Wednesday, September 14, 2016

पंचक


पंचक के दौरान किसी को पैसा उधार न दें और न बिजनेस में कोई रिस्क न लें। शेयर व वायदा बाजार में कोई
बड़ा सौदा न करें तो बेहतर रहेगा। पंचक कितने प्रकार का होता है और इसमें कौन से 5 काम नहीं करने चाहिए,
ये हैं पंचक के प्रकार
1.
रोग पंचक
रविवार को शुरू होने वाला पंचक रोग पंचक कहलाता है। इसके प्रभाव से ये पांच दिन शारीरिक और मानसिक परेशानियों वाले होते हैं। इस पंचक में किसी भी तरह के शुभ काम नहीं करने चाहिए। हर तरह के मांगलिक कार्यों में ये पंचक अशुभ माना गया है।
2. राज पंचक
सोमवार को शुरू होने वाला पंचक राज पंचक कहलाता है। ये पंचक शुभ माना जाता है। इसके प्रभाव से इन पांच दिनों में सरकारी कामों में सफलता मिलती है। राज पंचक में संपत्ति से जुड़े काम करना भी शुभ रहता है।
3. अग्नि पंचक
मंगलवार को शुरू होने वाला पंचक अग्नि पंचक कहलाता है। इन पांच दिनों में कोर्ट कचहरी और विवाद आदि के फैसले, अपना हक प्राप्त करने वाले काम किए जा सकते हैं। इस पंचक में अग्नि का भय होता है। इस पंचक में किसी भी तरह का निर्माण कार्य, औजार और मशीनरी कामों की शुरुआत करना अशुभ माना गया है। इनसे नुकसान हो सकता है।
4. मृत्यु पंचक
शनिवार को शुरू होने वाला पंचक मृत्यु पंचक कहलाता है। नाम से ही पता चलता है कि अशुभ दिन से शुरू होने वाला ये पंचक मृत्यु के बराबर परेशानी देने वाला होता है। इन पांच दिनों में किसी भी तरह के जोखिम भरे काम नहीं करना चाहिए। इसके प्रभाव से विवाद, चोट, दुर्घटना आदि होने का खतरा रहता है।
5. चोर पंचक
शुक्रवार को शुरू होने वाला पंचक चोर पंचक कहलाता है। विद्वानों के अनुसार, इस पंचक में यात्रा करने की मनाही है। इस पंचक में लेन-देन, व्यापार और किसी भी तरह के सौदे भी नहीं करने चाहिए। मना किए गए कार्य करने से धन हानि हो सकती है।
6.इसके अलावा बुधवार और गुरुवार को शुरू होने वाले पंचक में ऊपर दी गई बातों का पालन करना जरूरी नहीं माना गया है। इन दो दिनों में शुरू होने वाले दिनों में पंचक के पांच कामों के अलावा किसी भी तरह के शुभ काम किए जा सकते हैं।
पंचक में न करें ये 5 काम
1.पंचक में चारपाई बनवाना भी अच्छा नहीं माना जाता। विद्वानों के अनुसार ऐसा करने से कोई बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।
2. पंचक के दौरान जिस समय घनिष्ठा नक्षत्र हो उस समय घास, लकड़ी आदि जलने वाली वस्तुएं इकट्ठी नहीं करना चाहिए, इससे आग लगने का भय रहता है।
3. पंचक के दौरान दक्षिण दिशा में यात्रा नही करनी चाहिए, क्योंकि दक्षिण दिशा, यम की दिशा मानी गई है। इन नक्षत्रों में दक्षिण दिशा की यात्रा करना हानिकारक माना गया है।
4. पंचक के दौरान जब रेवती नक्षत्र चल रहा हो, उस समय घर की छत नहीं बनाना चाहिए, ऐसा विद्वानों का कहना है। इससे धन हानि और घर में क्लेश होता है।
5. पंचक में शव का अंतिम संस्कार करने से पहले किसी योग्य पंडित की सलाह अवश्य लेनी चाहिए। यदि ऐसा न हो पाए तो शव के साथ पांच पुतले आटे या कुश (एक प्रकार की घास) से बनाकर अर्थी पर रखना चाहिए और इन पांचों का भी शव की तरह पूर्ण विधि-विधान से अंतिम संस्कार करना चाहिए, तो पंचक दोष समाप्त हो जाता है। ऐसा गरुड़ पुराण में लिखा है।
ये शुभ कार्य कर सकते हैं पंचक में
