Tuesday, May 10, 2016

क्यों हल्दी का उपयोग शुभ माना जाता है ?

हल्दी की छोटी सी गांठ में बड़े गुण होते हैं। शायद ही कोई ऐसा घर हो जहां हल्दी का उपयोग न होता हो। पूजा-अर्चना से लेकर पारिवारिक संबंधों की पवित्रता तक में हल्दी का उपयोग होता है। इसका सबसे ज्यादा उपयोग घर के दैनिक भोजन में होता है। स्वास्थ्य के लिए ये रामबाण है। हल्दी का उपयोग शरीर में खून को साफ करता है। इसके उपयोग से कई असाध्य बीमारियों में फायदा होता है।

इसका उपयोग भोजन के स्वाद को बढ़ा देता है।तंत्रशास्त्र के अनुसार, बगुलामुखी पीतिमा की देवी हैं। उनके मंत्र का जप पीले वस्त्रों में व हल्दी की माला से होता है। धर्म दर्शन में भी हल्दी को पवित्र माना जाता है। ब्राह्मणों में पहना जाने वाला जनेऊ तो बिना हल्दी के रंगे पहना ही नहीं जाता है।जब भी जनेऊ बदला जाता है तो हल्दी से रंगे जनेऊ को ही पहनने की प्रथा है। इसमें सब प्रकार के कल्याण की भावना निहित होती है। सौंदर्य को निखारने में भी हल्दी की महत्वपूर्ण भूमिका है। आज भी गांवों में नहाने से पहले शरीर पर हल्दी का उबटन लगाने का चलन है। कहते हैं इससे शरीर की कांति बढ़ती है और मांसपेशियों में कसावट आती है। हल्दी को शुभता का संदेश देने वाला भी माना गया है।
आज भी जब कागज पर विवाह का निमंत्रण छपवाकर भेजा जाता है, तब निमंत्रण पत्र के किनारों को हल्दी के रंग से स्पर्श करा दिया जाता है। कहते हैं कि इससे रिश्तों में प्रगाढ़ता आती है।वैवाहिक कार्यक्रमों में भी हल्दी का उपयोग होता है। दूल्हे व दुल्हन को शादी से पहले हल्दी का उबटन लगाकर वैवाहिक कार्यक्रम पूरे करवाए जाते हैं। इतने गुणों के कारण ही हल्दी को पवित्र माना जाता है।

Monday, May 9, 2016

क्यों जरूरी है मंदिर में दर्शन करने के बाद परिक्रमा करना ?


भगवान की परिक्रमा का धार्मिक महत्व तो है ही, विद्वानों का मत है भगवान की परिक्रमा से अक्षय पुण्य मिलता है, सुरक्षा प्राप्त होती है और पापों का नाश होता है। परिक्रमा करने का व्यवहारिक और वैज्ञानिक पक्ष वास्तु और वातावरण में फैली सकारात्मक ऊर्जा से जुड़ा है।

मंदिर में भगवान की प्रतिमा के चारों ओर सकारात्मक ऊर्जा का घेरा होता है, यह मंत्रों के उच्चारण, शंख, घंटाल आदि की ध्वनियों से निर्मित होता है। हम भगवान कि प्रतिमा की परिक्रमा इसलिए करते हैं ताकि हम भी थोड़ी देर के लिए इस सकारात्मक ऊर्जा के बीच रहें और यह हम पर अपना असर डाले।इसका एक महत्व यह भी है कि भगवान में ही सारी सृष्टि समाई है, उनसे ही सब पैदा हुए हैं, हम उनकी परिक्रमा लगाकर यह मान सकते हैं कि हमने सारी सृष्टि की परिक्रमा कर ली है।

Saturday, May 7, 2016

क्यों लेना चाहिए आरती के बाद चरणामृत ?


