आ पाया। ये देखकर उसे समझ आया कि ये महापुरुष और कोई नहीं स्वयं शिव है।

ये जानकर उसने शिव की आराधना की और हवन करके खुद को उसमें होम देने की कोशिश की। ये देखकर भगवान शिव ने उससे कहा कि द्रोण पुत्र मेरा श्रीकृष्ण से बहुत प्रेम है और मैं उनसे हर तरह से प्रसन्न हूं, लेकिन कुछ पांचालों की मृत्यु तुम्हारे हाथों निश्चित है। ये कहकर शिवजी ने उसे एक तलवार दी और उसके शरीर में विलीन हो गए। इसके बाद अश्वत्थामा पांडवों की छावनी में घुसा और सबसे पहले अपने पिता का वध करने वाले धृष्टद्युम्न को खोज कर उसे बिना किसी अस्त्र- शस्त्र के पीट-पीटकर मार डाला।

धृष्टद्युम्न के बाद उसने अनेकों क्षत्रियों का तेजी से संहार करना शुरू कर दिया। शिखंडी को मारा और पांडवों की छावनी में हाहाकार मचा दिया। धृष्टद्युम्न की मौत की खबर जब पांचाली के पुत्रों को हुई तो उन्होंने अश्वत्थामा का वीरता के साथ सामना किया, लेकिन उनकी मौत निश्चित थी। इसलिए पांचाली के पांचों पुत्रों को अश्वत्थामा ने मार डाला। इसके बाद अश्वत्थामा आचार्य कृप व कृतवर्मा के पास पहुंचा उन्हें गले लगाया। तीनों ने ये निश्चय किया कि अगर दुर्योधन जीवित है तो उसे ये शुभ समाचार सुनाना चाहिए। वे तीनों वहां पहुंचे जहां दुर्योधन मरणासन्न स्थिति में पड़ा था। उन्होंने देखा कि अब भी दुर्योधन मरा नहीं है। तीनों उसे देखकर रोने लगे।

अश्वत्थामा ने दुर्योधन से कहा आपके इस अंतिम समय में आपको मैं कुछ आनंद देने वाला समाचार सुनाना चाहता हूं। इससे आपको सुख मिलेगा। पांडवों के पक्ष में अब सिर्फ पांच पांडव, श्रीकृष्ण और सात्यकि ये सात लोग बचे हैं और हमारी ओर से मैं, आचार्य कृप व कृतवर्मा कुशल हैं। मैंने पांचाली के पुत्रों और अन्य योद्धाओं को खत्म कर दिया है। दुर्योधन को ये सुनते ही जैसे गहरी शांति मिली और उसने अश्वत्थामा से कहा तुमने वो काम किया है जो हम कोई भी न कर सके। इतना कहकर दुर्योधन ने अपने प्राण त्याग दिए।

Wednesday, August 16, 2017

महाभारत- कर्ण की ये 5 बातें बहुत कम लोग जानते हैं

कुंती का पुत्र और दुर्योधन का मित्र कर्ण भी महाभारत युद्ध में बहुत ही खास पात्र था। कर्ण के पास एक शक्ति ऐसी थी, जिससे वह अर्जुन को भी हरा सकता था, लेकिन उस शक्ति का उपयोग उसे पहले ही करना पड़ गया था।

1.कर्ण को इंद्र ने दी थी दिव्य शक्ति
इस संबंध में महाभारत का एक प्रसंग है। इस प्रसंग के अनुसार जब इंद्र ने कर्ण से उसके कुंडल और कवच मांगे तो बदले एक दिव्य शक्ति कर्ण को दी थी। इंद्र ने कर्ण से कहा था कि इस शक्ति का उपयोग जिस पर भी करोगे, वह अवश्य मर जाएगा, लेकिन इस शक्ति का उपयोग सिर्फ एक बार ही हो सकता है। इसीलिए कर्ण ने उस शक्ति को अर्जुन के लिए संभाल कर रख लिया था। महाभारत युद्ध में जब भीम का पुत्र घटोत्कच आया तो उसने कौरव सेना में खलबली मचा दी। कोई भी यौद्धा घटोत्कच को काबू नहीं कर पा रहा था। तब कौरव सेना के महाबलियों ने कर्ण से कहा कि इंद्र द्वारा दी गई शक्ति का उपयोग करों और इस राक्षस को मार डालो, नहीं तो ये पूरी कौरव सेना को खत्म कर देगा। इसके बाद सभी की बात मानते हुए कर्ण ने उस शक्ति का उपयोग करके घटोत्कच को मार डाला। इस प्रकार अर्जुन के लिए बचाकर रखी गई दिव्य शक्ति का उपयोग कर्ण ने घटोत्कच के लिए कर लिया।

2.तब कर्ण को नहीं हरा सकते थे पांडव
जब भीम का पुत्र घटोत्कच मारा गया तो सभी पांडव दुखी थे, उस समय श्रीकृष्ण प्रसन्न दिखाई दे रहे थे। यह देखकर अर्जुन को आश्चर्य हुआ। अर्जुन ने श्रीकृष्ण से पूछा कि भीम का पुत्र मारा गया है, पांडव सेना घबरा रही है और आप प्रसन्न क्यों हैं? इस प्रश्न के जवाब में श्रीकृष्ण ने कहा कि अभी यही दिखाई दे रहा है कि कर्ण ने घटोत्कच को मार दिया है, लेकिन सच ये है कि घटोत्कच ने कर्ण को मार दिया है। इंद्र ने कर्ण से कुंडल और कवच पहले ही ले लिए थे। इसके बाद उसके पास सिर्फ एक ही अजेय शक्ति थी, जिसका उपयोग घटोत्कच के लिए कर लिया। इंद्र की दी हुई शक्ति कर्ण के पास रहती तो उसे जीत पाना किसी के लिए भी संभव नहीं था। यदि कुंडल और कवच भी कर्ण के पास होते तो इंद्र सहित सभी देवता भी युद्ध में उसका सामना नहीं कर सकते थे।

