Friday, September 9, 2016

कितने गण हैं श्रीगणेश के, क्या हैं उनके नाम?

श्री गणेश मंत्र ऊँ वक्रतुण्ड़ महाकाय सूर्य कोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरू मे देव, सर्व कार्येषु सर्वदा।।

भगवान गणेशजी का वर्णन ऋग्वेद के मंत्र (2-23-1) से मिलता है। चाहे कोई सा अनुष्ठान हो, इस मंत्र का जाप तो होता ही है-

ऊं गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम् ।
ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः श्रृण्वन्नूतिभिः सीदसादनम् ॥
इस मंत्र में ब्रह्मणस्पत शब्द आया है। यह बृहस्पति देव के लिए प्रयुक्त हुआ है। बृहस्पति देव बुद्धि और ज्ञान के देव हैं। इसलिए गणपति को भी बुद्धि और विवेक का देव माना गया है। किसी भी कार्य की सिद्धि बिना बुद्धि और विवेक के नहीं हो सकती। इसलिए हर कार्य की सिद्धि के लिए बृहस्पतिदेव के प्रतीकात्मक रूप में श्रीगणेश की पूजा होती है।
गणेश पुराण में गणेशजी के अनेकानेक रूप कहे गए हैं। सतयुग में कश्यप ऋषि पुत्र के रूप में वह विनायक हुए और सिंह पर सवार होकर देवातंक -निरांतक का वध किया। त्रेता में मयूरेश्वर के रूप में वह अवतरित हुए।
धर्म शास्त्रों में भगवान गणेश के 21 गण बताए गए हैं, जो इस प्रकार हैं- गजास्य, विघ्नराज, लंबोदर, शिवात्मज, वक्रतुंड, शूर्पकर्ण, कुब्ज, विनायक, विघ्ननाश, वामन, विकट, सर्वदैवत, सर्वातनाशी, विघ्नहर्ता, ध्रूमक, सर्वदेवाधिदेव, एकदंत, कृष्णपिंड्:ग, भालचंद्र, गणेश्वर और गणप। ये 21 गण हैं और गणेशजी की पूजा के भी 21 ही विधान हैं।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-JKR-DHAJ-know-about-lord-ganesh-s-gan-news-hindi-5412441-NOR.html

Thursday, September 8, 2016

गणेशजी की पीठ के दर्शन न करें? जानिए गणेशजी के स्वरूप की खास बातें

गणेश पूजा से जुड़ी कुछ ऐसी बातें हैं, जिनका ध्यान रखने से गणपति जल्दी प्रसन्न होते हैं। शास्त्रों के अनुसार गणेशजी के सभी अंगों पर जीवन और ब्रह्मांड से जुड़े खास अंग विराजमान हैं। गणेशजी की पीठ पर दरिद्रता यानी गरीबी निवास करती है। इसी वजह से इनकी पीठ के दर्शन वर्जित किए गए हैं। जो लोग उनकी पीठ के दर्शन करते हैं, उन्हें धन की कमी का सामना करना पड़ सकता है।

गणेशजी की सूंड पर धर्म विद्यमान है तो कानों पर ऋचाएं, दाएं हाथ में वर, बाएं हाथ में अन्न, पेट में समृद्धि, नाभी में ब्रह्मांड, आंखों में लक्ष्य, पैरों में सातों लोक और मस्तक में ब्रह्मलोक विद्यमान है। गणेशजी के सामने से दर्शन करने पर ये सभी सुख प्राप्त होते हैं।

गणेशजी की पीठ पर दरिद्रता का वास होता है। गणेशजी की पीठ के दर्शन करने वाला व्यक्ति यदि बहुत धनवान भी हो तो उसके घर पर दरिद्रता का प्रभाव बढ़ जाता है। इसी वजह से इनकी पीठ नहीं देखना चाहिए। जाने-अनजाने पीठ देख ले तो गणेशजी से क्षमा याचना कर उनका पूजन करना चाहिए। तब बुरा प्रभाव नष्ट हो जाता है।

गणेशजी को तुलसी नहीं चढ़ाना चाहिए। कथाओं के अनुसार तुलसी ने गणेशजी को और गणेशजी ने तुलसी को शाप दिया था। इसी शाप के कारण गणेशजी को तुलसी नहीं चढ़ाई जाती है।
घर में यदि गणेशजी की प्रतिमाएं रखनी हैं तो उनकी संख्या सम यानी 2, 4, 6 होनी चाहिए। शास्त्रों के अनुसार मूर्तियों की संख्या विषम यानी 1, 3, 5 नहीं होनी चाहिए।