हिंदू धर्म में आरती के बाद भगवान का चरणामृत दिया जाता है। इस शब्द का अर्थ है भगवान के चरणों से प्राप्त अमृत। इसे बहुत ही पवित्र माना जाता है व मस्तक से लगाने के बाद इसका सेवन किया जाता है। इसे अमृत के समान माना गया है। कहते हैं भगवान श्रीराम के चरण धोकर उसे चरणामृत के रूप में स्वीकार कर केवट न केवल स्वयं भव-बाधा से पार हो गया, बल्कि उसने अपने पूर्वजों को भी तार दिया। चरणामृत का महत्व सिर्फ धार्मिक ही नहीं चिकित्सकीय भी है। चरणामृत का जल हमेशा तांबे के पात्र में रखा जाता है।

आयुर्वेदिक मतानुसार तांबे के पात्र में अनेक रोगों को खत्म करने की शक्ति होती है जो उसमें रखे जल में आ जाती है। उस जल का सेवन करने से शरीर में रोगों से लडऩे की क्षमता पैदा हो जाती है। इसमें तुलसी के पत्ते डालने की परंपरा भी है, जिससे इस जल की रोगनाशक क्षमता और भी बढ़ जाती है। ऐसा माना जाता है कि चरणामृत मेधा, बुद्धि, स्मरण शक्ति को बढ़ाता है।

Friday, May 6, 2016

क्या है वैज्ञानिक कारण चंद्रमा की पूजा क्यों की जाती है चतुर्थी पर ?

चतुर्थी स्त्रियों के लिए बड़ा ही महत्वपूर्ण पर्व व अवसर होता है। पत्नियों की ऐसी दृढ़ मान्यता है कि चंद्रमा की पूजा करने और कृपा प्राप्त करने से उनके पति की उम्र व सुख-समृद्धि में इजाफा होता है, लेकिन इस परंपरा को बनाए जाने के पीछे वैज्ञानिक कारण क्या है ये बहुत कम लोग जानते हैं। दरअसल, चंद्रमा पृथ्वी के नजदीक होने के कारण, पृथ्वीवासियों को बड़ी गहराई से प्रभावित करता है।

कहते हैं चंद्रमा से निकलने वाली सूक्ष्म विकिरण इंसान को शारीरिक और मानसिक दोनों ही स्तरों पर असर डालती हैं।चौथ या महीने की अन्य चतुर्थी के दिन चंद्रमा की कलाओं का प्रभाव विशेष असर दिखाता है। इसलिए चतुर्थी के दिन की पूजा से विशेष लाभ होता है।चंद्रमा को जल चढ़ाते समय, चंद्रमा की किरणें पानी से परावर्तित होकर साधक को आश्चर्यजनक मनोबल प्रदान करती हैं। ज्योतिष के अनुसार चंद्र की पूजा जरूर करना चाहिए, क्योंकि चंद्रमा को मन का कारक या देवता होने के कारण मन को सकारात्मक ऊर्जा और आत्मविश्वास से भर देता है।

Thursday, May 5, 2016

पीपल के पेड़ के नीचे दीया क्यों जलाते हैं?

पीपल का शुद्ध तत्सम नाम अश्वत्थ है। यह हिंदुओं का सबसे पूज्य वृक्ष है। इसे विश्व वृक्ष, चैत्य वृक्ष और वासुदेव भी कहा जाता है। हिंदू दर्शन की मान्यता है इसके पत्ते-पत्ते में देवता का वास रहता है। विशेषकर विष्णु का। यही कारण है कि श्रीमद भागवत गीता में जब भगवान कृष्ण अपनी विभूतियों का परिचय देते हैं तो स्वयं को वृक्षों में अश्वत्थ यानी पीपल बताते हैं।

हिंदू धर्मकोष का वचन है- काम, कर्म रूपी वायु के द्वारा प्रेरित, नित्य प्रचलित स्वभाव और शीघ्र विनाशी होने के कारण, मायामय संसार वृक्ष को भी अश्वत्थ कहा गया है। ऋगवेद में अश्वत्थ की लकड़ी के पात्रों का उल्लेख मिलता है। इसकी कठोर लकड़ी अग्नि जलाते समय शमी की लकड़ी के ऊपर रखी जाती है। अथर्ववेद और छंदोग्य उपनिषद में इस वृक्ष के नीचे देवताओं का स्वर्ग बताया गया है। इन्हीं धार्मिक विश्वासों के कारण इसकी पूजा-अर्चना और इसके नीचे दीप रखने की परंपरा है।

Wednesday, May 4, 2016

क्यों सबसे ज्यादा प्रिय हैं ये चार चीजें श्री कृष्ण को?