3.कर्ण ने कैसे प्राप्त किया अस्त्र-शस्त्र का ज्ञान
कर्ण कुंती का पुत्र था, लेकिन कुंती ने जन्म के तुरंत बाद ही उसे छोड़ दिया था। इसके बाद कर्ण का पालन-पोषण सूत अधिरथ और उसकी पत्नी राधा ने किया था। इसी कारण कर्ण को 'सूत-पुत्र और 'राधेय' भी कहा गया। एक समय जब कर्ण को मालूम हुआ कि परशुराम अपने सारे अस्त्र-शस्त्र ब्राह्मणों को ही दान कर रहे हैं। कई ब्राह्मण उनसे शक्तियां मांगने पहुंच रहे थे। द्रोणाचार्य ने भी उनसे कुछ शस्त्र लिए थे। कर्ण ब्राह्मण नहीं था, लेकिन वह परशुराम से शस्त्र लेने का अवसर गंवाना नहीं चाहता था।
इसके लिए कर्ण ने ब्राह्मण का वेश बनाकर परशुराम से भेंट की। उस समय तक परशुराम अपने सारे शस्त्र दान कर चुके थे। फिर भी कर्ण की सीखने की इच्छा को देखते हुए, उन्होंने उसे अपना शिष्य बना लिया। कई दिव्यास्त्रों का ज्ञान भी कर्ण को दिया। इस प्रकार झूठ बोलकर परशुराम से अस्त्र-शस्त्र का ज्ञान कर्ण ने हासिल कर लिया।

4.परशुराम ने दिया कर्ण को श्राप
कर्ण परशुराम से शिक्षा प्राप्त कर रहे थे, उस दौरान एक दिन गुरु और शिष्य, दोनों जंगल से गुजर रहे थे। रास्ते में परशुराम को थकान महसूस हुई। उन्होंने कर्ण से कहा कि वे आराम करना चाहते हैं। कर्ण एक घने पेड़ के नीचे बैठ गया और परशुराम उसकी गोद में सिर रखकर सो गए। तभी कहीं से एक बड़ा कीड़ा आया और उसने कर्ण की जांघ पर डंक मारना शुरू कर दिया। कर्ण को दर्द हुआ, लेकिन गुरु भक्ति के कारण वह वैसे ही बैठा रहा।
कीड़ा बार-बार डंक मार रहा था, जिससे कर्ण की जांघ से खून बहने लगा। खून की धारा परशुराम को लगी तो वे नींद से जाग गए। उन्होंने कीड़े को हटाया, फिर कर्ण से पूछा कि तुमने उस कीड़े को हटाया क्यों नहीं।
कर्ण ने कहा कि मैं थोड़ा भी हिलता तो आपकी नींद खुल जाती, इससे मेरा सेवा धर्म टूट जाता।
परशुराम ने उसी समय समझ लिया कि इतनी सहनशक्ति किसी ब्राह्मण में नहीं हो सकती। उन्होंने कर्ण से कहा कि तुम क्षत्रिय हो। कर्ण ने अपनी गलती मान ली कि उसने झूठ बोलकर शिक्षा प्राप्त की है।
कर्ण के झूठ से क्रोधित होकर परशुराम ने उसे शाप दिया कि जिस समय तुम्हें इन दिव्यास्त्रों की सबसे ज्यादा जरूरत होगी, उसी समय इनके प्रयोग की विधि तुम भूल जाएगा।
जब महाभारत युद्ध में कर्ण और अर्जुन के बीच निर्णायक युद्ध चल रहा था, तब कर्ण कोई दिव्यास्त्र नहीं चला सका, क्योंकि वह सभी की विधि भूल चुका था।

5.श्रीकृष्ण ने कर्ण से कहा था दुर्योधन का साथ छोड़ दो
महाभारत का एक प्रसंग है। पांडव बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास पूरा कर चुके थे। इसके बाद पांडव दुर्योधन और कौरवों से युद्ध करने की तैयारी कर रहे थे। इस युद्ध को रोकने के लिए श्रीकृष्ण पांडवों के दूत बनकर दुर्योधन को समझाने कौरवों की राजधानी हस्तिनापुर गए थे। श्रीकृष्ण ने दुर्योधन को बहुत समझाया, लेकिन वह नहीं माना। इसके बाद श्रीकृष्ण लौटने लगे तो भीष्म पितामह, विदुर, कर्ण आदि उन्हें हस्तिनापुर की सीमा तक छोड़ने आए थे। नगर की सीमा आने पर सभी लौट गए, लेकिन श्रीकृष्ण ने कर्ण को रोक लिया। श्रीकृष्ण ने कर्ण को पांडवों का बड़ा भाई होने का हवाला देते हुए दुर्योधन का साथ छोड़ने का आग्रह किया।
कर्ण ने कहा ‘वासुदेव! मैं यह सब जानता हूं, लेकिन जिस समय मुझे अपमानित होना पड़ रहा था, उस समय दुर्योधन ने मुझे अपनाकर सम्मानित किया। मुझ पर उसके बहुत से उपकार हैं। मेरे भरोसे पर ही दुर्योधन ने पांडवों के खिलाफ युद्ध लड़ने का फैसला किया है। मैं उसके साथ किसी प्रकार का विश्वासघात नहीं करूंगा।’
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