उज्जैन के ज्योतिषी पं. विनय भट्ट के अनुसार, पंचक में आने वाले नक्षत्रों में शुभ कार्य हो सकते हैं। पंचक में आने वाला उत्तराभाद्रपद नक्षत्र वार के साथ मिलकर सर्वार्थसिद्धि योग बनाता है, वहीं धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद व रेवती नक्षत्र यात्रा, व्यापार, मुंडन आदि शुभ कार्यों में श्रेष्ठ माने गए हैं।
पं. भट्ट के अनुसार, पंचक को भले ही अशुभ माना जाता है, लेकिन इस दौरान सगाई, विवाह आदि शुभ कार्य भी किए जाते हैं। पंचक में आने वाले तीन नक्षत्र पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद व रेवती रविवार को होने से आनंद आदि 28 योगों में से 3 शुभ योग बनाते हैं, ये शुभ योग इस प्रकार हैं- चर, स्थिर व प्रवर्ध। इन शुभ योगों से सफलता व धन लाभ का विचार किया जाता है।
मुहूर्त चिंतामणि ग्रंथ के अनुसार पंचक के नक्षत्रों का शुभ फल
1. घनिष्ठा और शतभिषा नक्षत्र चल संज्ञक माने जाते हैं। इनमें चलित काम करना शुभ माना गया है जैसे- यात्रा करना, वाहन खरीदना, मशीनरी संबंधित काम शुरू करना शुभ माना गया है।
2. उत्तराभाद्रपद नक्षत्र स्थिर संज्ञक नक्षत्र माना गया है। इसमें स्थिरता वाले काम करने चाहिए जैसे- बीज बोना, गृह प्रवेश, शांति पूजन और जमीन से जुड़े स्थिर कार्य करने में सफलता मिलती है।
3. रेवती नक्षत्र मैत्री संज्ञक होने से इस नक्षत्र में कपड़े, व्यापार से संबंधित सौदे करना, किसी विवाद का निपटारा करना, गहने खरीदना आदि काम शुभ माने गए हैं।
ऐसा होता है पंचक के नक्षत्रों का अशुभ प्रभाव
1. धनिष्ठा नक्षत्र में आग लगने का भय रहता है।
2.
शतभिषा नक्षत्र में वाद-विवाद होने के योग बनते हैं।
3.
पूर्वाभाद्रपद रोग कारक नक्षत्र है यानी इस नक्षत्र में बीमारी होने की संभावना सबसे अधिक होती है।
4.
उत्तरा भाद्रपद में धन हानि के योग बनते हैं।
5.
रेवती नक्षत्र में नुकसान व मानसिक तनाव होने की संभावना होती है।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-JYO-RAN-panchak-start-from-tonight-14-september-news-hindi-5415961-PHO.html

Tuesday, September 13, 2016

रणथंभौर गणेश मंदिर: यहां गणेशजी को चिट्ठी भेजने से खत्म हो जाती हैं परेशानियां

हिंदू धर्म में कोई भी शुभ काम करने से पहले भगवान गणेश की पूजा अच्छा शकुन माना जाता है, लेकिन हमारे देश में एक मंदिर ऐसा भी है जहां भगवान को हर शुभ काम से पहले चिट्ठी भेजकर निमंत्रित किया जाता है। इस गणेश मंदिर में हर समय भगवान के चरणों में चिठ्ठियों और निमंत्रण पत्रों का ढेर लगा रहता है। राजस्थान के सवाई माधौपुर से लगभग 10 कि.मी. की दूरी पर रणथंभौर के किले में बना यह गणेश मंदिर अपनी इस बात के लिए प्रसिद्ध है। यहां के लोग घर में कोई भी मांगलिक कार्यक्रम हो तो रणथंभौर वाले गणेश जी के नाम कार्ड भेजना नहीं भूलते।
ऐसे हुई थी मंदिर की स्थापना
ये मंदिर 10वीं सदी में रणथंभौर के राजा हमीर ने बनवाया था। युद्ध के दौरान राजा के सपने में गणेश जी आए और उन्हें आशीर्वाद दिया। राजा की युद्ध में विजय हुई और उन्होंने किले में मंदिर का निर्माण करवाया।
ऐसी है भगवान गणेश की मूर्ति
यहां पर भगवान गणेश की जो मूर्ति है, उसमें भगवान की तीन आंखें हैं। यहां भगवान अपनी पत्नी रिद्धि और सिद्धि और अपने पुत्र शुभ-लाभ के साथ विराजित हैं। भगवान गणेश के वाहन मूषक (चूहा) भी मंदिर में है। गणेश चतुर्थी पर किले के मंदिर में भव्य समारोह मनाया जाता है और विशेष पूजा अर्चना की जाती है।