शास्त्रों के अनुसार जब कृष्ण बासुरी बजाते थे तो उसमें अलौकिक आकर्षण होता था। कृष्ण और मुरली एक दूसरे के पर्याय रहे हैं। मुरली के बिना श्री कृष्ण की कल्पना भी नहीं की जा सकती।उनकी मुरली के नाद रूपी ब्रह्म ने सम्पूर्ण सृष्टि को आलोकित और सम्मोहित किया। दरअसल, कृष्ण की बांसुरी उनके स्वभाव की मधुरता का प्रतीक है। कृष्ण के हाथ में बांसुरी का मतलब जीवन में कैसी भी घड़ी आए हमें घबराना नहीं चाहिए। भीतर से शांति हो तो संगीत जीवन में उतरता है।
ऐसे ही अगर भक्ति पाना है तो अपने भीतर शांति कायम करने का प्रयास करें। साथ ही, शास्त्रों के अनुसार कृष्ण के बचपन के अलावा और कहीं उनके बांसुरी वादन का उल्लेख नहीं मिलता है। कृष्ण की बांसुरी प्रेम, कलात्मकता व रचनात्मकता का प्रतीक है। इसलिए कृष्ण का बांसुरी वादन इस तरफ भी इशारा करता है कि बचपन में बच्चों की कलात्मकता व रचनात्मकता पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए, क्योंकि इससे उनके मन में संवेदनाएं उत्पन्न होती है और उनका सर्वांगिण विकास होता है।
इसलिए कृष्ण को प्यारी है गाय
भगवान श्रीकृष्ण को गाय बहुत प्रिय है। दरअसल, गाय सब कामों में उदार व गुणों की खान है। गाय का मूत्र, गोबर, दूध, दही और घी, इन्हे पंचगव्य कहते हैं। मान्यता है कि इनका सेवन लेने से शरीर के भीतर पाप नहीं ठहरता। जो गौ की एक बार प्रदक्षिणा करके उसे प्रणाम करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर अक्षय स्वर्ग का सुख भोगता है।
मोर से ब्रह्मचर्य की शिक्षा
मोर को चिर-ब्रह्मचर्य युक्त प्राणी समझा जाता है। इसलिए प्रेम में ब्रह्मचर्य की महान भावना को समाहित करने के प्रतीक रूप में कृष्ण मोर पंख धारण करते हैं। मोर मुकुट का गहरा रंग दुःख और कठिनाइयों, हल्का रंग सुख-शांति और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
माखन व मिश्री से सीखें घुल मिल जाना
श्रीकृष्ण को माखन मिश्री बहुत ही प्रिय है। मिश्री का एक महत्वपूर्ण गुण यह है कि जब इसे माखन में मिलाया जाता है, तो उसकी मिठास माखन के कण-कण में घुल जाती है। उसके हर हिस्से में मिश्री की मिठास समा जाती है। मिश्री युक्त माखन जीवन और व्यवहार में प्रेम को अपनाने का संदेश देता है। यह बताता है कि प्रेम में किस तरह घुल- मिल जाना चाहिए।

http://religion.bhaskar.com/news/JM-JMJ-GYVG-knowledgewhy-these-four-things-most-dear-to-krishna-5103914-NOR.html