शिवजी के साथ ही उनके पुत्र गणेशजी को भी केतकी के फूल न चढ़ाएं। मान्यता के अनुसार ब्रह्माजी ने एक झूठ बोला था, जिसमें केतकी ने साथ दिया था। तभी से शिव परिवार की पूजा में केतकी के फूल नहीं चढ़ाएं जाते हैं।

Wednesday, September 7, 2016

मोरयाई छठ पर करें सूर्यदेव की पूजा, चढ़ाएं लाल फूल

भाद्रपद मास शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मोरयाई छठ का व्रत रखा जाता है। इसे मोर छठ या कुछ स्थानों पर सूर्य षष्ठी व्रत भी कहते हैं। इस बार यह व्रत 7 सितंबर, बुधवार को है। भविष्योत्तर पुराण के अनुसार, प्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को भगवान सूर्य के निमित्त व्रत करना चाहिए। इनमें भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी का विशेष महत्व है। इस दिन गंगा स्नान, सूर्योपासना, जप एवं व्रत किया जाता है। इस दिन सूर्य पूजन, गंगा स्नान एवं दर्शन तथा पंचगव्य सेवन से अश्वमेध के समान फल प्राप्त होता है। इस दिन व्रत को अलोना (नमक रहित) भोजन दिन में एक बार ही ग्रहण करना चाहिए। सूर्य पूजा में लाल फूल, गुलाल, लाल कपड़ा, लाल रंग की मिठाई आदि का विशेष महत्व है।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-JKR-DHAJ-moryai-chhth-tomorrow-7-september-news-hindi-5410721-NOR.html
दोहा
कनक बदन कुंडल मकर, मुक्ता माला अंग।
पद्मासन स्थित ध्याइए, शंख चक्र के संग।।
चौपाई
जय सविता जय जयति दिवाकर, सहस्रांशु सप्ताश्व तिमिरहर।
भानु,पतंग, मरीची, भास्कर, सविता, हंस, सुनूर, विभाकर।
विवस्वान,आदित्य, विकर्तन, मार्तण्ड, हरिरूप, विरोचन।
अम्बरमणि,खग, रवि कहलाते, वेद हिरण्यगर्भ कह गाते।
सहस्रांशु,प्रद्योतन, कहि कहि, मुनिगन होत प्रसन्न मोदलहि।
अरुण सदृश सारथी मनोहर, हांकत हय साता चढ़‍ि रथ पर।
मंडल की महिमा अति न्यारी, तेज रूप केरी बलिहारी।
उच्चैश्रवा सदृश हय जोते, देखि पुरन्दर लज्जित होते।
मित्र,मरीचि, भानु, अरुण, भास्कर, सविता,
सूर्य,अर्क, खग, कलिहर, पूषा, रवि,
आदित्य,नाम लै, हिरण्यगर्भाय नमः कहिकै।
द्वादस नाम प्रेम सो गावैं, मस्तक बारह बार नवावै।
चार पदारथ सो जन पावै, दुख दारिद्र अघ पुंज नसावै।
नमस्कार को चमत्कार यह, विधि हरिहर कौ कृपासार यह।
सेवै भानु तुमहिं मन लाई, अष्टसिद्धि नवनिधि तेहिं पाई।
बारह नाम उच्चारन करते, सहस जनम के पातक टरते।
उपाख्यान जो करते तवजन, रिपु सों जमलहते सोतेहि छन।
छन सुत जुत परिवार बढ़तु है, प्रबलमोह को फंद कटतु है।
अर्क शीश को रक्षा करते, रवि ललाट पर नित्य बिहरते।
सूर्य नेत्र पर नित्य विराजत, कर्ण देश पर दिनकर छाजत।
भानु नासिका वास करहु नित, भास्कर करत सदा मुख कौ हित।
ओठ रहैं पर्जन्य हमारे, रसना बीच तीक्ष्ण बस प्यारे।
कंठ सुवर्ण रेत की शोभा, तिग्मतेजसः कांधे लोभा।
पूषा बाहु मित्र पीठहिं पर, त्वष्टा-वरुण रहम सुउष्णकर।
युगल हाथ पर रक्षा कारन, भानुमान उरसर्मं सुउदरचन।
बसत नाभि आदित्य मनोहर, कटि मंह हंस, रहत मन मुदभर।
जंघा गोपति,सविता बासा, गुप्त दिवाकर करत हुलासा।
विवस्वान पद की रखवारी, बाहर बसते नित तम हारी।
सहस्रांशु,सर्वांग सम्हारै, रक्षा कवच विचित्र विचारे।
अस जोजजन अपने न माहीं, भय जग बीज करहुं तेहि नाहीं।
दरिद्र कुष्ट तेहिं कबहुं न व्यापै, जोजन याको मन मंह जापै।
अंधकार जग का जो हरता, नव प्रकाश से आनन्द भरता।
ग्रह गन ग्रसि न मिटावत जाही, कोटि बार मैं प्रनवौं ताही।
मन्द सदृश सुतजग में जाके, धर्मराज सम अद्भुत बांके।
धन्य-धन्य तुम दिनमनि देवा, किया करत सुरमुनि नर सेवा।
भक्ति भावयुत पूर्ण नियम सों, दूर हटत सो भव के भ्रम सों।
परम धन्य सो नर तनधारी, हैं प्रसन्न जेहि पर तम हारी।
अरुण माघ महं सूर्य फाल्गुन, मध वेदांगनाम रवि उदय।
भानु उदय वैसाख गिनावै, ज्येष्ठ इन्द्र आषाढ़ रवि गावै।
यम भादों आश्विन हिमरेता, कातिक होत दिवाकर नेता।
अगहन भिन्न विष्णु हैं पूसहिं, पुरुष नाम रवि हैं मलमासहिं।
दोहा
भानु चालीसा प्रेम युत, गावहिं जे नर नित्य।
सुख सम्पत्ति लहै विविध, होंहि सदा कृतकृत्य।।