डाक से भगवान को भेजी जाती हैं चिठ्ठियां
यह देश के उन चंद मंदिरों में है जहां भगवान के नाम डाक आती है। देश के कई लोग अपने घर में होने वाले हर मांगलिक आयोजन का पहला कार्ड यहां भगवान गणेश जी नाम भेजते हैं। कार्ड पर पता लिखा जाता हैं- श्री गणेश जी, रणथंभौर का किला, जिला- सवाई माधौपुर (राजस्थान)। डाकिया भी इन चिट्ठियों को बड़े ही सम्मान से मंदिर में पहुंचा देता है। जहां पुजारी इस डाक को भगवान गणेश के चरणों में रख देते हैं। मान्याता है कि इस मंदिर में भगवान गणेश को निमंत्रण भेजने से सारे काम अच्छे से पूरे हो जाते हैं।
कैसे पहुंचें-
हवाई मार्ग-रणथंभौर से लगभग 150 कि.मी. की दूरी पर जयपुर एयरपोर्ट है। वहां तक हवाई मार्ग के आकर रेल या बस से रणथंभौर गणेश मंदिर पहुंच सकते हैं।
रेल मार्ग-रणथंभौर से लगभग 10 कि.मी. की दूरी पर सवाई माधोपुर रेल्वे स्टेशन है। वहां तक रेल से आकर सड़क मार्ग से रणथंभौर पहुंचा जा सकता है।
सड़क मार्ग- राजस्थान के लगभग सभी बड़े शहरों से रणथंभौर के लिए बसें चलती हैं।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-TID-ranthambore-ganesh-temple-rajasthan-in-hindi-news-hindi-5414629-PHO.html

Monday, September 12, 2016

कहानियां: जब वासुकि को हराकर पाताल के राजा बन गए श्रीगणेश

भगवान श्रीगणेश की कथाओं का वर्णन अनेक ग्रंथों में मिलता है। श्रीगणेश ने कई लीलाएं ऐसी की हैं, जो कृष्ण की लीलाओं से मिलती-जुलती हैं। इन लीलाओं का वर्णन मुद्गलपुराण, गणेशपुराण, शिवपुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है। आज हम आपको भगवान श्रीगणेश से जुड़ी कुछ ऐसी ही रोचक कथाएं बता रहे हैं, जिसके बारे में कम ही लोग जानते हैं। ये कथाएं इस प्रकार हैं-
कैसे पाताल लोक के राजा बने गणपति?
एक बार गणपति मुनि पुत्रों के साथ पाराशर ऋषि के आश्रम में खेल रहे थे। तभी वहां कुछ नाग कन्याएं आ गईं। नाग कन्याएं गणेश को आग्रह पूर्वक अपने लोक लेकर जाने लगी। गणपति भी उनका आग्रह ठुकरा नहीं सके और उनके साथ चले गए।
नाग लोक पहुंचने पर नाग कन्याओं ने उनका हर तरह से सत्कार किया। तभी नागराज वासुकि ने गणेश को देखा और उपहास के भाव से वे गणेश से बात करने लगे, उनके रूप का वर्णन करने लगे। गणेश को क्रोध आ गया। उन्होंने वासुकि के फन पर पैर रख दिया और उनके मुकुट को भी स्वयं पहन लिया।
वासुकि की दुर्दशा का समाचार सुन उनके बड़े भाई शेषनाग आ गए। उन्होंने गर्जना की कि किसने मेरे भाई के साथ इस तरह का व्यवहार किया है। जब गणेश सामने आए तो शेषनाग ने उन्हें पहचान कर उनका अभिवादन किया और उन्हें नागलोक यानी पाताल का राजा घोषित कर दिया।
किसने दिए गणपति को उनके हथियार?
एक बार शिव कैलाश त्यागकर वन में जाकर रहने लगे। एक दिन शिव से मिलने विश्वकर्मा आए। उस समय गणेश की आयु मात्र छह वर्ष थी। गणेश ने विश्वकर्मा से कहा कि मुझसे मिलने आए हो तो मेरे लिए क्या उपहार लेकर आए हो। विश्वकर्मा ने कहा कि भगवन मैं आपके लिए क्या उपहार ला सकता हूं। आप तो स्वयं सच्चिदानंद हो।
विश्वकर्मा ने गणपति का वंदन किया और उनके सामने भेंट स्वरुप कुछ वस्तुएं रखीं, जो उनके हाथ से बनी हुई थीं। ये वस्तुएं थीं एक तीखा अंकुश, पाश और पद्म। ये आयुध पाकर गणपति को बहुत प्रसन्नता हुई। इन आयुधों से सबसे पहले छह साल के गणेश ने अपने मित्रों के साथ खेलते हुए एक दैत्य वृकासुर का संहार किया था।