Tuesday, May 3, 2016

इन 4 महिलाओं का सम्मान हर हाल में करना चाहिए


रामचरितमानस में चार ऐसी महिलाओं के बारे में बताया गया है, जिनका सम्मान हर हाल में करना ही चाहिए। इन चार का अपमान करने वाले या इन पर बुरी नजर डालने वाले मनुष्य महापापी होते हैं। ऐसे मनुष्य की जीवनभर किसी न किसी तरह से दुश भोगने पड़ते ही हैं।
श्लोक-
अनुज बधू भगिनी सुत नारी, सुनु सठ कन्या सम ए चारी।
इन्हिह कुदृष्टि बिलोकइ जोई, ताहि बधें कछु पाप न होई।।
1. छोटे भाई की पत्नी
छोटे भाई की पत्नी बहू के समान होती है। उस पर कभी बुरी नजर नहीं डालनी चाहिए। ऐसा करने वाले मनुष्य का परिणाम बुरा ही होता है। रामचरितमानस के अनुसार, किष्किन्धा के राजा बालि ने अपने छोटे भाई सुग्रीव को राज्य से बाहर निकाल कर उसकी पत्नी रूमा को अपने अधीन कर लिया था। छोटे भाई की पत्नी पर बुरी दृष्टि डालना या उसके साथ बुरा व्यवहार करना महापाप होता है। इसी वजह से खुद भगवान राम ने बाली का वध करके उसे उसके कर्मों की सजा दी थी। इसलिए हर मनुष्य को अपने छोटे भाई की पत्नी को अपनी बहू के समान ही समझना चाहिए।
2. पुत्र की पत्नी
पुत्र की पत्नी बेटी के समान मानी जाती है। अपनी बहू के सम्मान की रक्षा करना सबका धर्म होता है। मनुष्य को भूलकर भी अपनी बहू का अपमान नहीं करना चाहिए, न ही उसका अपमान होते देख, उस बात का समर्थन करना चाहिए। रामायण में दी गई एक घटना के अनुसार, एक बार स्वर्ग की अप्सरा रंभा कुबेर के पुत्र नलकुबेर से मिलने जा रही थी। रास्ते में रावण ने उसे देखा और बुरी नीयत से रोक लिया। रावण को कामातुर होता देख रंभा ने कहा कि आज उसने कुबेर के पुत्र नलकुबेर को मिलने का वचन दिया है और इसलिए वह रावण की पुत्रवधू के समान है। रंभा के ऐसा कहने पर भी रावण ने उसकी बात नहीं मानी और उसके साथ बुरा व्यवहार किया। रावण के ऐसा करने पर रंभा ने क्रोधित होकर उसे किसी भी स्त्री पर नजह डालने पर उसके सिर के सौ टुकड़े हो जाने का और किसी स्त्री की वजह से ही उसका विनाश होने का श्राप दे दिया था। पुत्रवधू का यही श्राप रावण के विनाश का कारण बना।
विज्ञापन3. बहन
मनुष्य को अपनी छोटी बहन को पुत्री और बड़ी बहन को माता के समान समझना चाहिए। जो मनुष्य अपनी बहन के मान की रक्षा नहीं करता या अपने निजी स्वार्थ के लिए उसका अपमान करता है, उसे राक्षस प्रवृत्ति का माना जाता है। बहन का अपमान या उसके साथ बुरा व्यवहार करने वाले व्यक्ति को जीवित होते हुए भी नरक के समान दुःख उठाने पड़ते हैं। मनुष्य को किसी भी हाल में अपनी बहन का अपमान नहीं करना चाहिए और हमेशा उसकी रक्षा करना चाहिए।
4. अपनी पुत्री
अपनी पुत्री का सम्मान करना, हर बुरी परिस्थिति से उसे बचाना पिता का धर्म होता है। अपनी पुत्री के साथ बुरा व्यवहार करना, उसे बुरी दृष्टि से देखने से बड़ा पाप और कोई नहीं होता। ऐसा कर्म करने वाला मनुष्य महापापी माना जाता है और उसे जीवन भर दुःखों का सामना करना ही पड़ता है। ऐसा मनुष्य चाहे कितने ही दान धर्म कर ले, लेकिन उसके पाप का निवारण नहीं होता। इसलिए मनुष्य को भूलकर भी अपनी पुत्री का अपमान नहीं करना चाहिए।
http://religion.bhaskar.com/news/JM-JKR-DGRA-lesson-from-ramcharitmanas-always-respect-these-4-woman-in-hindi-5310910-PHO.html