Tuesday, September 6, 2016

गणेश चतुर्थी की रात चंद्रमा के दर्शन नहीं करने चाहिए।

गणेश चतुर्थी की रात चंद्रमा के दर्शन नहीं करने चाहिए। इस रात चंद्रमा को देखने से झूठे आरोप लगने का भय रहता है। यदि चंद्र दर्शन हो जाएं तो इस मंत्र का जाप करना चाहिए-
मंत्र

सिंह: प्रसेन मण्वधीत्सिंहो जाम्बवता हत:।
सुकुमार मा रोदीस्तव ह्येष: स्यमन्तक:।।

जिन्हें संस्कृत का कम ज्ञान हो वह हिन्दी में इस प्रकार बोलें...

मंत्रार्थ- सिंह ने प्रसेन को मारा और सिंह को जाम्बवान ने मारा। हे सुकुमारक बालक तू मत रोवे, तेरी ही यह स्यमन्तक मणि है।

इस मंत्र के प्रभाव से कलंक नहीं लगता है। जो मनुष्य झूठे आरोप-प्रत्यारोप में फंस जाए, वह इस मंत्र को जपकर आरोप मुक्त हो सकता है।
 

भगवान श्रीकृष्ण पर लगा था चोरी का आरोप
सत्राजित् नाम के एक यदुवंशी ने सूर्य भगवान को प्रसन्न कर स्यमंतक नाम की मणि प्राप्त की थी। वह मणि प्रतिदिन स्वर्ण प्रदान करती थी। उसके प्रभाव से पूरे राष्ट्र में रोग, अनावृष्टि यानी बरसात न होना, सर्प, अग्नि, चोर आदि का डर नहीं रहता था। एक दिन सत्राजित् राजा उग्रसेन के दरबार में आया। वहां श्रीकृष्ण भी उपस्थित थे। श्रीकृष्ण ने सोचा कि कितना अच्छा होता यह मणि अगर राजा उग्रसेन के पास होती।
किसी तरह यह बात सत्राजित् को मालूम पड़ गई। इसलिए उसने मणि अपने भाई प्रसेन को दे दी। एक दिन प्रसेन जंगल गया। वहां सिंह ने उसे मार डाला। जब वह वापस नहीं लौटा तो लोगों ने यह आशंका उठाई कि श्रीकृष्ण उस मणि को चाहते थे। इसलिए सत्राजित् को मारकर उन्होंने ही वह मणि ले ली होगी, लेकिन मणि सिंह के मुंह में रह गई। जाम्बवान ने शेर को मारकर मणि ले ली। जब श्रीकृष्ण को यह मालूम पड़ा कि उन पर झूठा आरोप लग रहा है तो वे सच्चाई की तलाश में जंगल गए।
वे जाम्बवान की गुफा तक पहुंचे और जाम्बवान से मणि लेने के लिए उसके साथ 21 दिनों तक घोर संग्राम किया। अंतत: जाम्बवान समझ गया कि श्रीकृष्ण तो उनके प्रभु हैं। त्रेता युग में श्रीराम के रूप में वे उनके स्वामी थे। जाम्बवान ने तब खुशी-खुशी वह मणि श्रीकृष्ण को लौटा दी तथा अपनी पुत्री जाम्बवंती का विवाह श्रीकृष्ण से करवा दिया. श्रीकृष्ण ने वह मणि सत्राजित् को सौंप दी। सत्राजित् ने भी खुश होकर अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया।
ऐसा माना जाता है कि इस प्रसंग को सुनने-सुनाने से भाद्रपद मास की चतुर्थी को भूल से चंद्र-दर्शन होने का दोष नहीं लगता।