जब गणपति ने चुराया ऋषि गौतम की रसोई से भोजन
एक बार बाल गणेश अपने मित्र मुनि पुत्रों के साथ खेल रहे थे। खेलते-खेलते उन्हें भूख लगने लगी। पास ही गौतम ऋषि का आश्रम था। ऋषि गौतम ध्यान में थे और उनकी पत्नी अहिल्या रसोई में भोजन बना रही थीं। गणेश आश्रम में गए और अहिल्या का ध्यान बंटते ही रसोई से सारा भोजन चुराकर ले गए और अपने मित्रों के साथ खाने लगे। तब अहिल्या ने गौतम ऋषि का ध्यान भंग किया और बताया कि रसोई से भोजन गायब हो गया है।
ऋषि गौतम ने जंगल में जाकर देखा तो गणेश अपने मित्रों के साथ भोजन कर रहे थे। गौतम उन्हें पकड़कर माता पार्वती के पास ले गए। माता पार्वती ने चोरी की बात सुनी तो गणेश को एक कुटिया में ले जाकर बांध दिया। उन्हें बांधकर पार्वती कुटिया से बाहर आईं तो उन्हें आभास होने लगा जैसे गणेश उनकी गोद में हैं, लेकिन जब देखा तो गणेश कुटिया में बंधे दिखे। माता काम में लग गईं, उन्हें थोड़ी देर बाद फिर आभास होने लगा जैसे गणेश शिवगणों के साथ खेल रहे हैं।
उन्होंने कुटिया में जाकर देखा तो गणेश वहीं बंधे दिखे। अब माता को हर जगह गणेश दिखने लगे। कभी खेलते हुए, कभी भोजन करते हुए और कभी रोते हुए। माता ने परेशान होकर फिर कुटिया में देखा तो गणेश आम बच्चों की तरह रो रहे थे। वे रस्सी से छुटने का प्रयास कर रहे थे। माता को उन पर अधिक स्नेह आया और दयावश उन्हें मुक्त कर दिया।
जब गणपति ने किया सारे देवताओं को यज्ञ में निमंत्रित
एक बार भगवान शिव के मन में एक बड़े यज्ञ के अनुष्ठान का विचार आया। विचार आते ही वे शीघ्र यज्ञ प्रारंभ करने की तैयारियों में जुट गए। सारे गणों को यज्ञ अनुष्ठान की अलग-अलग जिम्मेदारियां सौंप दी गई। सबसे बड़ा काम था यज्ञ में सारे देवताओं को आमंत्रित करना। आमंत्रण भेजने के लिए पात्र व्यक्ति का चुनाव किया जाना था, जो समय रहते सभी लोकों में जाकर वहां के देवताओं को ससम्मान निमंत्रण दे आए। ऐसे में किसी ऐसे व्यक्ति का चयन किया जाना था, जो तेजी से जाकर ये काम कर दे, लेकिन भगवान शिव को ये भी डर था कि कहीं आमंत्रण देने की जल्दी में देवताओं का अपमान ना हो जाए। इसलिए उन्होंने इस काम के लिए गणेश का चयन किया। गणेश बुद्धि और विवेक के देवता हैं। वे जल्दबाजी में भी कोई गलती नहीं करेंगे, ये सोचकर शिव ने गणपति को बुलाया और उन्हें समस्त देवी-देवताओं को आमंत्रित करने का काम सौंपा। गणेश ने इस काम को सहर्ष स्वीकार किया, लेकिन उनके साथ समस्या यह थी कि उनका वाहन चूहा था, जो बहुत तेजी से चल नहीं सकता था। गणेश ने काफी देर तक चिंतन किया कि किस तरह सभी लोकों में जाकर आदरपूर्वक सारे देवताओं को यज्ञ में शामिल होने का आमंत्रण दिया जाए। बहुत विचार के बाद उन्होंने सारे आमंत्रण पत्र उठाए और पूजन सामग्री लेकर ध्यान में बैठे शिव के सामने बैठ गए।
गणेश ने विचार किया कि यह तो सत्य है कि सारे देवताओं का वास भगवान शिव में है। उनको प्रसन्न किया तो सारे देवता प्रसन्न हो जाएंगे। ये सोचकर गणेश ने शिव का पूजन किया और सारे देवताओं का आह्वान करके सभी आमंत्रण पत्र शिव को ही समर्पित कर दिए। सारे आमंत्रण देवताओं तक स्वत: पहुंच गए और सभी यज्ञ में नियत समय पर ही पहुंच गए। इस तरह गणेश ने एक मुश्किल काम को अपनी बुद्धिमानी से आसान कर दिया।
कैसे एकदंत हो गए भगवान गणेश?
