Monday, April 11, 2016

भगवान का ध्यान, पूजा या जप करते समय न करें ये 5 काम


जप करना देवी-देवताओं को प्रसन्न करने का और उनकी कृपा पाने का एक आसान तरीका होता है। जप करते समय पूरे विधि-विधान का ध्यान रखना जरूरी होता है। पूरी क्रिया और श्रद्धा के साथ किया गया जप शुभ फल देना वाला होता है। पुराणों में जप से संबंधित कई बातें बताई गई हैं, जिनका ध्यान हर किसी को रखना ही चाहिए। पुराणों में 5 ऐसे कामों के बारे में बताया गया जो जप करते समय भूलकर भी नहीं करना चाहिए।
1. छींकना
देवी-देवताओं का जप करते समय मनुष्य को अपनी छींक या खांसी पर नियंत्रण रखना चाहिए। भगवान का ध्यान करते समय छींकने से मुंह अपवित्र हो जाता है और अपवित्र मुंह से भगवान का नाम लेना वर्जित माना जाता है। अगर भगवान का जप करते समय छींक या खांसी आ जाए तो तुरंत हाथ-मुंह धो कर, पवित्र हो जाना चाहिए और उसके बाद ही जप दोबारा शुरू करना चाहिए।
2. थूकना
थूक के द्वारा मनुष्य अपने शरीर की गदंगी को बाहर करता है। देवी-देवताओं का ध्यान या जप करते समय ऐसी कोई भी क्रिया करना वर्जित माना गया है। मनुष्य को अपने मन के साथ-साथ शरीर को भी पूरी तरह से शुद्ध करने के बाद ही भगवान की पूजा-अर्चना करना चाहिए। यदि पूजा या ध्यान के बीच में शरीर संबंधी कोई भी क्रिया करनी पड़े तो फिर से नहाने के बाद ही देव-पूजा करनी चाहिए।
3. जंभाई (उबासी) लेना
उबासी लेना आलस्य की निशानी होती है। जो मनुष्य सुबर उठने के बाद भी उबासी लेता रहता है या नींद की अवस्था में रहता है, उसे भगवान की पूजा-अर्चना करने की मनाही है। धर्म ग्रंथों के अनुसार, सुबह जल्दी उठ कर, स्नान आदि काम पूरे करके, आलस-नींद जैसे भावों को मन से दूर करके ही भगवान का ध्यान या जप करना चाहिए।
4. क्रोध
क्रोध यानी गुस्सा करना। बेवजह या बात-बात पर गुस्सा करना सबसे बड़े अवगुणों में से एक माना जाता है। जो क्रोध का भाव अपने मन में रखता है, वह किसी भी काम में अपना मन नहीं लगा सकता। देव पूजा और साधना के लिए मन का शांत और एकाग्र होना बहुत ही जरूरी होता है। अशांत मन से किया गया जप कभी फल नहीं देता। इसलिए, हर मनुष्य को मंदिर जाने से पहले या घर पर ही भगवान की पूजा या जप करने से पहले क्रोध, हिंसा, लालच जैसे भावों को मन से निकान देना चाहिए।
5. मद (नशा)
जो मनुष्य नशा करता है, उसे पुराणों में राक्षस के समान माना गया है। भगवान की पूजा-अर्चना करने से पहले मनुष्य को अपने मन और अपने तन दोनों की शुद्धि करना बहुत जरूरी होता है। जो मनुष्य शराब पीता या नशा करता है, उसके सभी पुण्य कर्म नष्ट हो जाते हैं और उसे नर्क की प्राप्ति होती है। भगवान का ध्यान या जप करते समय नशे के बारे में सोचना भी महापाप माना गया है
http://religion.bhaskar.com/news/JM-JKR-DHAJ-5-things-to-be-remember-while-worshiping-god-and-goddess-in-hindi-5294957-PHO.html

Thursday, April 7, 2016

पूजा से पहले गोबर से पूजन स्थान को पवित्र क्यों करना चाहिए?

हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार गाय में 33 करोड़ देवताओं का वास होता है। इसलिए गाय को पवित्र पशु माना गया है, लेकिन गाय का गोबर सर्वाधिक पवित्र माना जाता है। दरअसल, शास्त्रों के अनुसार गाय के मुख वाले भाग को अशुद्ध और पीछे वाले भाग को शुद्ध माना जाता है।साथ ही, गोबर में लक्ष्मी का निवास माना गया है। इसलिए जब भी कोई पूजन या हवन जैसा कोई धार्मिक कार्य किया जाता है तो उस जगह को गाय के गोबर से लिपा जाता है।

क्यों माना गया है इसे पवित्र
गोबर भयानक रोगों को भी ठीक करने में सहायक है। इसलिए पुराने जमाने में जब भोजन गोबर के उपले और लकड़ियों से बनता था तो कई तरह की बीमारियां नहीं होती थी। गोबर का धुआं अपने आस-पास के वातावरण को भी शुद्ध रखता है। इसके धुएं से घर की सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि होती है। इसलिए गोबर को बहुत पवित्र माना जाता है।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-JMJ-GYVG-how-to-use-cow-dung-in-worship-5232139-NOR.html

Wednesday, April 6, 2016

नवरात्र में क्यों जलाई जाती है अखंड ज्योति?


नवरात्र के नौ दिन माता के सामने अखंड ज्योति प्रज्जवलित की जाती है। अखंड ज्योति पूरे नौ दिनों तक अखंड रहनी चाहिए यानी जलती रहनी चाहिए। यह अखंड ज्योति माता के प्रति हमारी अखंड आस्था का प्रतीक मानी जाती है। यह ज्योति इसलिए भी जलाई जाती है कि जिस प्रकार विपरीत परिस्थितियों में भी छोटा का दीपक अपनी लौ से अंधेरे को दूर भगाता रहता है। उसी प्रकार हम भी माता की आस्था का सहारा लेकर अपने जीवन के अंधकार को दूर कर सकते हैं। मान्यता के अनुसार दीपक या अग्नि के समक्ष किए गए जप का साधक को हजार गुना फल प्राप्त होता है।

कहा जाता है

दीपम घृत युतम दक्षे,तेल युत: वामत:
यानी घी युक्त ज्योति देवी के दाहिनी ओर व तेल युक्त ज्योति देवी के बाई ओर रखनी चाहिए। अखंड ज्योति पूरे नौ दिनों तक अखंड रहनी चाहिए।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-JMJ-SAS-why-navratri-tredition-of-flame-5141200-NOR.html

Tuesday, April 5, 2016

सरस्वती को ही ज्ञान की देवी क्यों माना जाता है?


मां सरस्वती विद्या, संगीत और बुद्धि की देवी मानी गई हैं। सरस्वती सारे संशयों का निवारण करने वाली और बोधस्वरूपिणी हैं। इनकी उपासना से सब प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती हैं। ये संगीतशास्त्र की भी अधिष्ठात्री देवी है। ताल, स्वर, लय, राग-रागिनी आदि इन्ही की दी गई मानी जाती हैं।सात प्रकार के सुरों से इनका स्मरण किया जाता है। इसलिए ये स्वरात्मिका कहलाती हैं। सप्तविध स्वरों का ज्ञान देने के कारण ही इनका नाम सरस्वती है। वीणावादिनी सरस्वती ने संगीतमय जीवन जीने की प्रेरणा है। वीणा बजाने से शरीर एकदम स्थिर हो जाता है। इसमें शरीर का हर अंग समाधि अवस्था को प्राप्त हो जाता है। सामवेद के सारे विधि-विधान केवल वीणा के स्वरों पर बने हुए हैं।
सरस्वती के सभी अंग सफेद हैं, जिसका तात्पर्य यह है कि सरस्वती सत्वगुणी प्रतिभा स्वरूप है। देवी भागवत के अनुसार सरस्वती को ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनो पूजते हैं। कमल गतिशीलता का प्रतीक है। यह निरपेक्ष जीवन जीने की प्रेरणा देता है। हाथ में पुस्तक सभी कुछ जान लेने, सभी कुछ समझ लेने की सीख देती है। लेखक कवि, संगीतकार सभी सरस्वती की प्रथम वंदना करते हैं। उनका विश्वास है कि इससे उनके भीतर रचना की ऊर्जा शक्ति पैदा होती है। इसके अलावा मां सरस्वती देवी की पूजा से रोग, शोक, चिंताएं और मन का संचित विकार भी दूर होते हैं।