श्रीगणेश ने दिया था चंद्रमा को श्राप

भगवान गणेश को गज का मुख लगाया गया तो वे गजवदन कहलाए और माता-पिता के रूप में पृथ्वी की सबसे पहले परिक्रमा करने के कारण अग्रपूज्य हुए। सभी देवताओं ने उनकी स्तुति की पर चंद्रमा मंद-मंद मुस्कुराता रहा। उसे अपने सौंदर्य पर अभिमान था। गणेशजी समझ गए कि चंद्रमा अभिमानवश उनका उपहास करता है। क्रोध में आकर भगवान श्रीगणेश ने चंद्रमा को श्राप दे दिया कि- आज से तुम काले हो जाओगे।
चंद्रमा को अपनी भूल का अहसास हुआ। उसने श्रीगणेश से क्षमा मांगी तो गणेशजी ने कहा कि सूर्य के प्रकाश से तुम्हें धीरे-धीरे अपना स्वरूप पुनः प्राप्त हो जाएगा, लेकिन लेकिन आज (भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी) का यह दिन तुम्हें दंड देने के लिए हमेशा याद किया जाएगा। जो कोई व्यक्ति आज तुम्हारे दर्शन करेगा, उस पर झूठा आरोप लगेगा। इसीलिए भाद्रपद माह की शुक्ल चतुर्थी को चंद्र दर्शन नहीं किया जाता।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-JKR-DHAJ-today-not-see-the-moon-know-why-news-hindi-5410165-PHO.html

Saturday, September 3, 2016

इन 6 को बताएंगे अपनी गुप्त बातें तो फंस सकते हैं


महाभारत के तीर्थयात्रा पर्व में बताया गया है कि किन 6 लोगों के सामने हमें गुप्त बातें नहीं करनी चाहिए, नहीं तो हम किसी संकट में फंस सकते हैं। इनकी जानकारी इस प्रकार है-
श्लोक
स्त्रियां मूढेन बालेन लुब्धेन लघुनापि वा।
न मंत्रयीत गुह्यानि येषु चोन्मादलक्षणम्।।

अर्थ- 1. स्त्री, 2. मूर्ख, 3.बालक, 4.लोभी और 5. नीच पुरुषों के साथ तथा जिसमें 6. उन्माद का लक्षण दिखाई दे, उसके साथ भी गुप्त परामर्श न करें।