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, भगवान विष्णु के अवतार परशुराम शिव के शिष्य थे। जिस फरसे से उन्होंने 17 बार क्षत्रियों को धरती से समाप्त किया था, वो अमोघ फरसा शिव ने ही उन्हें प्रदान किया था। 17 बार क्षत्रियों को हराने के बाद ब्राह्मण परशुराम शिव और पार्वती के दर्शन के लिए कैलाश पर्वत पर गए। उस समय भगवान शिव शयन कर रहे थे और पहरे पर स्वयं गणेश थे। गणेश ने परशुराम को रोक लिया। परशुराम को क्रोध बहुत जल्दी आता था।
वे रोके जाने पर गणेश से झगड़ने लगे। बात-बात में झगड़ा इतना बढ़ गया कि परशुराम ने गणेश को धक्का दे दिया। गिरते ही गणेश को भी क्रोध आ गया। परशुराम ब्राह्मण थे, सो गणेश उन पर प्रहार नहीं करना चाहते थे। उन्होंने परशुराम को अपनी सूंड से पकड़ लिया और चारों दिशाओं में गोल-गोल घूमा दिया। घूमते-घूमते ही गणेश ने परशुराम को अपने कृष्ण रूप के दर्शन भी करवा दिए। कुछ पल घुमाने के बाद गणेश ने उन्हें छोड़ दिया।
छोड़े जाने के थोड़ी देर तक तो परशुराम शांत रहे। बाद में परशुराम को अपने अपमान का आभास हुआ तो उन्होंने अपने फरसे से गणेश पर वार किया। फरसा शिव का दिया हुआ था सो गणेश उसके वार को विफल जाने नहीं देना चाहते थे, ये सोचकर उस वार को उन्होंने अपने एक दांत पर झेल लिया। फरसा लगते ही दांत टूटकर गिर गया। इस बीच कोलाहल सुन कर शिव भी शयन से बाहर आ गए और उन्होंने दोनों को शांत करवाया। तब से गणेश को एक ही दांत रह गया और वे एकदंत कहलाने लगे।
चतुर्थी को ही क्यों जन्मे भगवान श्रीगणेश
हर देवता के जन्म में जितना रहस्य है, उतना ही रहस्य उनके जन्म लेने वाले दिनों में भी है। भगवान गणेश का जन्म चतुर्थी तिथि को हुआ है, इसका रहस्य क्या है? क्यों भगवान गणेश ने अपने जन्म के लिए चतुर्थी तिथि को ही चुना।
भगवान गणपति का जन्म भादौ मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी को हुआ है। शुक्ल पक्ष की चतुर्थी अमावस्या के चार दिन बाद आती है। अमावस्या के बाद शुरुआत के तीन दिन अंधकार वाले होते है, क्योंकि उन तीन दिनों में चंद्रमा की कलाएं बहुत छोटी होती हैं। अंधेरा अज्ञान का प्रतीक है। भगवान घोषणा कर रहे हैं कि जीवन में प्रकाश ज्ञान से ही आ सकता है। चतुर्थी से पूर्णिमा तक चंद्रमा बहुत रोशनी फैलाता है।
भगवान गणेश बुद्धि के देवता हैं। बुद्धि का स्वभाव ज्ञानार्जन है। जो बुद्धि ज्ञान प्राप्ति में अग्रसर नहीं होती, वो कालांतर में क्षीण हो जाती है। इस संसार के चार रूप हैं, जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय। जागृत वो जिसमें प्राण का संचार है, स्वप्न अवस्था वो जिसका कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं है, सुषुप्ति अवस्था उसे कहते हैं जिसे ना जागृति होती है और ना ही निद्रा की अवस्था यानी की अद्र्धनिद्रा की अवस्था। एकमात्र तुरीय अवस्था को ही ज्ञान की अवस्था माना गया है।
इसलिए उन्होंने चतुर्थी का चयन किया है। भगवान ने चतुर्थी को जन्म लेकर ये घोषणा की है कि उनको पाना है तो ज्ञान के प्रकाश से पाया जा सकता है। अज्ञान, स्वप्न और अद्र्ध निद्रा की अवस्था में उनको पाना संभव नहीं है।
जब शनि ने देखा गणेश को...