इस तरह वीणाधारिणी मां सरस्वती की पूजा आराधना में मानव कल्याण का समय जीवनदर्शन के लिए है। याज्ञवल्क्य वाणी स्तोत्र, वशिष्ठ स्तोत्र आदि में सरस्वती की पूजा व उपासना का वर्णन है। एक दृष्टांत के अनुसार कुंभकर्ण की तपस्या से संतुष्ट होकर ब्रह्मा उसे वरदान देने पहुंचे, तो उन्होंने सोचा कि यह दुष्ट कुछ भी न करें, केवल बैठकर भोजन ही करे, तो यह संसार उजड़ जाएगा। इसलिए उन्होंने सरस्वती को बुलाया सारद प्रेरितासुमति फेरी। मागेसि नींद मास षट् केरी। यह कहकर उसकी बुद्धि विकृत करा दी। परिणाम यह हुआ कि वह छह माह की नींद मांग बैठा। इस तरह कुंभकर्ण में सरस्वती का प्रवेश उसकी मौत का कारण बना।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-JMJ-SAS-why-is-considered-the-goddess-of-knowledge-saraswati-5109312-NOR.html

Monday, April 4, 2016

अंधेरा नहीं रखना चाहिए शाम के समय घर में


आपने बड़े-बुजुर्गो को अक्सर कहते सुना होगा कि शाम के समय घर में अंधेरा नहीं रखना चाहिए, क्योंकि सूर्यास्त का समय या संध्या का समय शास्त्रों के अनुसार भगवान की आराधना का समय माना गया है। हिंदू धर्म ग्रथों में भी संध्या पूजन का विशेष महत्व बताया गया है। साथ ही, संध्या के समय घर में दीपक लगाना या प्रकाश करना भी आवश्यक माना जाता है। संध्या का शाब्दिक अर्थ संधि का समय है यानि जहां दिन का समापन और रात शुरू होती है, उसे संधिकाल कहा जाता है। ज्योतिष के अनुसार दिनमान को तीन भागों में बांटा गया है- प्रात:काल, मध्याह्नï और सायंकाल।
संध्या पूजन के लिए प्रात:काल का समय सूर्योदय से छह घटी तक, मध्याह्न 12 घटी तक व सायंकाल 20 घटी तक रहता है। एक घटी में 24 मिनट होते हैं। प्रात:काल में तारों के रहते हुए, मध्याह्नï में जब सूर्य मध्य में हो व सायं सूर्यास्त के पहले संध्या करना चाहिए। संध्या से तात्पर्य पूजा या भगवान को याद करने से हैं शास्त्रों की मान्यता है कि नियमपूर्वक संध्या करने से पाप रहित होकर ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है।

रात या दिन में हम से जाने अनजाने जो बुरे काम हो जाते हैं, वे त्रिकाल संध्या से नष्ट हो जाते है। घर में संध्या के दीपक जलाना या प्रकाश रखना आवश्यक माना गया है क्योंकि घर में शाम के समय अंधेरा रखने पर नकारात्मक ऊर्जा का स्थाई निवास होता है। घर में बरकत नहीं रहती और घर में अलक्ष्मी का वास होता है। इसलिए शाम को घर में अंधेरा नहीं रखना चाहिए।

Sunday, April 3, 2016

मंत्र जाप करने वाली माला में 108 मोती ही क्यों?