1. स्त्री
स्त्रियों का स्वभाव चंचल होता है। कई बार स्त्रियां ऐसी बातें भी सभी के सामने बोल देती हैं, जिससे परिवार का मान-सम्मान कम होता है। स्त्रियों के बारे में ये भी कहा जाता है कि इनके पेट में कोई भी गुप्त बात नहीं टिक सकती। कभी न कभी ये किसी के सामने गुप्त बात बोल ही देती हैं। इसलिए स्त्रियों के सामने कभी भी कोई गुप्त बात नहीं करनी चाहिए।
2. मूर्ख
मूर्ख यानी वह व्यक्ति जिसे अच्छे-बुरे, अपने-पराए या दोस्त-दुश्मन का फर्क मालूम नहीं होता। ऐसे व्यक्ति के सामने यदि कोई गुप्त बात कही जाए तो जाने-अनजाने में वह किसी को भी वह बात बता सकता है। ऐसी बात अगर हमारे दुश्मनों को पता चल जाए तो हम किसी बड़ी मुसीबत में फंस सकते हैं। इसलिए मूर्ख व्यक्ति के सामने कभी कोई गुप्त बात नहीं करनी चाहिए।
3. बालक
किसी बच्चे के सामने भी कोई गुप्त बात नहीं कहनी चाहिए, क्योंकि उन्हें नहीं पता होता कि किसके सामने क्या बात बोलनी चाहिए और क्या नहीं। ऐसी स्थिति में बच्चे के सामने कही गई गुप्त दूसरे लोगों को पता चल सकती है और इसका नुकसान हमें आने वाले समय में उठाना पड़ सकता है। इसलिए यदि हमारे आस-पास बच्चे हैं तो हमें सोच-समझ कर ही बातें करनी चाहिए।
4. लोभी
जिस इंसान को धन का लालच होता है, वह अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए किसी का भी नुकसान करने से नहीं चूकता। ऐसी स्थिति में वह किसी की भी गुप्त बात, किसी दूसरे को पैसे के लालच में आकर बता सकता है। फिर चाहे वह आपका दुश्मन ही क्यों न हो। इसलिए लालची इंसान पर भरोसा कर उसे कभी कोई राज की बात नहीं बतानी चाहिए।
5. नीच पुरुष (बुरे काम करने वाला)
जो पुरुष चोरी, लूट, डकैती, मुनाफाखोरी आदि ऐसे काम करते हैं, जिससे दूसरों को नुकसान होता है, वह निम्न श्रेणी के होते हैं। ऐसे लोग अपने फायदे के लिए कुछ भी कर सकते हैं। इसलिए न तो ऐसे लोगों के साथ रहना चाहिए और न ही इनके सामने कभी कोई गुप्त बातें करनी चाहिए।
6. जिसमें उन्माद के लक्षण दिखाई दें
कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनमें उन्माद (पागलपन) के लक्षण दिखाई देते हैं, हालांकि ये पागल नहीं होते। लेकिन कभी-कभी ये ऐसे काम कर देते हैं जो नहीं करना चाहिए। कभी ये अतिउत्साही हो जाते हैं तो कभी निराश नजर आते हैं। ये बिना कारण कुछ भी कर बैठते हैं। ऐसे लोगों के सामने भी कभी कोई राज की बात नहीं करनी चाहिए।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-JKR-DGRA-life-management-of-mahabharat-news-hindi-5408121-PHO.html

Friday, September 2, 2016

किसी भी महिला से विवाह करने के पहले जांच लेना चाहिए ये 4 बातें : विष्णु पुराण

मनुष्य जीवन के सोलह संस्कारों में से एक महत्वपूर्ण संस्कार है विवाह। सुखी वैवाहिक जीवन के लिए आवश्यकता होती है अच्छे जीवन साथी की। शादी के लिए ऐसी लड़की का चयन करना चाहिए, जो कि अपने पति और परिवार दोनों को प्रेम पूर्वक संभाल सके। विष्णु पुराण में स्त्रियों के संबंध में कई बातें बताई गई हैं। इस पुराण में 4 ऐसी बातों के बारे में बताया गया है, जिनकी जांच किए बिना किसी भी स्त्री से विवाह नहीं करना चाहिए। जानिए कौन-सी हैं वे 4 बातें।
1. माता या पिता पक्ष की ओर से कोई रिश्ता हो-
किसी भी व्यक्ति को उस स्त्री से कभी शादी नहीं करना चाहिए, जिसका हमारे पिता या माता की ओर से कोई रिश्ता हो। शास्त्रों के अनुसार आपसी रिश्तेदारी या एक ही गोत्र में विवाह करना मना किया गया है। इससे जेनेटिक बीमारियां होने की भी संभावनाएं रहती हैं। जिस स्त्री से माता पक्ष से पांचवीं पीढ़ी तक और पिता पक्ष से सातवीं पीढ़ी तक रिश्ता जुड़ा हुआ हो, उससे शादी नहीं करना चाहिए।
2. दुष्ट पुरुष से दोस्ती रखने वाली-
स्त्री को दुष्ट पुरुष से मेल-जोल नहीं बढ़ाना चाहिए। ऐसा करने से वह कभी भी किसी मुश्किल में फंस सकती है। दुष्ट पुरुष उस स्त्री का उपयोग अपने निजी हित के लिए कर सकता है। उसकी संगत में रहने से स्त्री का स्वभाव भी वैसा हो सकता है। ऐसा होने से उसके चरित्र में भी दोष आ जाता है। इसलिए ऐसी स्त्री से विवाह नहीं करना चाहिए, जो दुष्ट पुरुष से संबंध रखती हो।
3. बुरा बोलने वाली-
कहा जाता है कि वाणी में ही मां सरस्वती का निवास होता है। जो स्त्री मधुर वाणी बोलने वाली होती है, उससे मां सरस्वती सदैव प्रसन्न रहती हैं। बुरे या कटु वचन बोलने वाली स्त्री का स्वभाव भी उसकी भाषा की तरह बुरा ही होता है। ऐसी स्त्री की वजह से घर में अशांति का वातावरण बना रहता है। इसीलिए ऐसी स्त्री से विवाह नहीं करना चाहिए।
4. देर तक सोने वाली-
देर तक सोने के कारण महिलाएं पारिवारिक जिम्मेदारी पूरी नहीं कर पाती है। देर तक सोना आलस की निशानी होती है। आलसी स्त्री घर को साफ नहीं रख सकती। घर में लक्ष्मी की कृपा बनाएं रखने के लिए साफ-सफाई रखना बहुत जरूरी होता है। घर में गंदगी होने से दरिद्रता बड़ती है। साथ ही देर तक सोना कई बिमारियों का भी कारण बन सकता हैं। इसलिए ऐसी स्त्री से विवाह नहीं करना चाहिए, जो देर तक सोती हो या आलसी प्रर्वती की हो।