वैसे तो गणेश की गज आकृति को लेकर सबसे ज्यादा सुनी-सुनाई जाने वाली कथा तो यही है कि पार्वती ने नहाने से पहले एक बालक की आकृति बनाकर उसमें प्राण डाल दिए और उसे पहरे पर बैठा दिया। जिसका सिर शिव ने काटा था और फिर पार्वती के क्रोध को शांत करने के लिए एक हाथी के बच्चे का सिर जोड़ दिया, लेकिन कुछ पुराणों में इसके अलग-अलग संदर्भ भी मिलते हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण में कथा कुछ अलग ही है।
कथा कुछ ऐसी है कि एक बार भगवान शिव के शिष्य शनि देव कैलाश पर्वत पर आए। उस समय शिव ध्यान में थे तो शनिदेव सीधे पार्वती के दर्शन के लिए पहुंच गए। तब पार्वती बालक गणेश के साथ बैठी थीं। बालक गणेश का मुख सुंदर और हर तरह के कष्ट को भुला देने वाला था। शनिदेव आंखें नीची किए पार्वती से बात करने लगे।
पार्वती ने देखा कि शनिदेव किसी को देख नहीं रहे हैं। वे लगातार अपनी निगाहें नीची किए हुए हैं। पार्वती ने शनिदेव से पूछा कि वे किसी को देख क्यों नहीं रहे हैं? क्या उनको कोई दृष्टिदोष हो गया है? शनिदेव ने कारण बताते हुए कहा कि उन्हें उनकी पत्नी ने शाप दिया है कि वो जिसे देखेंगे उसका विनाश हो जाएगा। पार्वती ने पूछा कि उनकी पत्नी ने ऐसा शाप क्यों दिया है तो शनिदेव कहने लगे कि मैं लगातार भगवान शिव के ध्यान में रहता हूं। एक बार में ध्यान में था और मेरी पत्नी ऋतुकाल से निवृत्त होकर मेरे समीप आई लेकिन ध्यान में होने के कारण मैंने उसकी ओर देखा नहीं।
उसने इसे अपना अपमान समझा और मुझे शाप दे दिया कि मैं जिसकी ओर देखूंगा, उसका विनाश हो जाएगा। ये बात सुन कर पार्वती ने कहा कि आप मेरे पुत्र गणेश की ओर देखिए, उसके मुख का तेज समस्त कष्टों को हरने वाला है। शनिदेव गणेश पर दृष्टि डालना नहीं चाहते थे लेकिन वे माता पार्वती के आदेश की अवहेलना भी नहीं कर सकते थे, सो उन्होंने तिरछी निगाह थे गणेश की ओर धीरे से देखा। शनि देव की दृष्टि पड़ते ही बालक गणेश का सिर धड़ से कटकर नीचे गिर गया।
तभी भगवान विष्णु एक गजबालक का सिर लेकर पहुंचे और गणेश के सिर पर उसे स्थापित कर दिया।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-JKR-DHAJ-ganesh-festival-stores-of-lord-ganesh-news-hindi-5413971-PHO.html

Saturday, September 10, 2016

श्रीगणेश को क्यों कहते हैं मैनेजमेंट गुरु, जानिए इन 7 बातों से

इन दिनों गणेशोत्सव चल रहा है। भगवान श्रीगणेश के जन्म की कथा जितनी रोचक है, उनके शरीर की बनावट भी उतनी ही रहस्यमयी है। इसके अलावा भी श्रीगणेश से जुड़ी कई ऐसी बातें हैं, जो बच्चों के लिए जिज्ञासा का विषय है जैसे- श्रीगणेश को दूर्वा क्यों चढ़ाते हैं या श्रीगणेश को मोदक का भोग क्यों लगाया जाता है? आज हम बच्चों की जिज्ञासा दूर करने के लिए श्रीगणेश से जुड़ा कुछ ऐसी ही परंपराओं व रोचक सवालों के जवाब आपको बता रहे हैं। इन जवाबों में लाइफ मैनेजमेंट के कर्इं सूत्र भी छिपे हैं, जो बच्चों के भावी जीवन के लिए उपयोगी साबित होंगे-
1. श्रीगणेश का मस्तक हाथी का क्यों है?
कथा- शिवपुराण के अनुसार माता पार्वती ने अपने मैल से एक बालक की रचना की तथा उसमें प्राण डाल दिए। पार्वती ने उस बालक को अपना पुत्र बनाकर कहा कि मेरी आज्ञा के बिना कोई भी अंदर न आने पाए। जब भगवान शिव अपनी पत्नी पार्वती से मिलने जाने लगे तो उस बालक ने उन्हें रोक दिया। बहुत समझाने पर भी जब वह बालक नहीं माना तो शिवजी ने अपने त्रिशूल से उस बालक का मस्तक काट दिया।
जब माता पार्वती को यह पता चला तो वह बहुत क्रोधित हो गईं। माता पार्वती को शांत करने के लिए विष्णुजी एक गजबालक का सिर काटकर लाए और उस बालक के धड़ से जोड़ कर उसे पुनर्जीवित कर दिया। भगवान शिव ने उस बालक को अपने गणों का प्रधान नियुक्त कर दिया। गणों का ईश होने के कारण ही उस बालक का नाम गणेश पड़ा।
लाइफ मैनेजमेंट
भगवान गणेश गजमुख है जिस पर हाथी जैसे कान सूप जैसे हैं। जिनका मतलब है कि बातें सबकी सुनो, लेकिन उनका सार ही ग्रहण करो। ठीक उसी तरह जिस तरह सूप छिलके बाहर फेंककर सिर्फ अन्न को ही अपने पास रखता है। इसी तरह श्री गणेश की छोटी आंखें मानव को जीवन में सूक्ष्म दृष्टि रखने की प्रेरणा देती हैं। उनकी बड़ी नाक (सूंड) दूर तक सूंघने में समर्थ है, जो उनकी दूरदर्शिता को बताती है जिसका अर्थ है कि उन्हें हर बात का ज्ञान है।

 2. श्रीगणेश का एक दांत टूटा हुआ क्यों है?