भगवान का मंत्र जाप करने के लिये हमें माला की आवश्‍यकता पड़ती है, लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि मंत्र जाप करने की माला में 108 दाने ही क्‍यों होते हैं? इसके पीछे कई धार्मिक और वैज्ञानिक कारण छिपे हुए हैं, जिसके बारे में बहुत ही कम लोग जानते हैं।
कहते हैं कि बिना माला के मंत्र जाप का कोई फल प्राप्‍त नहीं होता। हमारे शास्‍त्रों के अनुसार, माला के बिना किया गया जप संख्‍याहीन होता है और ऐसे जप का पूरा फल प्राप्‍त नहीं हो पाता। इसलिए मंत्र जप करते समय माला का उपयोग अवश्य करना चाहिए।
इसी तरह दूसरी मान्‍यता के अनुसार, माला के 108 मोती और सूर्य की कलाओं का संबंध है। एक वर्ष में सूर्य लगभग 216000 कलाएं बदलता है। सूर्य वर्ष में दो बार अपनी स्थिति भी बदलता है। इस तरह सूर्य छह माह की एक स्थिति में 108000 बार कलाएं बदलता है। इसी संख्या 108000 से अंतिम तीन शून्य हटा कर माला के 108 मोती निर्धारित किए गए हैं। माला का हर एक मोती सूर्य की हर एक कला का प्रतीक है। सूर्य ही एकमात्र साक्षात दिखने वाले भगवान हैं। भगवान सूर्य मनुष्य को तेजस्वी बनाते हैं और समाज में मान-सम्मान दिलाते हैं।
ज्योतिष के अनुसार, ब्रह्मांड को 12 भागों में विभाजित किया गया है। इन 12 राशियों में 9 ग्रह सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु घूमते रहते हैं। अगर ग्रहों की संख्या 9 और राशियों की संख्या 12 का गुणा किया जाए तो संख्या 108 मिलती है। इसलिए 108 मोतियों की माला पूरे ब्रह्मांड का प्रतीक मानी जाती है।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-JMJ-GYVG-why-there-is-108-moti-in-jap-mala-in-hindi-5111386-NOR.html

Thursday, March 31, 2016

पूजन के बाद सेवन करना चाहिए इस जल का


किसी भी पूजन कर्म में आरती के बाद चरणामृत दिया जाता है। चरणामृत शब्द का अर्थ है भगवान के चरणों से प्राप्त अमृत। इसे बहुत ही पवित्र माना जाता है तथा मस्तक से लगाने के बाद इसका सेवन किया जाता है। चरणामृत का सेवन अमृत के समान माना गया है। यहां जानिए चरणामृत से जुड़ी खास बातें...
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के अनुसार जब श्रीराम, सीता और लक्ष्मण ने अयोध्या से वनवास के प्रस्थान किया उस दौरान उनकी भेंट एक केवट से हुई। केवट ने श्रीराम, सीता और लक्ष्मण को अपनी नाव में बैठाकर गंगा नदी पार करवाई थी। उस केवट ने कहा था कि...

पद पखारि जलुपान करि आपु सहित परिवार।
पितर पारु प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार।।

अर्थात् भगवान श्रीराम के चरण धोकर उसे चरणामृत के रूप में स्वीकार कर केवट न केवल स्वयं भव-बाधा से पार हो गया, बल्कि उसने अपने पूर्वजों को भी तार दिया।
चरणामृत का महत्व सिर्फ धार्मिक ही नहीं, वैज्ञानिक भी है। चरणामृत का जल तांबे के पात्र में रखा जाता है। आयुर्वेद के अनुसार तांबे के बर्तन में रखे पानी का सेवन करने से अनेक रोग नष्ट हो सकते हैं। इस जल का सेवन करने से शरीर में रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है। इस जल में तुलसी के पत्ते डालने की परंपरा भी है, जिससे चरणामृत की रोगनाशक क्षमता और भी बढ़ जाती है। ऐसा माना जाता है कि चरणामृत स्मरण शक्ति को बढ़ाता है।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-JKR-DMV-importance-of-charnamrit-4948700-NOR.html