Thursday, September 1, 2016

महाभारत से समझें, कैसे बनाए बच्चों का सुनहरा भविष्य

समाज और देश-दुनिया की महत्वपूर्ण इकाई है परिवार जबकि परिवार की शुरुआत होती है दाम्पत्य से। परिवार की सम्पत्ति होती है संतान। अगर यह कहें कि संतान के बिना समाज का कोई अस्तित्व ही नहीं है तो कोई अचरज नहीं है। अपना परिवार बढ़ाना या संतान का उत्पादन करना सिर्फ व्यक्तिगत ही नहीं बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यह कार्य साधारण नहीं बल्कि बड़ा ही महत्वपूर्ण और चुनौती वाला है।
किसी भी युवक या युवति को माता-पिता बनने की जिम्मेदारी को उठाने के लिए आगे आने से पहले हर तरह से तैयार हो जाना चाहिए। पति तथा पत्नी दोनों की शारीरिक, मानसिक और आर्थिक स्थिति इस लायक हो कि वे संतान और परिवार की जिम्मेदारी को बखूबी निभा सकें , तभी उन्ंहे इस दिशा में आगे कदम बढ़ाना चाहिए। स्वयं और परिवार की स्थिति तो ध्याान में रखना ही चाहिये साथ ही देश, समय और परिस्थितियों का भी ध्यान करना ही चाहिए। गलत स्थान, अनुचित समय और विपरीत परिस्थितियों में संतान का जन्म लेना भी समस्याओं को बढ़ावा देता है।
परिवार का भविष्य संतानों के संस्कार और उनकी परवरिश पर ही निर्भर करता है। बच्चों के लालन-पालन के लिए सिर्फ सुख और सुविधाओं की ही आवश्यकता नहीं होती। अभावों में भी बच्चों को अच्छे संस्कार दिए जा सकते हैं। जब संतानें संस्कारवान और सभ्य होंगी तो परिवार सफल होगा। अगर अधिक लाड़-प्यार में संतानों को बिगाड़ दिया जाए तो परिवार को टूटने में देर नहीं लगेगी।
महाभारत में कौरव और पांडवों में क्या फर्क था। कौरव महलों की सुख-सुविधाओं में पले थे और पांडव जंगल में। फिर भी पांडव नायक हुए और कौरव खलनायक। पांडवों को उनकी मां कुंती ने अकेले ही जंगल में पाला। कोई सुख-सुविधा नहीं। जबकि कौरवों को धृतराष्ट्र और गांधारी ने महलों में पाला। फिर भी आप फर्क देखिए। अपने बच्चों को हमेशा हर चीज सुलभ ना कराएं, कभी-कभी अभावों में जीना भी सिखाएं। अभाव हम में किसी वस्तु को पाने की लालसा भरते हैं। उसके लिए परिश्रम करना सिखाते हैं।