कथा- ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, एक बार परशुराम जब भगवान शिव के दर्शन करने कैलाश पहुंचे तो भगवान ध्यान में थे। तब श्रीगणेश ने परशुरामजी को भगवान शिव से मिलने नहीं दिया। इस बात से क्रोधित होकर परशुरामजी ने फरसे से श्रीगणेश पर वार कर दिया। वह फरसा स्वयं भगवान शिव ने परशुराम को दिया था। श्रीगणेश उस फरसे का वार खाली नहीं होने देना चाहते थे। इसलिए उन्होंने उस फरसे का वार अपने दांत पर झेल लिया, जिसके कारण उनका एक दांत टूट गया। तभी से उन्हें एकदंत भी कहा जाता है।
लाइफ मैनेजमेंट
श्री गणेश के दो दांत हैं एक पूर्ण व दूसरा अपूर्ण। पूर्ण दांत श्रद्धा का प्रतीक है तथा टूटा हुआ दांत बुद्धि का। वह मनुष्य को यह प्रेरणा देते हैं कि जीवन में बुद्धि कम होगी तो चलेगा, लेकिन ईश्वर के प्रति पूरा विश्वास रखना चाहिए।
3. श्रीगणेश का पेट बड़ा क्यों है?
कथा- जब कार्तिकेय ने तारकासुर को मार दिया तो दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने मोहासुर नाम के दैत्य को संस्कार देकर देवताओं के खिलाफ खड़ा कर दिया। मोहासुर से मुक्ति के लिए देवताओं ने गणेश की उपासना की। तब गणेश ने महोदर अवतार लिया। महोदर का उदर यानी पेट बहुत बड़ा था। वे मूषक पर सवार होकर मोहासुर के नगर में पहुंचे तो मोहासुर ने बिना युद्ध किये ही गणपति को अपना इष्ट बना लिया।
लाइफ मैनेजमेंट
भगवान गणेश का बड़ा पेट यह बताता है कि पेट गागर की तरह छोटा नहीं अपितु सागर की तरह विशाल होना चाहिए, जिसमें अच्छी-बुरी सभी बातों को शामिल करने की शक्ति हो।
4. श्रीगणेश का वाहन चूहा क्यों है?
कथा- ग्रंथों के अनुसार, गजमुखासुर नामक एक दैत्य था। वह सत्पुरुषों का कष्ट देता था। एक बार उसका युद्ध भगवान श्रीगणेश से हुआ। श्रीगणेश ने उस दैत्य को परास्त कर दिया। श्रीगणेश से घबराकर वह दैत्य चूहा बनकर भागने लगा तभी गणेशजी ने उसे पकड़ लिया और अपना वाहन बना लिया। तभी से श्रीगणेश का वाहन मूषक उनके स्वरूप के साथ सदा के लिए जुड़ गया।
लाइफ मैनेजमेंट
चूहे की प्रवृत्ति होती है कुतरने की। अत: इसे कुतर्क का प्रतीक माना जाता है। गणेश बुद्धि के देवता हैं। संदेश है कि बुद्धि की वृद्धि के लिए कुतर्क को काबू में रखना चाहिए। कुतर्कों से व्यक्ति भ्रमित हो जाता है। जीवन में वह अपने लक्ष्य से भटक जाता है। जिस तरह चूहा कुतर-कुतर कर उपयोगी वस्तुओं को बेकार कर देता है वैसे ही कुतर्कों से विवेक नष्ट हो सकता है। ऐसे कुतर्कों पर सवार होने का तात्पर्य है कुतर्कां पर काबू करना।
5. श्रीगणेश को क्यों चढ़ाते हैं दूर्वा?
कथा- पुराणों में कथा है कि पृथ्वी पर अनलासुर राक्षस के उत्पात से त्रस्त ऋषि-मुनियों ने इंद्र से रक्षा की प्रार्थना की। तब इंद्र और अनलासुर में भयंकर युद्ध हुआ, लेकिन इंद्र भी उसे परास्त न कर सके। तब सभी देवतागण एकत्रित होकर भगवान शिव के पास गए तथा अनलासुर का वध करने का अनुरोध किया। तब शिव ने कहा इसका नाश सिर्फ श्रीगणेश ही कर सकते हैं। तब सभी देवताओं ने भगवान गणेश की स्तुति की, जिससे प्रसन्न होकर श्रीगणेश ने अनलासुर को निगल लिया। अनलासुर को निगलने के कारण गणेशजी के पेट में जलन होने लगी, तब ऋषि कश्यप ने 21 दूर्वा की गांठ उन्हें खिलाई और इससे उनकी पेट की ज्वाला शांत हुई। इसी मान्यता के चलते श्रीगणेश को दूर्वा अर्पित की जाती है।
लाइफ मैनेजमेंट
दूर्वा जिसे आम भाषा में दूब भी कहते हैं, एक प्रकार ही घास है। इसकी विशेषता है कि इसकी जड़ें जमीन में बहुत गहरे (लगभग 6 फीट तक) उतर जाती हैं। विपरीत परिस्थिति में यह अपना अस्तित्व बखूबी बचाए रखती हैं। इसलिए दूर्वा गहनता और पवित्रता की प्रतीक है। इसे देखते ही मन में ताजगी और प्रफुल्लता का अनुभव होता है। हमारे जीवन में दूर्वा के कई उपयोग हैं। दूर्वा को शीतल और रेचक (राहत पहुंचाने वाला) माना जाता है। दूर्वा के कोमल अंकुरों के रस में जीवनदायिनी शक्ति होती है। प्रात:काल सूर्योदय से पहले दूब पर जमी ओंस की बूंदों पर नंगे पैर घूमने से नेत्र ज्योति बढ़ती है।
6. गणेश चतुर्थी की रात चंद्रमा के दर्शन क्यों नहीं करते?
कथा- भगवान श्रीगणेश को जब हाथी (गज) का मुख लगाया गया तो वे गजवदन कहलाए। सभी देवताओं ने उनकी स्तुति की पर चंद्रमा मंद-मंद मुस्कुराता रहा। उसे अपने सौंदर्य पर अभिमान था। गणेशजी समझ गए कि चंद्रमा अभिमानवश उनका उपहास कर रहा है। क्रोध में आकर श्रीगणेश ने चंद्रमा को श्राप दे दिया कि- आज से तुम काले हो जाओगे। तब चंद्रमा को अपनी भूल का अहसास हुआ। उसने श्रीगणेश से क्षमा मांगी। तब गणेशजी ने कहा कि सूर्य के प्रकाश को पाकर तुम एक दिन पूर्ण होओगे यानी पूर्ण प्रकाशित होंगे।
लेकिन आज का यह दिन तुम्हें दंड देने के लिए हमेशा याद किया जाएगा। इस दिन को याद कर कोई अन्य व्यक्ति अपने सौंदर्य पर अभिमान नहीं करेगा। जो कोई व्यक्ति आज यानी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन तुम्हारे दर्शन करेगा, उस पर झूठा आरोप लगेगा। इसीलिए भाद्रपद माह की शुक्ल चतुर्थी को चंद्र दर्शन नहीं किया जाता।
लाइफ मैनेजमेंट
शारीरिक बनावट, चाल-ढाल या व्यक्तित्व के आधार पर किसी व्यक्ति का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए। संभव है वह व्यक्ति गुणों के आधार पर आपसे कहीं बेहतर हो। साथ ही मनुष्य को कभी भी किसी भी बात का घमंड नहीं करना चाहिए क्योंकि घमंड के कारण व्यक्ति के अनेक कष्ट झेलने पड़ते हैं। इसलिए कभी भी किसी भी तरह से अभिमान नहीं करना चाहिए। अभिमानी व्यक्ति का पतन एक दिन अवश्य होता है।
7. श्रीगणेश को क्यों चढ़ाते हैं मोदक?
वैसे तो किसी भी धर्म ग्रंथ में भगवान श्रीगणेश को मोदक का भोग लगाने के संबंध में कोई कथा या किवदंती नहीं मिलती, लेकिन इसके पीछे लाइफ मैनेजमेंट के सूत्र अवश्य छिपे हैं।
लाइफ मैनेजमेंट
मोदक यानी जो मोद (आनन्द) देता है, जिससे आनन्द प्राप्त हो, संतोष हो, इसका गहरा अर्थ यह है कि तन का आहार हो या मन के विचार वह सात्विक और शुद्ध होना जरुरी है। तभी आप जीवन का वास्तविक आनंद पा सकते हैं। मोदक ज्ञान का प्रतीक है। जैसे मोदक को थोड़ा-थोड़ा और धीरे-धीरे खाने पर उसका स्वाद और मिठास अधिक आनंद देती है और अंत में मोदक खत्म होने पर आप तृप्त हो जाते हैं, उसी तरह वैसे ही ऊपरी और बाहरी ज्ञान व्यक्ति को आनंद नही देता परंतु ज्ञान की गहराई में सुख और सफलता की मिठास छुपी होती है। इस प्रकार जो अपने कर्म के फलरूपी मोदक प्रभु के हाथ में रख देता है उसे प्रभु आशीर्वाद देते हैं।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-JKR-DHAJ-life-management-formulas-of-lord-ganesh-news-hindi-5413140-PHO.html